August 29, 2026

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राहुल गांधी की नई रणनीति: बिहार में कांग्रेस का जोरदार आगाज़

सामाजिक न्याय की नई राजनीति

बिहार की सियासत में कांग्रेस एक बार फिर पूरे एक्शन मोड में नजर आ रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने नई रणनीति के साथ मैदान में उतरने का फैसला किया है। हाल ही में 15 दिन की वोट अधिकार यात्रा और 1300 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद पटना में विशाल रैली ने कांग्रेस के इरादों को साफ कर दिया है। अब सदाक़त आश्रम में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के साथ राहुल गांधी ने बिहार में अपनी सक्रियता और बढ़ा दी है। यह स्पष्ट है कि कांग्रेस अब बिहार में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। कार्यकर्ताओं में जोश है, और पार्टी का फोकस सामाजिक न्याय के जरिए अति पिछड़ा वर्ग को अपने पाले में लाने पर है।

अति पिछड़ा वर्ग पर नजर

बिहार में अति पिछड़ा वर्ग की आबादी करीब 36 फीसदी है, जो अब तक जदयू और बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक रहा है। राहुल गांधी इस वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसके लिए महागठबंधन की ओर से अति पिछड़ा सम्मेलन की तैयारी है। इस सम्मेलन में आरक्षण को संविधान की नौवीं सूची में शामिल करने जैसी बड़ी घोषणाएं हो सकती हैं, ताकि सुप्रीम कोर्ट में कोई कानूनी चुनौती न आए। यह कदम सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा बदलाव ला सकता है और अति पिछड़ों के बीच कांग्रेस की पैठ को मजबूत कर सकता है।

सहयोगियों का साथ

राहुल गांधी ने अपनी यात्रा में VIP पार्टी के नेता मुकेश सहनी को प्रमुखता से साथ रखा है। मुकेश सहनी का अति पिछड़ा वर्ग, खासकर मल्लाह समुदाय पर गहरा प्रभाव है। इसके अलावा, माले के दीपंकर भट्टाचार्य भी मंच पर नजर आए, जिनकी जमीनी पकड़ दलित और पिछड़े वर्गों में मजबूत है। कांग्रेस यह समझ चुकी है कि बिहार में यादव और मुस्लिम वोट आरजेडी के साथ हैं, लेकिन जीत के लिए दलित, सवर्ण और अति पिछड़ा वोटों का समर्थन जरूरी है।

दलित और महिला वोट पर फोकस

कांग्रेस ने पहले ही दलित प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। अब प्रियंका गांधी 26 सितंबर को बिहार में महिला एजेंडा लॉन्च करने जा रही हैं, जिससे महिला वोटरों को लुभाने की कोशिश होगी। इसके साथ ही, पार्टी 20 जिलों में प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उठाएगी। हर घर तक पर्चे बांटे जाएंगे, ताकि जनता तक कांग्रेस का संदेश पहुंचे।

क्या है चुनौती?

कांग्रेस का माहौल तो बन गया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या पार्टी का संगठन जमीनी स्तर पर उतना मजबूत है? क्या उसके पास बिहार में जीत दिलाने वाले चेहरे हैं? माहौल को वोट में बदलने की चुनौती अभी बाकी है। बिहार का चुनावी रणक्षेत्र कठिन है, और कांग्रेस की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपनी रणनीति को कितनी कुशलता से लागू कर पाती है।

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