आज सुबह दिल्ली–आगरा एक्सप्रेसवे पर जो हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। तस्वीरें दिल दहला देने वाली हैं और सवाल बेहद गंभीर। जिस प्रदूषण पर संसद के भीतर बहस चल रही है, वही प्रदूषण सड़कों पर मौत बनकर दौड़ पड़ा। घनी परत, जिसे पहली नजर में कोहरा समझा गया, असल में ज़हरीले प्रदूषण की चादर थी। इसने विज़िबिलिटी लगभग शून्य कर दी और देखते ही देखते कई वाहन आपस में टकरा गए।
एक्सप्रेसवे पर मल्टी-व्हीकल पाइल-अप
दिल्ली–आगरा एक्सप्रेसवे पर कार, ट्रक और बस एक के बाद एक टकराते चले गए। यह एक बड़ा मल्टी-व्हीकल पाइल-अप था, जिसमें कई लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हुए। घायलों को नज़दीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जहां कई लोग ICU में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दृश्यता इतनी कम थी कि आगे खड़ा वाहन कुछ मीटर की दूरी से भी नजर नहीं आ रहा था। अचानक ब्रेक लगने और तेज रफ्तार के कारण टक्कर का सिलसिला थमता ही नहीं दिखा।
कोहरा नहीं, ज़हरीला प्रदूषण
विशेषज्ञों का कहना है कि यह सामान्य कोहरा नहीं था, बल्कि हवा में घुला खतरनाक प्रदूषण था। बढ़ते AQI स्तर, पराली जलाने, वाहनों के धुएं और औद्योगिक उत्सर्जन ने मिलकर हवा को ज़हर बना दिया है। यही वजह है कि सुबह के समय विज़िबिलिटी बेहद कम हो गई।
पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि उत्तर भारत में प्रदूषण अब केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का बड़ा खतरा बन चुका है। सड़क हादसे, फ्लाइट डिले और सांस की बीमारियां—ये सब उसी के नतीजे हैं।
संसद में चर्चा, ज़मीन पर हकीकत
आज ही संसद के भीतर वायु प्रदूषण को लेकर तीखी बहस हो रही थी। सांसद सवाल उठा रहे थे, आंकड़े पेश किए जा रहे थे और नीतियों पर चर्चा चल रही थी। लेकिन संसद से बाहर, उसी प्रदूषण ने कई परिवारों की खुशियां छीन लीं।
यही सबसे बड़ा विरोधाभास है—जहां एक तरफ नीति और रणनीति पर बहस, वहीं दूसरी तरफ आम लोग इसकी कीमत अपनी जान देकर चुका रहे हैं। सवाल यह है कि क्या बहसें ज़मीन पर असर डाल पा रही हैं?
प्रशासन और ट्रैफिक व्यवस्था पर सवाल
इस हादसे ने प्रशासन और ट्रैफिक मैनेजमेंट पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। खराब विज़िबिलिटी की चेतावनी समय रहते क्यों नहीं दी गई? एक्सप्रेसवे पर स्पीड कंट्रोल और अलर्ट सिस्टम क्यों सक्रिय नहीं हुआ? क्या ऐसे हालात में भारी वाहनों की आवाजाही रोकी जानी चाहिए थी?
विशेषज्ञों का मानना है कि हाई-रिस्क दिनों में ट्रैफिक एडवाइजरी, डिजिटल साइन बोर्ड और गश्त को और मजबूत करने की जरूरत है।
प्रदूषण: सिर्फ पर्यावरण नहीं, सुरक्षा का मुद्दा
अब यह साफ हो चुका है कि प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण या स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं रहा। यह सड़क सुरक्षा, आर्थिक नुकसान और सामाजिक संकट का कारण बन चुका है। जब हवा देखना मुश्किल कर दे और सांस लेना खतरनाक हो जाए, तो सिस्टम को सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं, ठोस कार्रवाई करनी होगी।

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