ममता बनर्जी ने उपचुनाव से बनाई दूरी, क्या राष्ट्रीय राजनीति पर है बड़ा दांव?
ममता बनर्जी
ममता बनर्जी: तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अगले महीने होने वाले विधानसभा उपचुनावों में चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। मौजूदा और पूर्व सहयोगियों की ओर से चुनाव लड़ने के आग्रह के बावजूद ममता बनर्जी के इस फैसले ने उनकी आगे की राजनीतिक रणनीति को लेकर चर्चा तेज कर दी है। इस साल बीजेपी की जीत के साथ पश्चिम बंगाल में उनका 15 साल का लगातार शासन खत्म हुआ और उनके पूर्व करीबी सहयोगी से विरोधी बने सुवेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बने।
ममता बनर्जी का फोकस संगठन और विपक्षी एकता पर
चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी ने कई बार तृणमूल कांग्रेस को जमीनी स्तर पर मजबूत करने और विपक्षी इंडिया ब्लॉक को मजबूत करने की इच्छा जताई है। उन्होंने बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता पर जोर दिया है। खास बात यह है कि अब ममता बनर्जी ने कभी उनके कट्टर विरोधी रहे कम्युनिस्टों और 1998 में उनसे अलग हुई कांग्रेस की ओर भी गठबंधन का हाथ बढ़ाया है। उनके समर्थक उन्हें इंडिया ब्लॉक के नामकरण से भी जोड़ते रहे हैं।
तृणमूल के भीतर संगठन और नेतृत्व को लेकर संघर्ष
तृणमूल कांग्रेस के बंटवारे के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट पार्टी के असली नाम और उनके बनाए ‘दो फूलों’ वाले चुनाव चिह्न को बनाए रखने के लिए रिताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी गुट से संघर्ष कर रहा है। पार्टी पर धोखाधड़ी, गबन, रिश्वतखोरी, जबरन वसूली और तस्करी जैसे आरोपों ने भी दबाव बढ़ाया है। ममता बनर्जी ने कभी पार्टी नेताओं को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई और नेतृत्व समितियों में बदलाव किए, लेकिन उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के संगठन पर बढ़ते नियंत्रण को लेकर भी चर्चा होती रही है। उन्होंने जमीनी स्तर से पार्टी को फिर खड़ा करने का वादा किया है।
रेजीनगर और नंदीग्राम उपचुनाव बने अहम परीक्षा
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के लिए 6 अक्टूबर को होने वाले रेजीनगर और नंदीग्राम उपचुनाव अहम माने जा रहे हैं। रेजीनगर से हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी को चुनाव लड़ने का न्योता दिया था और जीत का भरोसा जताया था। वहीं रिताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने कहा कि अगर ममता नंदीग्राम से चुनाव लड़ती हैं तो वे वहां उम्मीदवार नहीं उतारेंगे। दोनों सीटों पर पहले जीत दर्ज करने वाले हुमायूं कबीर और सुवेंदु अधिकारी ने अपनी-अपनी सीटों से इस्तीफा दिया था।
ममता बनर्जी की राष्ट्रीय भूमिका पर फिर चर्चा
ममता बनर्जी के उपचुनाव से दूरी बनाने के फैसले के बीच उनकी राष्ट्रीय राजनीतिक भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज है। कुछ नेताओं का मानना है कि उनके व्यक्तिगत संबंध 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों को फिर साथ ला सकते हैं। वहीं कुछ जानकार इंडिया गठबंधन को मजबूत करने के उनके जोर को राष्ट्रीय विपक्षी नेतृत्व की महत्वाकांक्षा से जोड़कर देखते हैं। इस बीच मुर्शिदाबाद की दोनों सीटों पर बीजेपी के दूसरे और तृणमूल के तीसरे स्थान पर रहने का उल्लेख भी राजनीतिक बदलाव की ओर इशारा करता है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट का मानना है कि पार्टी पर पूरी पकड़ हासिल करने के बाद बीजेपी के मुकाबले विपक्षी एकता जरूरी होगी।
