हरितालिका तीज पर जानें पूजा विधि, 16 पत्र और कठिन नियमों का महत्व
हरितालिका तीज
हरितालिका तीज: सनातन परंपरा में हरितालिका तीज को अति विशिष्ट और महत्वपूर्ण व्रत माना गया है। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। शास्त्रीय नियमों के अनुसार द्वितीया से युक्त तृतीया वर्जित मानी गई है, जबकि चतुर्थी से युक्त तृतीया तिथि ग्राह्य और उत्तम मानी जाती है। सुहागवती महिलाएं पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत करती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए हरितालिका तीज का अनुष्ठान कर सकती हैं।
हरितालिका तीज पूजा विधि में मंडप और षोडशोपचार का विधान
हरितालिका तीज पर सबसे पहले घर में ताजे फूलों से सजा मंडप यानी फुलेरा बनाया जाता है। इसके नीचे शिव-गौरी के विग्रह को स्थापित कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद शिव-पार्वती के 108 नामों का स्मरण करते हुए 16 सुहाग पेटिका यानी सौभाग्य सामग्री अर्पित की जाती है और षोडशोपचार विधि से पूजा-अर्चना की जाती है। दूसरे दिन सुबह शिव-गौरी के सामने तिल और घी से हवन किया जाता है। इसके बाद आठ या सोलह सुहागन जोड़ों को भोजन कराकर सौभाग्य पेटिका भेंट करने के बाद व्रत का विसर्जन किया जाता है।
हरितालिका तीज में सर्वोषधि और 16 विशेष पत्तियों का महत्व
हरितालिका तीज की पूजा में कलश स्थापना के दौरान सर्वोषधि डालने का विधान बताया गया है। इसमें मुरा, जटामांसी, वच, कुष्ठ, शिलाजीत, हल्दी, दारूहल्दी, सठी, चंपक और मुस्ता शामिल हैं। इसके अलावा भगवान शिव और माता पार्वती को 16 विशेष पत्र अर्पित करने की परंपरा है। इनमें बिल्वपत्र को अखंड सौभाग्य, जातीपत्र को संतान सुख, सेवंतिका को दांपत्य जीवन में मधुरता और बांस के पत्तों को वंश वृद्धि व निरोगता से जोड़ा गया है। वहीं देवदार पत्र ऐश्वर्य और कीर्ति, चंपा पत्र सौंदर्य व स्वास्थ्य तथा कनेर पत्र यश और मानसिक शांति का प्रतीक माना गया है।
हरितालिका तीज के कठिन नियम, निर्जला व्रत और रात्रि जागरण
हरितालिका तीज का व्रत कठोर नियमों के लिए भी जाना जाता है। इसमें अन्न और जल का पूर्ण त्याग करने का विधान बताया गया है और अगले दिन सूर्योदय के बाद पूजा व पारण करके ही जल ग्रहण किया जाता है। सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल से पूजा शुरू होती है और बालू रेत या काली मिट्टी से शिव, पार्वती और गणेश जी की प्रतिमाएं बनाकर आठों प्रहर पूजा की जाती है। व्रत के दौरान पूरी रात जागकर शिव-पार्वती के मंगल गीत, लोकगीत और भजन-कीर्तन करने का भी विधान है।
हरितालिका तीज में कथा श्रवण और नियमों का पालन जरूरी
हरितालिका तीज के पूजन में व्रत कथा सुनने का भी विशेष महत्व बताया गया है। स्रोत के अनुसार, कथा श्रवण के बिना व्रत पूर्ण नहीं माना जाता। पूजा स्थल पर चौकी रखकर केले के पत्ते बिछाने, मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करने तथा माता पार्वती को सुहाग सामग्री और शिवजी को धोती-अंगोछा अर्पित करने का विधान है। कथा सुनने के बाद रात्रि जागरण किया जाता है। अगले दिन सुबह माता पार्वती को सिंदूर अर्पित कर हलवे का भोग लगाने के बाद व्रत खोलने की परंपरा बताई गई है।
