February 14, 2026

दुर्गा पूजा 2025: शक्ति, भक्ति और संस्कृति का दिव्य महोत्सव – विजय का संदेश!

दुर्गा पूजा: भारत की सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक

भारत में दुर्गा पूजा मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक भव्य महोत्सव है जो भक्ति, शक्ति और रंग-बिरंगी संस्कृति का अनुपम संगम प्रस्तुत करता है। 2025 में यह पर्व 30 सितंबर से 9 अक्टूबर तक मनाया जाएगा, जब देश भर में माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना होगी। पश्चिम बंगाल की भव्य पंडालों से लेकर असम के कामाख्या मंदिर, उत्तर भारत की कुमारी पूजा और मैसूर के राजमहल की जीवंत झांकियों तक – हर क्षेत्र में दुर्गा पूजा अपनी अनूठी छाप छोड़ती है। चाहे कोलकाता की सड़कों पर ढाक की गूंज हो या दिल्ली के मंदिरों में आरती की लहरें, हर जगह एक ही माँ दुर्गा की उपस्थिति है, लेकिन रूप, परंपराएं और उत्साह अलग-अलग। यह पर्व न केवल आस्था जगाता है, बल्कि समाज को एकजुट कर एकता का संदेश देता है। यूनेस्को द्वारा 2021 में इसे अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया गया, जो इसकी वैश्विक महत्व को रेखांकित करता है।

महिषासुरमर्दिनी की कथा: बुराई पर अच्छाई की अमर विजय

दुर्गा पूजा का मूल आधार है माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच का महायुद्ध। पुराणों के अनुसार, जब महिषासुर जैसे असुरों के अत्याचार से देवता त्रस्त हो गए, तब ब्रह्मा, विष्णु, शिव सहित सभी देवताओं ने अपनी शक्तियों का संयोग कर माँ दुर्गा को अवतरित किया। दस भुजाओं वाली यह देवी सिंह पर सवार होकर असुरों का संहार करने निकलीं। नौ दिनों तक चले युद्ध के दसवें दिन, विजयादशमी पर माँ ने महिषासुर का वध किया, जो बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। यह कथा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि जीवन के हर संघर्ष में साहस और धैर्य का संदेश देती है। रामायण में भी श्रीराम ने रावण वध से पूर्व दुर्गा की पूजा की थी, जो इस पर्व को महाभारत काल से जोड़ती है। आज भी यह कथा नाट्य, नृत्य और पंडालों की सजावट के माध्यम से जीवंत हो उठती है।

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क्षेत्रीय विविधताएं: एक पर्व, अनेक रंग

दुर्गा पूजा की खूबसूरती इसकी विविधता में है। पश्चिम बंगाल में कोलकाता की पंडालें कला का अनोखा प्रदर्शन हैं – 2024 में 40,000 से अधिक पंडालें सजीं, जहां पारंपरिक बंगाली व्यंजन जैसे खिचुड़ी और मिठाइयां प्रसाद के रूप में वितरित होती हैं। असम के गुवाहाटी में कामाख्या मंदिर में दुर्गा को तंत्र साधना की देवी के रूप में पूजा जाता है, जबकि गुजरात में नवरात्रि के गरबा नृत्य के साथ अवसर आता है। उत्तर भारत में कन्या पूजा का महत्व है, जहां नन्ही लड़कियों को देवी का रूप मानकर भोजन कराया जाता है, जो महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है। दक्षिण भारत के मैसूर में राजपरिवार द्वारा आयोजित दशहरा उत्सव में हाथी पर मूर्ति यात्रा का नजारा लुभाता है। पूर्वोत्तर के त्रिपुरा और मणिपुर में जनजातीय नृत्य इस पर्व को आदिवासी संस्कृति से जोड़ते हैं। ये विविधताएं दर्शाती हैं कि दुर्गा पूजा कैसे भारत की एकता में विविधता को मजबूत करती है। पर्यटन के लिहाज से भी यह पर्व लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है।

आधुनिक संदेश: शक्ति, एकता और सशक्तिकरण का उत्सव

दुर्गा पूजा आज के दौर में महिलाओं की शक्ति, सामाजिक एकजुटता और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बन चुकी है। ढाक की थाप, आरती की ज्योति और ‘जय माँ दुर्गा’ के उद्घोष में छिपा है संदेश – अंत में सत्य की हमेशा जीत होती है। कोविड के बाद 2023 से पंडालों में कोविड प्रोटोकॉल के साथ-साथ सस्टेनेबल मूर्तियां बनाने का चलन बढ़ा है, जो इको-फ्रेंडली पूजा को प्रोत्साहित करता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि बुराई से लड़ने के लिए शक्ति, सच्चाई के लिए दृढ़ता और समाज के लिए एकजुटता जरूरी है। 2025 में, जब विश्व असुरक्षाओं से जूझ रहा है, दुर्गा पूजा हमें आशा की किरण देती है।

शुभकामनाएं: माँ दुर्गा की कृपा से विजयी बनें

इस दुर्गा पूजा पर आइए माँ से प्रार्थना करें – बुराई पर विजय, सत्य के लिए संघर्ष और एक मजबूत भारत की भावना के लिए। हर ढोल की ध्वनि में शक्ति जागृत हो, हर लौ में प्रकाश फैले। जय माँ दुर्गा! नवरात्रि और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं। आइए, इस महोत्सव में संस्कृति को संजोएं और नई ऊर्जा से आगे बढ़ें।

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