संसद की कार्यवाही फिर ठप हो गई है और वजह बनी राजनीति की सबसे पुरानी लड़ाई आरोप और माफी। लेकिन सवाल यह नहीं कि किसी रैली में नारे लगे या नहीं… सवाल यह है कि देश का सर्वोच्च संसदीय संस्थान क्यों ठप हुआ और जनता की आवाज़ कब सुनी जाएगी।बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस की रैली में प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक और अस्वीकार्य नारे लगाए गए। सत्तापक्ष का साफ संदेश है कि नेतृत्व माफी मांगे, जिम्मेदारी तय हो और संसद का सम्मान रखा जाए। विपक्ष का जवाब भी उतना ही सख्त है। उनका कहना है। ये पार्टी की आधिकारिक लाइन नहीं थी।कुछ कार्यकर्ताओं के शब्द पूरे दल की सोच नहीं होते। लेकिन यहीं सवाल अटकता है अगर नारे गलत थे। तो जिम्मेदारी किसकी? और अगर सही थे, तो संसद क्यों ठप हुई?यह बात स्पष्ट है। कि प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल लोकतंत्र में अनुचित है। विरोध करने का अधिकार लोकतंत्र की नींव है। लेकिन उसके साथ भाषा की मर्यादा और संसदीय शिष्टाचार बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।इस विवाद के नतीजे साफ हैं:
- लोकसभा की कार्यवाही रुकी
- राज्यसभा की कार्यवाही ठप
- ज़ीरो आवर ठप
- प्रश्नकाल बाधित
और देश की जनता बस टीवी स्क्रीन पर देखती रह गई। लेकिन यह कोई एकल मुद्दा नहीं है। आज संसद में एक साथ कई राजनीतिक आंदोलनों का संगम देखने को मिल रहा है:
- नारेबाज़ी
- वेल में हंगामा
- पोस्टर पॉलिटिक्स
- स्थगन प्रस्ताव
- वॉकआउट
- लगातार कार्यवाही रोकने की रणनीति
हर पक्ष अपनी राजनीतिक रणनीति साध रहा है। लेकिन सवाल जनता का है महंगाई, बेरोज़गारी, सुरक्षा, विकास— ये मुद्दे कब उठेंगे? क्या संसद सिर्फ नारों, आरोपों और माफी की राजनीति के लिए रह गई है?यह सिर्फ नारे नहीं हैं। यह राजनीतिक सोच की लड़ाई है जहाँ सार्वजनिक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और शोर आगे निकल जाता है। संसदीय लोकतंत्र का उद्देश्य चर्चा और समाधान है, न कि केवल राजनीतिक संघर्ष और नाटक।विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि संसदीय शिष्टाचार और मुद्दों पर फोकस नहीं बढ़ाया गया, तो लोकतंत्र संवाद की जगह शोर से चलने लगेगा। जनता उम्मीद करती है कि संसद में कामकाजी वातावरण बनें, न कि रोज़ाना आरोप-प्रत्यारोप और वॉकआउट की राजनीति।

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