August 25, 2026

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जस्टिस अभय ओका का बड़ा बयान: मौलिक अधिकार और आजादी खतरे में

सरकारों का रवैया और मौलिक अधिकारों पर खतरा

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय ओका ने हाल ही में सरकारों के रवैये पर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि लोगों की बोलने की आजादी और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में है। जस्टिस ओका, जिन्होंने 22 वर्षों तक न्यायाधीश के रूप में सेवा की, ने यह टिप्पणी मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद एक साक्षात्कार में की। उन्होंने इस दौरान यह भी कहा कि सरकारें, चाहे किसी भी दल की हों, हमेशा से लोगों के मौलिक अधिकारों पर हमला करती रही हैं। उनके अनुसार, इतिहास इस बात का गवाह है कि सत्ता में मौजूद सरकारें लगातार नागरिकों के अधिकारों को कम करने की कोशिश करती हैं। यह बयान मौजूदा समय में लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रता की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाता है।

न्यायपालिका में सुधार की आवश्यकता

जस्टिस ओका ने न्यायपालिका में सुधार की जरूरत पर भी बल दिया। उन्होंने जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की वकालत की, जिससे जनता का न्यायपालिका पर भरोसा और मजबूत हो। उनके अनुसार, एक पारदर्शी और निष्पक्ष नियुक्ति प्रणाली न केवल न्यायपालिका की विश्वसनीयता बढ़ाएगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगी कि सही लोग इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए चुने जाएं। जस्टिस ओका का मानना है कि ऐसी प्रणाली से न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास बढ़ेगा, जो लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक है।

जस्टिस अभय ओका का शानदार करियर

जस्टिस अभय ओका का करियर न्याय के क्षेत्र में प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने अपने पिता के चैंबर में ठाणे जिला न्यायालय से वकालत शुरू की थी। उनकी मेहनत और प्रतिभा ने उन्हें अगस्त 2003 में बॉम्बे हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश बनाया, और नवंबर 2005 में उन्हें स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया। मई 2019 में, उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। इसके बाद, अगस्त 2021 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। अपने कार्यकाल के दौरान, जस्टिस ओका ने कई ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले दिए, जो भारतीय न्यायपालिका में उनके योगदान को रेखांकित करते हैं। वे 24 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए।

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लोगों के अधिकारों की रक्षा की जरूरत

जस्टिस ओका का यह बयान आज के समय में बेहद प्रासंगिक है, जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकारों को लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए जवाबदेह होना चाहिए। उनके विचार न केवल न्यायपालिका के लिए, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए एक चेतावनी हैं कि हमें अपनी आजादी और अधिकारों को संरक्षित करने के लिए सजग रहना होगा। जस्टिस ओका का यह बयान हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि एक मजबूत और निष्पक्ष न्यायपालिका ही लोकतंत्र का आधार है।

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