शी जिनपिंग-किम जोंग उन बैठक से क्या बदलेगा एशिया का समीकरण?
एशिया की राजनीति में अगले हफ्ते एक अहम कूटनीतिक घटनाक्रम होने जा रहा है। शी जिनपिंग उत्तर कोरिया दौरा करने वाले हैं, जहां वह उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से मुलाकात करेंगे। चीन और उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया के अनुसार यह यात्रा 8 और 9 जून को होगी। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब रूस, चीन और उत्तर कोरिया के बीच बदलते रिश्ते पूरी दुनिया की नजर में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक औपचारिक यात्रा नहीं बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से जुड़ा बड़ा संदेश भी हो सकता है।
आखिर अभी क्यों हो रहा है शी जिनपिंग उत्तर कोरिया दौरा?
शी जिनपिंग उत्तर कोरिया दौरा ऐसे समय हो रहा है जब कुछ ही सप्ताह पहले चीन ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी की थी। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और उत्तर कोरिया के बीच रिश्ते तेजी से मजबूत हुए हैं। कभी उत्तर कोरिया पर चीन का प्रभाव सबसे ज्यादा माना जाता था, लेकिन अब रूस भी प्योंगयांग का अहम साझेदार बन चुका है। ऐसे में माना जा रहा है कि बीजिंग अपने पुराने प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह यात्रा चीन की उस रणनीति का हिस्सा हो सकती है, जिसके जरिए वह उत्तर कोरिया को यह संदेश देना चाहता है कि उसका सबसे बड़ा साझेदार अब भी चीन ही है।
चीन और उत्तर कोरिया का रिश्ता इतना खास क्यों है?
शी जिनपिंग उत्तर कोरिया दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दोनों देशों के बीच लंबे समय से बेहद करीबी संबंध रहे हैं। चीन उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक और राजनीतिक सहयोगी है। दोनों देशों के बीच करीब 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा है। इसके अलावा दोनों के बीच रक्षा संधि भी मौजूद है, जिसके तहत किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में दूसरा उसकी मदद करेगा। दिलचस्प बात यह है कि यह चीन की किसी भी देश के साथ एकमात्र सैन्य संधि है। इस वर्ष इस समझौते के 65 साल पूरे हो रहे हैं, जिससे इस यात्रा का महत्व और बढ़ गया है।
क्या पुतिन और किम की बढ़ती दोस्ती से चिंतित है चीन?
पिछले कुछ वर्षों में रूस और उत्तर कोरिया के संबंधों में जबरदस्त मजबूती आई है। यूक्रेन युद्ध के दौरान उत्तर कोरिया ने रूस को हथियार और सैनिक सहायता दी, जबकि बदले में रूस ने आर्थिक और तकनीकी सहयोग बढ़ाया। यही वजह है कि शी जिनपिंग उत्तर कोरिया दौरा को रूस-उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकियों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि चीन नहीं चाहता कि उत्तर कोरिया पूरी तरह रूस के प्रभाव क्षेत्र में चला जाए। इसलिए बीजिंग अब अपने पुराने सहयोगी के साथ रिश्तों को और मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर किम जोंग उन भी रूस के साथ संबंधों का इस्तेमाल चीन से अधिक आर्थिक और राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए कर सकते हैं।
पहले से ज्यादा मजबूत क्यों माने जा रहे हैं किम जोंग उन?
कुछ साल पहले तक किम जोंग उन अंतरराष्ट्रीय दबाव और आर्थिक प्रतिबंधों के कारण कमजोर स्थिति में दिखाई दे रहे थे। लेकिन हालात अब काफी बदल चुके हैं। कोविड महामारी के बाद जब उत्तर कोरिया धीरे-धीरे दुनिया से दोबारा जुड़ा, तब रूस के साथ उसके संबंध तेजी से मजबूत हुए। इसके चलते उसे तेल, खाद्य सामग्री, तकनीक और आर्थिक सहायता मिलने लगी। ऐसे में शी जिनपिंग उत्तर कोरिया दौरा किम जोंग उन के लिए भी काफी अहम माना जा रहा है। वह दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि उत्तर कोरिया अब पहले से ज्यादा मजबूत और आत्मनिर्भर स्थिति में है। हाल के महीनों में चीन ने बीजिंग और प्योंगयांग के बीच ट्रेन और विमान सेवाएं भी फिर से शुरू की हैं, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में नई सक्रियता दिखाई दे रही है।
क्या परमाणु कार्यक्रम पर हो सकती है बड़ी चर्चा?
शी जिनपिंग उत्तर कोरिया दौरा के दौरान परमाणु मुद्दा भी चर्चा का केंद्र रह सकता है। चीन लंबे समय से कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने की बात करता रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में चीन का रुख पहले की तुलना में काफी नरम दिखाई दिया है। वहीं अमेरिका लगातार उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता जताता रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कई बार संकेत दे चुके हैं कि वह किम जोंग उन के साथ फिर से बातचीत करना चाहते हैं। लेकिन उत्तर कोरिया का रुख साफ है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को बातचीत की शर्त नहीं बनाएगा। किम जोंग उन परमाणु हथियारों को अपनी सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी मानते हैं और उनका मानना है कि यही उन्हें बाहरी दबावों से बचाते हैं।
इस बैठक से दुनिया को क्या संदेश मिल सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार शी जिनपिंग उत्तर कोरिया दौरा सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। यह यात्रा रूस, अमेरिका और एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच चीन की भूमिका को भी दर्शाएगी। किम जोंग उन जहां अपने बढ़ते प्रभाव का प्रदर्शन करना चाहते हैं, वहीं चीन यह दिखाना चाहता है कि उत्तर कोरिया आज भी उसके रणनीतिक दायरे का अहम हिस्सा है। आने वाले दिनों में इस बैठक से निकलने वाले संकेत एशिया की राजनीति, परमाणु मुद्दे और वैश्विक शक्ति संतुलन पर असर डाल सकते हैं।