प्रेम और मित्रता में विश्वासघात की अमरगाथा है ये नदी

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अगर प्रेम है गंगा, तो प्रेम में विश्वासघात है ये नदी

सभी नदियों का बहाव पश्चिम से पूर्व की ओर होता है जबकि नर्मदा इन सबके विपरीत पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है।

“अरे! तुम तो उल्टी ही गंगा बहा रहे हो”

इस संवाद में उल्टी गंगा का आशय उस नदी से है जिसका बहाव अन्य सभी नदियों की अपेक्षा उल्टा है। मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में मैखल पर्वत के अमरकंटक शिखर से उद्गमित नर्मदा नदी पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली भारत की एकमात्र नदी है। नर्मदा नदी भारत की सबसे प्रमुख एवं लंबी नदियों में से एक है। इसका वर्णन रामायण, महाभारत जैसे कई पवित्र धर्म- ग्रन्थों में मिलता है। यह अपने उद्गम से पश्चिम की ओर लगभग 1,312 किमी. चलकर खंभात की खाड़ी, अरब सागर में विलीन हो जाती है। जबकि अन्य सभी नदियां बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। कुछ लोग तो इसे उल्टी गंगा भी कहते हैं।

अगर प्रेम है गंगा, तो प्रेम में विश्वासघात है ये नदी

वैसे तो ऐसा कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि क्यों बाकी सभी नदियों का बहाव पश्चिम से पूर्व की ओर होता है जबकि नर्मदा इन सबके विपरीत पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। पर कुछ किवदंतियां और कहानी ज़रूर प्रचलित है नर्मदा नदी के उल्टे बहने के लिए। जिसमें से एक कहानी है कि जब भगवान शंकर लोक-कल्याण हेतु तपस्या करने के लिए मैखल पर्वत पहुंचे तो उनके पसीने की बूंदों से एक कुंड बनाया गया। इसी कुंड में एक बालिका उत्पन्न हुयी जिसे नर्मदा का नाम दिया गया।

शंकर जी ने माघ शुक्ल सप्तमी पर उन्हें आज्ञा दी कि वह जल की अविरल धारा के रूप में देश के एक बड़े भूभाग में रव (आवाज) करती हुई बहे। इस पर नर्मदा द्वारा वर मांगने पर भगवान शिव ने नर्मदा के हर पत्थर को शिवलिंग सदृश्य पूजने का आशीर्वाद दिया तथा यह वर भी दिया कि तुम्हारे दर्शन से ही मनुष्य पुण्य को प्राप्त करेगा। इसीलिए नर्मदा के हर पत्थर को नर्मदेश्वर कहा जाता है। इस दिन को हम नर्मदा जयंती के रूप में भी मनाते हैं। साथ ही रव करने के कारण नर्मदा को रेवा भी कहा जाता है। किवदंतियों के अनुसार मैखल पर्वत पर उत्पन्न होने के कारण मैखल-सुता भी एक नाम है नर्मदा का।

अगर प्रेम है गंगा, तो प्रेम में विश्वासघात है ये नदी

इसके अलावा एक प्रेम-कथा भी प्रचलित है नर्मदा नदी के बारे में। राजा मैखल ने अपनी पुत्री नर्मदा के विवाह के लिए एक शर्त रखी कि जो कोई भी राजकुमार गुलाबकावली का फूल राजकुमारी के लिए लाएगा उसी से उसका विवाह संपन्न होगा। राजा सोनभद्र ने वह फूल वाली शर्त पूरी की। दोनों को विवाह तय हो गया। राजकुमारी नर्मदा ने सोनभद्र को कभी देखा नहीं था पर उनकी वीरता के चर्चे ज़रूर सुन रखे थे। इस कारण उन्हें सोनभद्र से प्रेम हो गया। उन्होंने अपनी दासी जुहिला के हाथ सोनभद्र को एक संदेश भिजवाया, साथ ही जुहिला को अपने आभूषण एवं वस्त्रादि भी दिए पहनकर जाने के लिए। जुहिला जब राजा सोनभद्र के सामने गयी तो उन्होंने जुहिला को नर्मदा समझकर उससे प्रणय निवेदन किया तो जुहिला के मन मे खोट आ गया। उसने जानकर ये सच्चाई सोनभद्र को नही बताई।

इधर जब जुहिला को आने में काफी देर हो गई तो नर्मदा स्वयं ही सोनभद्र से मिलने चली गयी। वहां राजा सोनभद्र को जुहिला के साथ देखकर वह बहुत क्रोधित हुईं और उल्टी दिशा में चल पड़ी। ऐसा कहा जाता है कि तभी से वो उल्टी दिशा में बह रही हैं। उनका यूँ उल्टा बहना कहीं न कहीं उनके क्रोध का प्रतीक है।

इसलिए वो बंगाल की खाड़ी में न मिलकर सीधे अरब सागर में खंभात की खाड़ी में समुद्रलीन हो जाती हैं।

 

 

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