September 25, 2026

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सुप्रीम कोर्ट पॉक्सो एक्ट गाइडलाइन: वैवाहिक विवाद में POCSO के दुरुपयोग पर सख्त निर्देश

सुप्रीम कोर्ट पॉक्सो एक्ट गाइडलाइन

सुप्रीम कोर्ट पॉक्सो एक्ट गाइडलाइन

सुप्रीम कोर्ट पॉक्सो एक्ट गाइडलाइन के जरिए वैवाहिक विवाद और बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में POCSO कानून के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई गई है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाए गए इस कानून का इस्तेमाल पति-पत्नी के बीच कानूनी बढ़त हासिल करने के लिए नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और विशेष पॉक्सो अदालतों के लिए कई अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

कस्टडी विवाद में दर्ज POCSO केस का मामला

सुप्रीम कोर्ट पॉक्सो एक्ट गाइडलाइन का यह मामला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। 2024 में एक मां ने पिता पर अपनी 9 साल की बेटी के यौन शोषण का आरोप लगाया था। मामले की सीबीआई जांच में यह सामने आया कि बच्ची की कस्टडी हासिल करने के लिए कथित तौर पर झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इसके बाद जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने बच्चे की कस्टडी दोबारा पिता को सौंप दी।

गिरफ्तारी से पहले अब पुलिस को बरतनी होगी सावधानी

सुप्रीम कोर्ट पॉक्सो एक्ट गाइडलाइन के तहत वैवाहिक विवाद के दौरान दर्ज POCSO मामलों में पुलिस तत्काल या रूटीन गिरफ्तारी नहीं कर सकेगी। गिरफ्तारी तभी की जाएगी, जब अपराध होने की पर्याप्त और पुख्ता जानकारी हो। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों में जल्दबाजी में उठाया गया कदम निर्दोष पक्ष के लिए गंभीर सामाजिक और कानूनी नुकसान का कारण बन सकता है।

बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ की राय होगी जरूरी

सुप्रीम कोर्ट पॉक्सो एक्ट गाइडलाइन में गिरफ्तारी से पहले बाल मनोवैज्ञानिक या बाल मनोचिकित्सक से बच्चे का निष्पक्ष आकलन कराने की बात कही गई है। विशेषज्ञ बच्चे से बातचीत कर स्वतंत्र राय देंगे। योग्य विशेषज्ञ के चयन के लिए जिला बाल संरक्षण इकाई यानी DCPU से सलाह ली जाएगी। जांच अधिकारी को गिरफ्तारी का फैसला लेने से पहले विशेषज्ञ की रिपोर्ट समेत अन्य सभी सबूतों पर गंभीरता से विचार करना होगा।

कोर्ट में सीधे शिकायत पर भी विशेष सावधानी

सुप्रीम कोर्ट पॉक्सो एक्ट गाइडलाइन के मुताबिक, अगर कोई माता-पिता BNSS की धारा 33 के तहत सीधे अदालत में शिकायत दर्ज कराते हैं, तो जज को संज्ञान लेने और आरोपी को समन जारी करने से पहले बच्चे का मूल्यांकन बाल मनोचिकित्सक से कराना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस आदेश की जानकारी देश के सभी थानों और फैमिली कोर्ट तक पहुंचाई जाए। इसके लिए कोर्ट की रजिस्ट्री को फैसले की कॉपी सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और हाईकोर्ट को भेजने का निर्देश दिया गया है।

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