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  • जीएसटी सुधार 2025: राज्यों को फायदा, केंद्र को नुकसान

    जीएसटी सुधार 2025: राज्यों को फायदा, केंद्र को नुकसान

    भारत में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत 1 जुलाई 2017 को हुई थी, और तब से यह देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़े सुधारों में से एक बन गया है। 3 सितंबर 2025 को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में हुई जीएसटी काउंसिल की 56वीं बैठक में जीएसटी दरों में बड़े पैमाने पर कटौती का फैसला लिया गया। यह नया नियम 22 सितंबर 2025 से लागू होगा। इस फैसले से जहां राज्यों को वित्तीय लाभ होगा, वहीं केंद्र सरकार को सालाना लगभग 48,000 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है। आइए, इस सुधार के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।

    राज्यों को कैसे होगा फायदा?

    जीएसटी काउंसिल के इस फैसले से जीएसटी दरों में कमी आई है, लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ राज्यों को होगा। पहले मोटर वाहनों पर लगने वाला कंपनसेशन सेस पूरी तरह से केंद्र सरकार के पास जाता था, और राज्यों को इसमें कोई हिस्सेदारी नहीं मिलती थी। अब इस सेस को खत्म कर दिया गया है। इसके बदले या तो उत्पादों की कीमतें कम की गई हैं या उन पर 40% की दर से जीएसटी लगाया गया है। इस नई व्यवस्था में 40% जीएसटी का आधा हिस्सा यानी 20% केंद्र को और 20% राज्यों को मिलेगा।

    एसबीआई के एक रिसर्च पेपर के अनुसार, जीएसटी संग्रह का आधा हिस्सा पहले की तरह केंद्र और राज्यों के बीच बराबर बंटेगा। इसके बाद केंद्र के हिस्से में आई राशि का 41% हिस्सा राज्यों को वापस दिया जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि किसी राज्य से 100 रुपये का जीएसटी संग्रह होता है, तो उस राज्य को लगभग 70.5 रुपये प्राप्त होंगे। इस तरह, राज्य नेट गेनर बनेंगे।

    राज्यों को मिलेगा 14.1 लाख करोड़ रुपये

    रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में राज्यों को स्टेट जीएसटी (एसजीएसटी) के रूप में लगभग 10 लाख करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा, डिवॉल्यूशन के तहत 4.1 लाख करोड़ रुपये और प्राप्त होंगे। कुल मिलाकर, सभी राज्यों को जीएसटी से 14.1 लाख करोड़ रुपये की हिस्सेदारी मिलेगी। खास तौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों को इस व्यवस्था का ज्यादा फायदा होगा, क्योंकि इन राज्यों में उपभोग का स्तर अन्य राज्यों की तुलना में अधिक है।

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    केंद्र सरकार को कितना नुकसान?

    केंद्रीय वित्त मंत्रालय के रेवेन्यू सेक्रेटरी अविनाश श्रीवास्तव के अनुसार, जीएसटी दरों में रेशनलाइजेशन के कारण केंद्र सरकार को सालाना लगभग 48,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा। यह अनुमान वित्त वर्ष 2023-24 के उपभोग आंकड़ों के आधार पर लगाया गया है। हालांकि, यदि इस साल उपभोग पैटर्न में बदलाव होता है, तो नुकसान की राशि में भी बदलाव हो सकता है।

  • संसद बजट सत्र: पप्पू यादव ने टैक्स नीति को लेकर केंद्र सरकार पर साधा निशाना

    संसद बजट सत्र: पप्पू यादव ने टैक्स नीति को लेकर केंद्र सरकार पर साधा निशाना

    संसद के बजट सत्र के दौरान जन अधिकार पार्टी के नेता और पूर्व सांसद पप्पू यादव ने केंद्र सरकार की टैक्स नीति पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि सरकार हर चीज़ पर टैक्स लगाकर आम जनता की कमर तोड़ रही है। उनका बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।

    क्या कहा पप्पू यादव ने?

    संसद में बहस के दौरान पप्पू यादव ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “सरकार जमीन पर भी टैक्स, आसमान पर भी टैक्स लगा रही है…आख़िर जनता को कितनी बार हलाल करिएगा?” उनका कहना था कि सरकार की आर्थिक नीतियां आम लोगों के लिए भारी पड़ रही हैं और महंगाई पहले से ही आम जनता को परेशान कर रही है।

    उन्होंने पेट्रोल-डीजल, खाद्य सामग्री, बिजली, और अन्य आवश्यक सेवाओं पर बढ़ते टैक्स को लेकर सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियां केवल बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचा रही हैं, जबकि आम जनता को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।

    टैक्स और महंगाई का बढ़ता बोझ

    अगर हम देश की अर्थव्यवस्था पर टैक्स के प्रभाव को देखें, तो यह साफ है कि आम आदमी पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है। रोज़मर्रा की चीज़ें लगातार महंगी होती जा रही हैं, और टैक्स दरों में इज़ाफा होने से जनता का आर्थिक बोझ बढ़ता ही जा रहा है।

    सरकार के विभिन्न प्रकार के करों जैसे कि जीएसटी, आयकर, और अन्य अप्रत्यक्ष करों का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है। पप्पू यादव का कहना है कि सरकार की यह नीति केवल पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गई है, जबकि आम जनता इससे त्रस्त हो चुकी है।

    विपक्ष की प्रतिक्रिया

    पप्पू यादव के बयान के बाद विपक्षी दलों ने भी केंद्र सरकार पर हमला बोला। कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों ने उनके बयान का समर्थन किया और कहा कि सरकार लगातार आम आदमी पर आर्थिक बोझ डाल रही है।

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    कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा, “पप्पू यादव ने जो कहा वह देश की सच्चाई है। सरकार की नीतियां गरीब और मध्यम वर्ग को पूरी तरह कुचल रही हैं। यह सरकार केवल बड़े व्यापारियों और उद्योगपतियों के लिए काम कर रही है।”

    भाजपा का पलटवार

    वहीं, भाजपा ने पप्पू यादव के बयान को मात्र एक राजनीतिक स्टंट बताया। भाजपा प्रवक्ताओं ने कहा कि सरकार ने कई आर्थिक सुधार किए हैं और टैक्स सुधारों से देश को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।

    एक भाजपा नेता ने कहा, “पप्पू यादव और विपक्षी पार्टियां सिर्फ राजनीति कर रही हैं। सरकार ने कर प्रणाली को सरल बनाया है और आम लोगों को राहत देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं।”

    जनता की प्रतिक्रिया

    सोशल मीडिया पर पप्पू यादव के बयान को लेकर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कुछ लोगों ने उनका समर्थन किया और कहा कि सरकार को टैक्स नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि यह केवल चुनावी राजनीति का हिस्सा है।

    ट्विटर और फेसबुक जैसे प्लेटफार्मों पर #Tax और #PappuYadav ट्रेंड करने लगे। कई लोगों ने लिखा कि सरकार को आम लोगों की परेशानियों पर ध्यान देना चाहिए और टैक्स का बोझ कम करना चाहिए। वहीं, कुछ लोगों ने कहा कि टैक्स का सही उपयोग देश के विकास में होता है और इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।

    क्या हो सकता है आगे?

    पप्पू यादव के इस बयान के बाद संभावना है कि यह मुद्दा आगे और तूल पकड़ेगा। विपक्ष इस बयान को आधार बनाकर सरकार पर और अधिक दबाव बना सकता है।

    आने वाले चुनावों को देखते हुए, यह भी मुमकिन है कि टैक्स और महंगाई जैसे मुद्दे राजनीतिक दलों के लिए प्रमुख चुनावी एजेंडा बन जाएं। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस पर क्या प्रतिक्रिया देती है और क्या कोई ठोस कदम उठाती है या नहीं।

    निष्कर्ष

    पप्पू यादव का यह बयान दर्शाता है कि सरकार की आर्थिक नीतियां विपक्ष के निशाने पर हैं। जहां एक ओर विपक्षी दल इसे जनता की आवाज़ बता रहे हैं, वहीं भाजपा इसे मात्र राजनीति कह रही है।

    आम जनता के लिए यह जरूरी है कि वे इस मुद्दे को समझें और सरकार से सवाल करें कि उनके टैक्स का उपयोग कहां हो रहा है। क्योंकि अंततः टैक्स जनता की गाढ़ी कमाई से ही आता है और इसका सही इस्तेमाल होना चाहिए।