August 28, 2026

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मोदी के खिलाफ नारे, संसद ठप, आरोप-माफी की राजनीति में अटका लोकतंत्र

भारत की संसद एक बार फिर हंगामे की भेंट चढ़ गई। लोकसभा और राज्यसभा—दोनों की कार्यवाही बाधित रही और इसकी वजह बनी राजनीति की वही पुरानी लड़ाई—आरोप और माफी। इस बार विवाद की जड़ बने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक नारे, जो कांग्रेस से जुड़ी एक रैली में लगाए जाने का दावा किया जा रहा है।

सत्तापक्ष का आरोप है कि ये नारे न केवल मर्यादा के खिलाफ हैं, बल्कि देश के सर्वोच्च पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले हैं। वहीं विपक्ष का कहना है कि ये नारे पार्टी की आधिकारिक लाइन नहीं थे और इसके लिए पूरे नेतृत्व से माफी मांगना अनुचित है। इसी टकराव ने संसद की कार्यवाही को पूरी तरह ठप कर दिया।

क्या है पूरा विवाद?

बीजेपी का दावा है कि हाल ही में आयोजित कांग्रेस की एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक और अपमानजनक नारे लगाए गए। सत्तापक्ष का कहना है कि ऐसे नारे लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि राजनीतिक मर्यादाओं का उल्लंघन हैं।
बीजेपी सांसदों ने संसद के भीतर जोरदार विरोध करते हुए मांग की कि कांग्रेस नेतृत्व सार्वजनिक रूप से माफी मांगे।

दूसरी ओर कांग्रेस का पक्ष है कि किसी भी रैली में लगाए गए नारे अगर गलत थे, तो वे व्यक्तिगत स्तर पर हो सकते हैं, पार्टी की आधिकारिक नीति नहीं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि संसद को ठप करना मुद्दों से ध्यान भटकाने की रणनीति है।

संसद क्यों ठप हुई?

इस मुद्दे पर दोनों सदनों में लगातार नारेबाज़ी, वॉकआउट और हंगामा देखने को मिला।

  • लोकसभा की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी
  • राज्यसभा भी हंगामे की भेंट चढ़ गई
  • प्रश्नकाल और ज़रूरी विधायी कामकाज प्रभावित हुआ

नतीजा यह रहा कि जनता से जुड़े अहम मुद्दे—महंगाई, बेरोज़गारी, किसानों की समस्याएं और आर्थिक सवाल—सब पीछे छूट गए।

जिम्मेदारी किसकी?

यहीं पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है— अगर नारे गलत थे, तो जिम्मेदारी किसकी है? और अगर सत्तापक्ष मानता है कि नारे लोकतंत्र के खिलाफ थे, तो क्या संसद को पूरी तरह ठप करना सही तरीका है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नारेबाज़ी की राजनीति अब संसद के भीतर भी उसी तरह हावी हो चुकी है, जैसे वह चुनावी रैलियों में दिखाई देती है। हर मुद्दा एक नैरेटिव बन जाता है—जिसमें समाधान से ज्यादा टकराव अहम हो जाता है।

लोकतंत्र बनाम राजनीतिक शोर

संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है, जहाँ बहस होनी चाहिए, सवाल उठने चाहिए और जवाब मिलने चाहिए। लेकिन जब आरोप-प्रत्यारोप ही केंद्र में आ जाएं, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर पड़ती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि

  • विरोध ज़रूरी है, लेकिन मर्यादा के साथ
  • सत्ता पक्ष को जवाबदेही से नहीं भागना चाहिए
  • विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी

सिर्फ शोर से न तो समाधान निकलता है और न ही जनता का भरोसा मजबूत होता है।

जनता क्या देख रही है?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा नुकसान जनता का होता है। टीवी स्क्रीन पर संसद का हंगामा चलता रहता है, लेकिन आम आदमी के सवाल अनसुने रह जाते हैं। लोग पूछ रहे हैं— क्या संसद सिर्फ नारे और माफी के लिए है? क्या राजनीतिक दल मुद्दों से ज्यादा आरोपों में उलझे रहेंगे? “मोदी के खिलाफ नारे, संसद ठप”—यह सिर्फ एक हेडलाइन नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की मौजूदा तस्वीर है। यह तस्वीर बताती है कि जब राजनीति में संवाद की जगह टकराव ले लेता है, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। जरूरत इस बात की है कि
नारे संसद के बाहर रहें और बहस संसद के भीतर हो वरना हर सत्र यूं ही ठप होता रहेगा—और जनता सिर्फ तमाशा देखती रह जाएगी।

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