नाना पाटेकर: रंगमंच से सिनेमा तक ऐसा रहा दिग्गज अभिनेता का सफर
नाना पाटेकर
भारतीय रंगमंच और सिनेमा के चर्चित अभिनेता नाना पाटेकर के निधन की खबर से कला और सिनेमा की दुनिया में शोक की लहर है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, गोवा में दिल का दौरा पड़ने से नाना पाटेकर का निधन हुआ। नाना पाटेकर को ऐसे अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने अपने अभिनय में स्वाभाविकता और यथार्थवाद को खास जगह दी। उन्होंने सिर्फ किरदार निभाने के बजाय अपनी संवाद अदायगी और अभिनय शैली से पर्दे पर अलग पहचान बनाई।
नाना पाटेकर का संघर्ष और मुंबई का शुरुआती दौर
नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। शुरुआती जीवन में उन्हें आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा। 9वीं कक्षा में उनके पिता के कपड़े के कारोबार में भारी नुकसान हुआ, जिसके बाद परिवार आर्थिक संकट में आ गया। मुंबई में सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से विजुअल आर्ट्स की पढ़ाई के दौरान नाना सिनेमा के पोस्टर और बैनर पेंट कर अपनी आजीविका चलाते थे। इसके बाद उन्होंने विज्ञापन क्षेत्र में काम किया, लेकिन उनकी रुचि धीरे-धीरे रंगमंच की ओर बढ़ी।
मराठी रंगमंच ने नाना पाटेकर को दी अलग पहचान
नाना पाटेकर के अभिनय सफर में मराठी रंगमंच की अहम भूमिका रही। विजया मेहता ने उनकी अभिनय क्षमता को पहचाना और उन्हें यथार्थवादी अभिनय पद्धतियों से परिचित कराया। ‘हमीदाबाईची कोठी’, ‘पुरुष’ और ‘कथा’ जैसे नाटकों में नाना पाटेकर के अभिनय ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। ‘पुरुष’ में गुलाबराव का किरदार खास तौर पर चर्चित रहा और इस नाटक के 1900 से अधिक शो हुए। उनकी संवाद-अदायगी में छोटे-छोटे वाक्य, ठहराव और अचानक आने वाली रुकावटें उनकी खास शैली का हिस्सा बनीं।
नाना पाटेकर की फिल्मों ने बदली अभिनय की भाषा
नाना पाटेकर ने मराठी और हिंदी सिनेमा में कई यादगार भूमिकाएं निभाईं। ‘सिंहासन’, ‘माफीचा साक्षीदार’, ‘दिशा’, ‘नटसम्राट’ और ‘आपला मानूस’ जैसी मराठी फिल्मों के साथ उन्होंने हिंदी सिनेमा में भी अपनी अलग पहचान बनाई। ‘अंकुश’, ‘परिंदा’, ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’, ‘क्रांतिवीर’ और ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग किरदारों ने अभिनय की विविधता दिखाई। ‘क्रांतिवीर’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, जबकि ‘परिंदा’ में उनके अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।
नाना पाटेकर का सामाजिक सरोकार भी रहा खास
नाना पाटेकर का जुड़ाव सामाजिक कार्यों से भी रहा। 2015 में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ में सूखे और किसानों की समस्याओं के बीच उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाम फाउंडेशन की स्थापना की। फाउंडेशन ने किसानों के परिवारों को आर्थिक मदद देने के साथ कई गांवों में जल संरक्षण से जुड़े काम किए। नाना पाटेकर का जीवन रंगमंच, सिनेमा और सामाजिक सरोकारों के बीच उनके लंबे सफर को दर्शाता है। उनका अभिनय आम भाषा, यथार्थवादी संवाद और किरदार की गहराई के लिए याद किया जाता रहेगा।
