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  • वाराणसी में देव दीपावली: गंगा घाटों पर स्वर्ग का नजारा, लाखों दीपों की रोशनी!

    वाराणसी में देव दीपावली: गंगा घाटों पर स्वर्ग का नजारा, लाखों दीपों की रोशनी!

    कार्तिक पूर्णिमा का अलौकिक उत्सव

    वाराणसी, भगवान शिव की नगरी, आज ६ नवंबर २०२५ को देव दीपावली के पावन पर्व में डूबी हुई है। कार्तिक पूर्णिमा के इस दिन काशी के घाट स्वर्ग बन जाते हैं, जहां देवता खुद धरती पर उतरते हैं। मान्यता है कि इस रात गंगा स्नान से सभी पाप धुल जाते हैं और दीपदान से पुण्य मिलता है। शाम ढलते ही दशाश्वमेध घाट से अस्सी घाट तक लाखों दीपक जल उठते हैं, जो गंगा की लहरों में प्रतिबिंबित होकर अनंत रोशनी का सागर रचते हैं। यह उत्सव दीपावली के १५ दिन बाद मनाया जाता है, जब देवता अपनी दीवाली मनाने काशी आते हैं।

    गंगा घाटों का जादुई नजारा

    सूर्यास्त के बाद गंगा आरती शुरू होती है, जहां पुजारी विशाल दीपों से महाआरती करते हैं। इसके बाद घाटों पर दीप प्रज्वलन का सिलसिला चलता है। राजा घाट, मान मंदिर, ललिता घाट—हर जगह श्रद्धालु दीपक सजाते हैं। गंगा पर सैकड़ों नावें दीपों से सजी तैरती हैं, जिन पर पर्यटक सवार होकर आतिशबाजी का आनंद लेते हैं। आसमान में रंग-बिरंगे पटाखों के फूल फूटते हैं, जो रोशनी की इस महफिल को और भव्य बनाते हैं। हवा में ‘हर हर महादेव’ के जयकारे गूंजते हैं, और घंटियों-शंखों की ध्वनि भक्ति का संगीत रचती है। यह दृश्य इतना अलौकिक है कि लगता है जैसे पूरा बनारस आसमान का टुकड़ा बन गया हो।

    परंपरा और आस्था का संगम

    देव दीपावली की परंपरा सदियों पुरानी है। स्कंद पुराण में वर्णित है कि इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था, जिसकी खुशी में देवताओं ने काशी में दीप जलाए। आज यह पर्व वाराणसी की सांस्कृतिक पहचान है। हजारों साधु-संत, श्रद्धालु और विदेशी पर्यटक यहां एकत्र होते हैं। गंगा में दीप प्रवाह करते हुए लोग अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं। बनारसी साड़ी, मिठाइयां और स्थानीय व्यंजन इस उत्सव को और रंगीन बनाते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बार विशेष व्यवस्था की है—सुरक्षा, सफाई और लाइटिंग के लिए लाखों रुपये खर्च किए गए हैं।

    यह भी पढ़ें : जम्मू-कश्मीर में ‘वंदे मातरम’ विवाद: धार्मिक आस्था बनाम राष्ट्रभक्ति की जंग?

    पर्यटकों की पहली पसंद

    दुनिया भर से लोग देव दीपावली देखने आते हैं। इस साल अनुमान है कि १० लाख से अधिक श्रद्धालु काशी पहुंचे हैं। होटल फुल, गेस्ट हाउस पैक—बनारस की गलियां भक्तों से भरी हैं। नाविकों की कमाई दोगुनी, दुकानों पर रौनक। आतिशबाजी और ड्रोन शो ने इसे आधुनिक टच दिया है। सोशल मीडिया पर #DevDeepawali ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग लाइव वीडियो शेयर कर रहे हैं।

  • मुकेश अंबानी पहुंचे बद्रीनाथ, भक्तों संग किए धार्मिक अनुष्ठान और पूजा

    मुकेश अंबानी पहुंचे बद्रीनाथ, भक्तों संग किए धार्मिक अनुष्ठान और पूजा

    भारतीय उद्योगपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने शुक्रवार को उत्तराखंड के चमोली जिले स्थित पवित्र बद्रीनाथ धाम का दौरा किया और भगवान विष्णु की आराधना की। अंबानी जी मंदिर परिसर में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच पहुंचे। उनके साथ सुरक्षा कर्मियों की टीम थी, जिन्होंने उन्हें भीड़भाड़ के बीच से सुरक्षित ढंग से मंदिर तक पहुंचाया।

    भक्तों के साथ पूजा-अर्चना

    मौके पर मौजूद भक्तों से मुलाकात के दौरान मुकेश अंबानी ने कुछ भक्तों के साथ सेल्फी भी ली। उन्होंने मंदिर में मौजूद लोगों से संवाद किया और मंदिर की पारंपरिक पूजा और अनुष्ठानों का अवलोकन किया। अंबानी जी ने भगवान विष्णु के सामने श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की और अपनी आस्था का प्रदर्शन किया।

    परिवार संग नवरात्रि उत्सव

    इससे पहले, 24 सितंबर को अंबानी परिवार ने नवरात्रि का आरंभिक उत्सव मनाया। इस दौरान मुकेश अंबानी, नीता अंबानी, उनके पुत्र आकाश अंबानी और अनंत अंबानी, श्लोका मर्चेंट, राधिका मर्चेंट सहित अन्य परिवारजन शामिल हुए। नवरात्रि के अवसर पर अंबानी परिवार ने पारंपरिक गरबा कार्यक्रमों में भाग लिया और गुजरात के शिल्पकारों द्वारा तैयार किए गए हस्तशिल्प सजावट के माध्यम से उत्सव स्थल को सजाया।

    बद्रीनाथ का धार्मिक महत्व

    बद्रीनाथ मंदिर हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है और यह 108 दिव्य दर्शनों में से एक है। यह पंच बद्री मंदिरों में शामिल है, जिनमें योग ध्यान बद्री, भविष्य बद्री, आदि बद्री और वृद्ध बद्री भी शामिल हैं। हिंदू परंपरा के अनुसार, इस मंदिर को आदि शंकराचार्य ने पुनः स्थापित किया ताकि हिन्दू धर्म की महत्ता को पुनर्जीवित किया जा सके। बदरी विशाल के नाम से भी यह मंदिर प्रसिद्ध है।

    धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि

    बद्रीनाथ धाम न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहाँ आने वाले भक्त और पर्यटक न केवल भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं, बल्कि मंदिर परिसर और आसपास के नैसर्गिक सौंदर्य का आनंद भी उठाते हैं। मुकेश अंबानी जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व का यहाँ आना श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणास्रोत बनता है और मंदिर की महत्ता को और बढ़ाता है।

    मुकेश अंबानी का यह दौरा न केवल धार्मिक आस्था का परिचायक है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और परंपरा की गरिमा को भी दर्शाता है। परिवार के साथ नवरात्रि और मंदिर में अर्चना का यह संयोजन उनके सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान को उजागर करता है

  • ‘I Love Mahadev’ विवाद: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का बयान और असली मुद्दों से ध्यान…

    ‘I Love Mahadev’ विवाद: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का बयान और असली मुद्दों से ध्यान…

    हाल ही में सोशल मीडिया और राजनीति के गलियारों में ‘I love Mohammed, I love Mahadev’ विवाद ने खूब सुर्खियां बटोरीं। इस मुद्दे पर समाज के अलग-अलग वर्गों की राय सामने आई। लेकिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने इस विवाद पर बड़ा बयान दिया है।

    उनका कहना है कि यह विवाद केवल जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटकाने की रणनीति है।

    महादेव के प्रति अपमान या सम्मान?

    शंकराचार्य ने स्पष्ट कहा कि — “क्या महादेव को पूजा का विषय माना जाता है या प्यार का? हम ‘I love Mahadev’ जैसे शब्द महादेव के लिए प्रयोग नहीं करते। यह महादेव का अपमान है, उनकी अवमानना है।”

    महादेव, जो त्रिदेवों के शिखर पर विराजमान हैं, उनके प्रति आस्था और सम्मान अटूट है। उनके लिए उपयोग की जाने वाली भाषा हमेशा पवित्र और सशक्त होनी चाहिए, न कि ऐसी जो उनके दिव्य स्वरूप का अपमान करती हो।

    विवाद की असलियत और राजनीति

    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि इस तरह के विवाद असली मुद्दों से ध्यान हटाने और समाज को बांटने की कोशिश हैं। यह केवल एक राजनीतिक खेल है, जिसका उद्देश्य समाज को भ्रमित करना है।

    उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति और आस्था में अपमान का कोई स्थान नहीं है। महादेव हमारे जीवन मार्गदर्शक, ऊर्जा और विश्वास का प्रतीक हैं।

    आस्था और श्रद्धा का महत्व

    महादेव के प्रति श्रद्धा केवल एक धार्मिक भावना नहीं है, बल्कि जीवन जीने का मार्ग है। “Mahadev” कहना हमारे दिल की गहराई से निकली सबसे बड़ी श्रद्धा है। यह प्रेम नहीं, बल्कि भक्ति और आस्था का प्रतीक है।

    हमें समझना होगा कि भाषा का चुनाव हमारे विश्वास और आस्था की गरिमा को दर्शाता है। जब हम महादेव का नाम लेते हैं, तो वह केवल भक्ति का विषय होना चाहिए।

    ‘I Love Mahadev’ विवाद ने भले ही सुर्खियां बटोरी हों, लेकिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने इस पर साफ संदेश दिया है कि यह विवाद असली मुद्दों से ध्यान हटाने की साज़िश है।

    हमें इस भ्रम से निकलकर अपनी आस्था और संस्कृति पर गर्व करना चाहिए। महादेव हमारे विश्वास के केंद्र हैं और उनके प्रति आदर हमेशा पवित्र और अटूट रहना चाहिए।