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  • तुर्की की मध्यस्थता: पाक-अफगान युद्धविराम के लिए नया कूटनीतिक प्रयास

    तुर्की की मध्यस्थता: पाक-अफगान युद्धविराम के लिए नया कूटनीतिक प्रयास

    बाकू बैठक: एर्दोआन-शरीफ के बीच अहम चर्चा

    क्षेत्रीय शांति को मजबूत करने की दिशा में तुर्की ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन ने अजरबैजान की राजधानी बाकू में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात के बाद घोषणा की कि तुर्की अपने शीर्ष मंत्रियों और खुफिया प्रमुख को पाकिस्तान भेजेगा। यह प्रतिनिधिमंडल अफगानिस्तान के साथ चल रही युद्धविराम वार्ताओं की प्रगति पर चर्चा करेगा। 8 नवंबर 2025 को हुई इस बैठक में एर्दोआन ने दक्षिण एशिया में स्थायी शांति स्थापित करने का उद्देश्य बताया। उन्होंने कहा कि तुर्की पाकिस्तान में हालिया आतंकी हमलों और अफगानिस्तान के साथ तनाव पर नजर रखे हुए है। बाकू में अजरबैजान के विजय दिवस समारोह के दौरान हुई इस मुलाकात में तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान, रक्षा मंत्री यासर गुलर और खुफिया प्रमुख इब्राहिम कलिन भी मौजूद थे। एर्दोआन ने विमान से लौटते हुए पत्रकारों से कहा, “हमारा लक्ष्य युद्धविराम को स्थायी बनाना और क्षेत्र में आतंकी घटनाओं को हमेशा के लिए खत्म करना है।”

    पाक-अफगान तनाव: सीमा विवाद और आतंकवाद का साया

    पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच संबंध हाल के महीनों में बेहद नाजुक हो गए हैं। दुर्रंद लाइन पर सीमा पार गोलीबारी, आतंकी हमले और आपसी आरोपों ने तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है। पाकिस्तान का दावा है कि अफगानिस्तान तालिबान शासन के तहत तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे समूहों को पनाह दे रहा है, जबकि अफगानिस्तान पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ का आरोप लगाता है। 7 नवंबर 2025 को कंधार के स्पिन बोल्डाक जिले में पाकिस्तानी तोपखाने की गोलीबारी से एक घर क्षतिग्रस्त हो गया, जिसमें नागरिक हताहत हुए। नवंबर 6-7 को तुर्की और कतर की मध्यस्थता में इस्तांबुल में हुई वार्ताएं युद्धविराम को मजबूत बनाने में नाकाम रहीं, लेकिन तुर्की की नई पहल उम्मीद जगाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मध्यस्थता दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली का मोड़ साबित हो सकती है, खासकर जब पाकिस्तान भारत के साथ करीबी बढ़ा रहा है और अफगानिस्तान अपनी संप्रभुता पर जोर दे रहा है।

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    तुर्की की भूमिका: क्षेत्रीय शांति का मध्यस्थ

    तुर्की लंबे समय से मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाता आ रहा है। गाजा युद्धविराम वार्ताओं में मिस्र और कतर के साथ मिलकर तुर्की ने महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसमें अक्टूबर 2025 में शर्म अल-शेख में हुई चर्चाएं शामिल हैं। इसी तरह, सूडान के गृहयुद्ध में भी एर्दोआन ने कूटनीतिक हस्तक्षेप का वादा किया है। पाक-अफगान संवाद में तुर्की ने पहले भी इस्तांबुल में दौर आयोजित किए हैं, जहां दोनों पक्षों ने आतंकवाद विरोधी सहयोग और व्यापार बढ़ाने पर बात की। एर्दोआन की यह पहल न केवल द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने का प्रयास है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भी हाल ही में अफगान समकक्ष से बात कर इसी दिशा में समर्थन जताया।

    अपेक्षाएं और चुनौतियां: क्या बनेगी स्थायी शांति?

    तुर्की प्रतिनिधिमंडल की पाकिस्तान यात्रा इस सप्ताह निर्धारित है, जहां विदेश मंत्री फिदान, रक्षा मंत्री गुलर और खुफिया प्रमुख कलिन अफगान प्रतिनिधियों के साथ त्रिपक्षीय बैठक करेंगे। इसका मुख्य एजेंडा युद्धविराम को स्थायी बनाना, आतंकी घटनाओं पर रोक लगाना और सीमा सुरक्षा तंत्र मजबूत करना होगा। हालांकि, चुनौतियां कम नहीं हैं—अफगानिस्तान की तालिबान सरकार अंतरराष्ट्रीय मान्यता की मांग कर रही है, जबकि पाकिस्तान TTP पर सख्ती चाहता है। वैश्विक शक्तियां जैसे अमेरिका और चीन भी इस क्षेत्र में हितों के टकराव का सामना कर रही हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि तुर्की की निष्पक्ष भूमिका सफलता की कुंजी हो सकती है, लेकिन स्थायी शांति के लिए दोनों देशों को आपसी समझौते पर अमल करना होगा। ईरान और सऊदी अरब जैसे पड़ोसी देशों का समर्थन भी जरूरी है। यदि यह प्रयास सफल रहा, तो दक्षिण एशिया में व्यापार, ऊर्जा और प्रवासन के रास्ते खुल सकते हैं। दुनिया की निगाहें अब इस कूटनीतिक प्रयोग पर हैं—क्या तुर्की पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच नया विश्वास का पुल बनेगा? आने वाले दिनों में इसका जवाब मिलेगा, जो न केवल इन दो देशों बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए निर्णायक साबित होगा।

  • अफगानिस्तान में महिला पत्रकारों के अधिकारों पर संकट, तालिबान ने संवाद से किया इनकार

    अफगानिस्तान में महिला पत्रकारों के अधिकारों पर संकट, तालिबान ने संवाद से किया इनकार

    अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। हाल ही में अफगान विदेश मंत्री की प्रेस ब्रिफिंग में महिला पत्रकारों को शामिल नहीं किया गया। भारतीय पत्रकारों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन वहां कोई भी महिला पत्रकार मौजूद नहीं थी। तालिबान सरकार ने महिला मीडिया कर्मियों के साथ सीधे संवाद करने से इनकार कर दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठने लगे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम महिलाओं के अधिकारों और मीडिया की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा है। अफगान महिलाओं की स्थिति पहले से ही चिंताजनक है, और मीडिया से उनका बहिष्कार इस असमानता को और बढ़ा रहा है।

    तालिबान का कदम और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

    तालिबान की यह नीति केवल मीडिया के स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह सीधे अफगान महिलाओं के अधिकारों पर हमला है। पत्रकारों और मीडिया हाउस ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है। अंतरराष्ट्रीय संगठन और मानवाधिकार संस्थाएं तालिबान पर दबाव बना रही हैं कि वे महिला पत्रकारों और अन्य पेशेवर महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करें।

    विशेषज्ञों का कहना है कि महिला पत्रकारों को संवाद से अलग करना सिर्फ़ अफगान समाज में असमानता को बढ़ा रहा है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी चिंता का विषय है। मीडिया की स्वतंत्रता और महिला अधिकारों की अनदेखी, दोनों ही लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

    महिला अधिकार और शिक्षा में बाधाएं

    तालिबान के शासन में अफगान महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और मीडिया में भागीदारी लगातार सीमित होती जा रही है। महिलाओं को स्कूल और उच्च शिक्षा से रोका जा रहा है। नौकरी और पेशेवर अवसरों पर प्रतिबंध समाज में असमानता बढ़ा रहे हैं। महिला पत्रकारों को प्रेस ब्रिफिंग से बाहर रखना, इसी असमानता का एक स्पष्ट उदाहरण है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अगर महिला अधिकारों को नजरअंदाज किया गया, तो अफगान समाज में लैंगिक असमानता और बढ़ेगी। शिक्षा और मीडिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि समाज में महिलाओं की आवाज़ और प्रभाव बना रहे।

    मीडिया हाउस और पत्रकारों की प्रतिक्रिया

    अफगान महिला पत्रकारों के बहिष्कार ने मीडिया में खलबली मचा दी है। पत्रकारों ने बताया कि यह कदम सीधे तौर पर महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी है। मीडिया हाउस और अंतरराष्ट्रीय पत्रकार संगठन तालिबान के इस रवैये की आलोचना कर रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि मीडिया में महिलाओं की भागीदारी समाज में बदलाव लाने और लोकतांत्रिक मूल्यों को कायम रखने के लिए जरूरी है। अफगानिस्तान में महिला पत्रकारों को शामिल न करना, समाज और मीडिया दोनों के लिए नुकसानदेह है।

    अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस कदम को गंभीर रूप से देखा जा रहा है। मानवाधिकार संगठन, पत्रकार संघ और विभिन्न देशों ने तालिबान से आग्रह किया है कि वे महिला पत्रकारों और पेशेवर महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करें। तालिबान के इस रवैये से अफगानिस्तान का अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठान भी प्रभावित हो रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह स्थिति जारी रही, तो अफगान महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्रता पर गंभीर असर पड़ेगा। मीडिया की स्वतंत्रता और महिला अधिकार, दोनों ही लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार हैं, और इनकी अनदेखी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफगानिस्तान की छवि को कमजोर करेगी।

  • पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर गंभीर झड़प: तालिबान ने किया कब्जा…

    पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर गंभीर झड़प: तालिबान ने किया कब्जा…

    भारत के पड़ोस में पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर हाल ही में गंभीर झड़पें हुईं। अफगानिस्तान की सुरक्षा बलों ने तालिबान समर्थित फोर्सेज़ के साथ मिलकर पाकिस्तान के कई सैन्य पोस्ट्स पर कब्जा किया। विशेष रूप से कुंर और हेलमंड प्रांतों में यह झड़पें हुईं। अफगान रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यह कार्रवाई उनकी सुरक्षा और जवाबी मिशन का हिस्सा थी।

    पाकिस्तानी सैनिकों की हताहत संख्या

    सूत्रों के अनुसार, इन झड़पों में कम से कम 12 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, जबकि कई घायल भी हुए हैं। झड़पों का सबसे बड़ा केंद्र बह्रमचा जिले में देखा गया। पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारी इसे अफगान फोर्सेज़ की अवांछित फायरिंग बता रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि उनकी फोर्सेज़ ने पूरी ताकत से जवाबी कार्रवाई की।

    सीमा पर सुरक्षा की चुनौती

    इस घटनाक्रम ने सीमा पर सुरक्षा को गंभीर चुनौती के सामने ला दिया है। स्थानीय नागरिकों के लिए यह स्थिति खतरनाक साबित हो सकती है। झड़पों और गोलाबारी के कारण इलाके में नागरिकों का जीवन प्रभावित हो रहा है और उन्हें अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों की तलाश करनी पड़ सकती है।

    क्षेत्रीय अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय चिंता

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह संघर्ष न केवल पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव बढ़ा रहा है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस मामले पर नजर बनाए हुए है और दोनों पक्षों से शांति कायम रखने की अपील कर रहा है।

    कूटनीतिक और सैन्य विकल्प

    विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच यह तनाव या तो कूटनीतिक पहल के माध्यम से हल होगा या सैन्य विकल्पों की ओर बढ़ सकता है। यदि यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ सकती है, और भारतीय पड़ोसी राज्यों को भी सतर्क रहना पड़ेगा।

    अफगान-भारत-पाकिस्तान क्षेत्र पर प्रभाव

    इस झड़प का प्रभाव सिर्फ स्थानीय स्तर पर नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे अफगान-भारत-पाकिस्तान क्षेत्र की सुरक्षा और राजनीति पर पड़ सकता है। भारत के लिए यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि इससे सीमा सुरक्षा और रणनीतिक मामलों में नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।

    विशेषज्ञों की राय

    विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों को तत्काल बातचीत और कूटनीतिक चैनलों के माध्यम से तनाव कम करने की आवश्यकता है। वहीं, यदि यह झड़प सैन्य संघर्ष में बदलती है तो इसका क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा।

    पाक-अफगान सीमा पर हालिया झड़पें यह संकेत देती हैं कि दक्षिण एशिया क्षेत्र में स्थिरता अभी भी खतरे में है। तालिबान समर्थित अफगान फोर्सेज़ और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच यह संघर्ष स्थानीय नागरिकों और क्षेत्रीय शांति दोनों के लिए खतरा पैदा कर रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में कूटनीतिक पहल और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता महत्वपूर्ण हैं, ताकि क्षेत्रीय तनाव को कम किया जा सके और स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।

  • दिल्ली में तालिबान प्रेस कॉन्फ्रेंस, महिला पत्रकारों की गैरमौजूदगी

    दिल्ली में तालिबान प्रेस कॉन्फ्रेंस, महिला पत्रकारों की गैरमौजूदगी

    दिल्ली में अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है। शुक्रवार को आयोजित इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसी भी महिला पत्रकार को शामिल नहीं किया गया, जिससे विपक्ष के नेता, खासकर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने सरकार पर तीखी प्रतिक्रिया दी। विपक्ष का कहना था कि यह घटना तालिबान की लिंग आधारित भेदभाव वाली मानसिकता का स्पष्ट उदाहरण है और भारत में महिला पत्रकारों की भागीदारी को नजरअंदाज करना स्वीकार्य नहीं है।

    सरकार की सफाई

    इस विवाद के बीच, भारत सरकार ने साफ किया कि विदेश मंत्रालय का इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं था। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, “विदेश मंत्रालय का कल आयोजित अफगान विदेश मंत्री की प्रेस इंटरैक्शन में कोई involvement नहीं था।” यह स्पष्ट करने का उद्देश्य यह था कि भारत सरकार ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन नहीं किया और न ही उसमें किसी तरह की भूमिका निभाई।

    महिला पत्रकारों की गैरमौजूदगी और आलोचना

    प्रेस कॉन्फ्रेंस की तस्वीरों में देखा गया कि तालिबान नेता केवल पुरुष पत्रकारों के सामने ही संबोधित कर रहे थे। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर और मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जमकर चर्चा हुई। कई पत्रकार और नागरिकों ने इसे महिला पत्रकारों के अधिकारों और भारत में उनके सुरक्षित कामकाज पर हमला बताया। आलोचना का मुख्य केंद्र यह रहा कि तालिबान ने भारतीय राजधानी में आयोजित कार्यक्रम में भी महिलाओं की उपस्थिति को अनदेखा किया।

    अंतरराष्ट्रीय और घरेलू प्रतिक्रिया

    तालिबान की यह नीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आलोचना का विषय बनी है। इससे भारत में महिला पत्रकारों के सुरक्षा और अधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। विपक्षी नेताओं ने कहा कि सरकार को ऐसे अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में सुनिश्चित करना चाहिए कि महिलाओं को बराबरी का अवसर मिले।

    यह मामला साबित करता है कि तालिबान का लिंग भेदभाव अब भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि इसका कोई कनेक्शन भारत से नहीं है। हालांकि, यह घटना महिला पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के लिए चेतावनी और चर्चा का विषय बन गई है। भविष्य में ऐसे कार्यक्रमों में महिला पत्रकारों की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों और समानता की भावना बनी रहे।

  • भारत की UN में अपील: अफगानिस्तान से आतंकवाद रोकने की वैश्विक मांग

    भारत की UN में अपील: अफगानिस्तान से आतंकवाद रोकने की वैश्विक मांग

    परिचय: भारत की चिंता और UN में आवाज़

    भारत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में एक महत्वपूर्ण अपील की है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय समुद्री को पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे UN द्वारा घोषित आतंकवादी संगठनों तथा उनके सहयोगियों के खिलाफ सतर्क रहने को कहा गया है। भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने बुधवार (18 सितंबर 2025) को कहा कि भारत अफगानिस्तान की सुरक्षा स्थिति पर कड़ी नजर रख रहा है। उन्होंने जोर दिया कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ये संगठन अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए न करें। यह अपील दक्षिण एशिया में बढ़ते आतंकवाद के खतरे को ध्यान में रखते हुए की गई है, जहां LeT और JeM जैसे समूहों की सक्रियता ने क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाल दिया है।

    भारत-अफगानिस्तान संबंध और शांति की प्रतिबद्धता

    राजदूत हरीश ने स्पष्ट किया कि भारत और अफगानिस्तान के बीच सभ्यतागत संबंध सदियों पुराने हैं, और युद्धग्रस्त देश में शांति व स्थिरता बनाए रखना भारत के सर्वोच्च हित में है। उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय सहयोग के बिना अफगानिस्तान में शांति और विकास संभव नहीं। भारत ने अफगानिस्तान को मानवीय सहायता प्रदान की है और 500 से अधिक विकास परियोजनाओं के माध्यम से सहयोग किया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी से दो बार बातचीत की है। विशेष रूप से, भारत ने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले की अफगान पक्ष द्वारा की गई कड़ी निंदा का स्वागत किया। भारत लगातार अफगानिस्तान में शांति, सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। यह अपील UNSC रेजोल्यूशन 2593 के अनुरूप है, जो अफगान मिट्टी का आतंकवाद के लिए इस्तेमाल न करने की मांग करता है।

    आतंकवादी संगठनों की सक्रियता: LeT और JeM का खतरा

    लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद UN द्वारा प्रतिबंधित संगठन हैं, जो पाकिस्तान से संचालित होकर अफगानिस्तान में ट्रेनिंग कैंप चला रहे हैं। 2025 में इन संगठनों की सक्रियता बढ़ी है। उदाहरणस्वरूप, अप्रैल 2025 में पहलगाम हमले में JeM का हाथ माना गया, जिसके बाद भारत-पाकिस्तान तनाव चरम पर पहुंच गया और 10 मई 2025 को सीजफायर हुआ। LeT और JeM के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं, लेकिन दोनों ही भारत के खिलाफ हमलों की योजना बना रहे हैं। अफगानिस्तान में इनके कैंपों का इस्तेमाल भर्ती और ट्रेनिंग के लिए हो रहा है। भारत ने हाल ही में श्रीनगर के पास LeT से जुड़े तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों को मार गिराया। ये संगठन न केवल भारत, बल्कि नेपाल जैसे पड़ोसी देशों को भी खतरा पैदा कर रहे हैं। UNSC ने इन समूहों को Al-Qaida और तालिबान से जुड़ा बताया है।

    यह भी पढ़ें : इलेक्शन कमीशन पर सवाल: वोट की चोरी या लोकतंत्र की साख?

    अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया: क्या कड़े कदम उठेंगे?

    अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ चिंता जताई है, लेकिन कड़े कदम सीमित हैं। NATO ने 2025 में एक अपडेटेड एक्शन प्लान जारी किया, जिसमें अफगानिस्तान को आतंकवादियों का सुरक्षित ठिकाना न बनने देने पर जोर दिया गया। UNSC ने 17 मार्च 2026 तक UNAMA (UN Assistance Mission in Afghanistan) का मंडेट बढ़ाया, जिसमें आतंकवाद विरोधी मॉनिटरिंग पर फोकस है। अमेरिका ने पाकिस्तान की सहयोग की सराहना की है, लेकिन भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद भी पाकिस्तान पर दबाव कम है। तालिबान ने ISIS-K के खिलाफ कार्रवाई की है, लेकिन LeT-JeM जैसे समूहों को बख्शा जा रहा है। USIP की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान की कमजोरी से आतंकवाद बढ़ सकता है। हालांकि, सितंबर 2025 तक कोई बड़ा कदम नहीं उठा, जैसे अतिरिक्त प्रतिबंध या सैन्य सहायता। क्षेत्रीय स्तर पर, पाकिस्तान ने Azm-e-Istehkam अभियान चलाया, लेकिन TTP जैसे समूह अफगानिस्तान से हमले कर रहे हैं।

    मेरा विश्लेषण: कड़े कदमों की संभावना

    मैं सोचता हूं कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान और इन आतंकवादी समूहों पर कड़े कदम उठाने में हिचकिचा रहा है, लेकिन दबाव बढ़ रहा है। 2025 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद UNSC ने चिंता जताई, लेकिन व्यावहारिक कार्रवाई सीमित है। NATO और UN के प्लान सकारात्मक हैं, लेकिन तालिबान की कमजोरी और पाकिस्तान की दोहरी नीति (आतंकवाद का समर्थन और सहयोग का दावा) बाधा हैं। यदि पहलगाम जैसे हमले बढ़ते रहे, तो अमेरिका और यूरोपीय देश अतिरिक्त प्रतिबंध या इंटेलिजेंस शेयरिंग बढ़ा सकते हैं। भारत की अपील ने वैश्विक ध्यान खींचा है, लेकिन वास्तविक बदलाव के लिए क्षेत्रीय सहयोग (जैसे भारत-ईरान-चीन) जरूरी है। कुल मिलाकर, कड़े कदम संभव हैं, लेकिन धीमी गति से।

    शांति के लिए एकजुटता की जरूरत

    भारत की यह अपील दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। अफगानिस्तान में शांति सुनिश्चित करने से न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया लाभान्वित होगी। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को अब शब्दों से आगे बढ़कर कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि LeT-JeM जैसे संगठन कुचले जा सकें। भारत की सक्रिय भूमिका सराहनीय है, और उम्मीद है कि वैश्विक सहयोग से आतंकवाद का सफाया होगा।