आपने एक कहावत तो सुनी होगी पड़ोसी का टिफ़िन हमेशा भारी लगता है। जहाज बनाने में भी हमारी हालत कुछ वैसी ही है। कोरिया, जापान, चीन और वियतनाम जैसे देशों में जहाज़ ऐसे बनते हैं जैसे हमारे यहाँ शादियों में लड्डू बंटते हैं। और हम? भारत में जहाज बनाने के मामले में अभी भी शुरुआत के स्तर पर हैं।
सरकार की नई योजना और सब्सिडी
अब सरकार ने घोषणा की है चलो, बच्चों को टॉफ़ी देते हैं, ताकि वो बड़े काम कर सकें।” 24 सितंबर को लगभग 70 हज़ार करोड़ रुपये की शिपिंग और समुद्री परियोजनाओं को हरी झंडी मिली है। इसमें से करीब 45 हज़ार करोड़ रुपये सीधे शिप निर्माताओं को सब्सिडी के रूप में दिए जाएंगे। इसका मतलब है कि अगर कोई भारत में जहाज बनाएगा, तो उसे 15 से 25% तक की वित्तीय मदद मिल सकती है। जहाज़ जितना बड़ा और पर्यावरण के अनुकूल होगा, सब्सिडी भी उतनी मोटी होगी।
विदेशी जहाजों पर निर्भरता
वर्तमान में भारत का 95% माल विदेशी जहाजों से ढोया जाता है। यानी हमारा गेहूँ, कोयला और दवाइयाँ… सबका परिवहन किसी और के जहाज़ पर निर्भर है। और हम गर्व से कहते हैं “मेड इन इंडिया”… पर शिपिंग? मेड इन कोरिया।” यही वजह है कि सरकार ने घरेलू जहाज निर्माण को बढ़ावा देने का बड़ा कदम उठाया है।
वित्तीय सहायता और समुद्री विकास कोष
सरकार ने कुछ बड़े जहाजों को “बुनियादी ढाँचे” का दर्जा भी दे दिया है। इसका सीधा मतलब है कि अब इन जहाजों के लिए बैंक से लोन लेना आसान हो जाएगा। इसके साथ ही 20 हज़ार करोड़ रुपये का समुद्री विकास कोष भी बनाया गया है, जिसमें सरकार 49% निवेश करेगी और बाकी राशि बड़े प्राइवेट फंड्स से आएगी।
आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
कुल मिलाकर सरकार का उद्देश्य साफ है विदेशी जहाजों पर निर्भरता कम करना और घरेलू नौवहन उद्योग को मजबूत करना। लेकिन सवाल यह भी है कि यह सब्सिडी सिर्फ “टॉफ़ी” की तरह है या वास्तव में नौवहन आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगी। क्योंकि जहाज बनाने का सफ़र लंबा है, और समुद्र… बहुत गहरा।
