TMC पार्टी नाम और चुनाव चिह्न विवाद: चुनाव आयोग के फैसले से बढ़ी सियासी हलचल
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में TMC पार्टी नाम और चुनाव चिह्न विवाद अब चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के बीच पार्टी के नाम और आरक्षित ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न को लेकर खींचतान चल रही है। 17 सितंबर को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए दोनों गुटों को आगामी उपचुनाव में ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया। यह व्यवस्था अंतिम निर्णय तक लागू रहेगी।
TMC पार्टी नाम और चुनाव चिह्न विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
TMC पार्टी नाम और चुनाव चिह्न विवाद की शुरुआत मई में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद सामने आई। 3 जून को 58 बागी विधायकों ने पार्टी के विधायी दल पर अपना दावा पेश किया और ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना। इसके बाद 22 जून को ऋतब्रत गुट ने ममता बनर्जी को हटाकर अरूप रॉय को पार्टी अध्यक्ष घोषित किया और समानांतर संगठनात्मक ढांचा पेश किया। दोनों गुटों ने खुद को असली टीएमसी बताते हुए पार्टी के संगठन, नाम और चुनाव चिह्न पर दावा किया।
चुनाव आयोग ने TMC विवाद में क्या फैसला दिया?
TMC पार्टी नाम और चुनाव चिह्न विवाद पर चुनाव आयोग ने फिलहाल किसी एक गुट को मूल पार्टी का नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न नहीं दिया है। दोनों गुटों को आगामी उपचुनाव के लिए अलग नाम और फ्री सिंबल चुनने को कहा गया। ममता गुट को ‘ममता अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ नाम और फुटबॉल खिलाड़ी चुनाव चिह्न मिला, जबकि ऋतब्रत गुट को ‘लोकतांत्रिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और लिफाफा चुनाव चिह्न आवंटित किया गया। आयोग के मुताबिक अंतिम निर्णय के लिए चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत विस्तृत फैसला जरूरी है।
चुनाव चिह्न का आवंटन और TMC पार्टी नाम विवाद में नियम क्या हैं?
भारत में चुनाव चिह्नों का निर्धारण, आरक्षण और आवंटन निर्वाचन आयोग करता है। इसके लिए Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 लागू है। चुनाव चिह्न दो प्रमुख श्रेणियों में होते हैं—आरक्षित चुनाव चिह्न और फ्री सिंबल। मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय दलों के लिए आरक्षित चिह्न तय होते हैं, जबकि गैर-आरक्षित चिह्न फ्री सिंबल कहलाते हैं। पार्टी में विभाजन की स्थिति में आयोग पैरा 15 के तहत उपलब्ध तथ्यों, संगठनात्मक ढांचे, पार्टी संविधान, संगठनात्मक चुनाव, विधायी दल के समर्थन और दोनों पक्षों के दस्तावेजों पर विचार कर सकता है।
TMC से पहले भी कई पार्टियों में हुआ चुनाव चिह्न विवाद
TMC पार्टी नाम और चुनाव चिह्न विवाद भारत में इस तरह का पहला मामला नहीं है। एनसीपी में शरद पवार और अजित पवार गुट के बीच विवाद के बाद आयोग ने अजित पवार गुट को ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न दिया। शिवसेना में एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुट के विवाद के दौरान ‘धनुष और तीर’ चिह्न को अंतरिम रूप से फ्रीज किया गया और दोनों पक्षों को अलग पहचान दी गई। एआईएडीएमके, एलजेपी, कांग्रेस और सीपीआई में भी अलग-अलग समय पर पार्टी विभाजन और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद सामने आ चुके हैं। ऐसे में अब TMC पार्टी नाम और चुनाव चिह्न विवाद पर चुनाव आयोग के अंतिम फैसले का इंतजार है।
