बिहार की राजनीति एक बार फिर इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई, जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और कुछ ही मिनटों बाद सीधे CM हाउस पहुंचे। वहां पहले से खड़े थे उनके बेटे निशांत कुमार, जिन्होंने अपने पिता का सादगी भरे अंदाज़ में स्वागत किया। यह पल तेज़ रोशनी, कैमरों की भीड़ और राजनीतिक शोर के बीच भी बेहद निजी और भावनात्मक था। कभी मीडिया से दूर रहने वाले निशांत का यह छोटा-सा gesto पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गया।
राजनीति की हलचल में पारिवारिक भावनाओं की छाप
राजनीति अक्सर सूखे आंकड़ों, जोड़-घटाव, दांव-पेंच और सत्ता की रणनीतियों के बीच दिखती है, लेकिन इस छोटे से पल ने साबित कर दिया कि ताकतवर पदों के पीछे भी एक संवेदनशील परिवार होता है। शपथ लेने के तुरंत बाद अपने बेटे के पास पहुंचना, यह संदेश देता है कि नीतीश कुमार भले ही बिहार की कमान संभालते हों, लेकिन पिता होने की ज़िम्मेदारी और प्यार उनसे पहले आता है।यह मुलाकात एक संकेत भी थी—कि पद और परिवार को संतुलित करना ही वास्तविक नेतृत्व है। राजनीति के निरंतर तूफान में यह मुलाकात एक गर्माहट भरी चिंगारी की तरह उभरी और जनता के दिल को छू गई।
निशांत कुमार की सादगी और दूर रहना एक अलग पहचान
निशांत, जो आमतौर पर राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं, शायद ही कभी सार्वजनिक तौर पर दिखाई देते हैं। न मीडिया से जुड़ाव, न सोशल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय उपस्थिति इन सबके बावजूद, यह मुलाकात बता गई कि वह पिता के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।उनके अभिवादन में कोई औपचारिकता नहीं थी, बस सम्मान, अपनापन और गर्व था। उनके चेहरे पर साफ झलकता था कि वे न केवल एक CM का स्वागत कर रहे हैं, बल्कि अपने पिता की उपलब्धि पर गर्व महसूस कर रहे हैं।
बिहार के लिए यह पल क्यों महत्वपूर्ण?
जब नेता बदलते हैं, गठबंधन बनते और टूटते हैं, सत्ता आती-जाती है ऐसे माहौल में एक मानवीय स्पर्श दुर्लभ होता है। यह मुलाकात केवल नीतीश और निशांत के बीच का संबंध नहीं थी, बल्कि यह संदेश भी था कि राजनीति लोगों के लिए है, परिवार इंसान की जड़ है। यह दृश्य बिहार के नागरिकों को उस मानवीय भाव की याद दिलाता है, जो कभी-कभी सत्ता की भीड़ में खो जाता है। नेताओं से उम्मीद केवल निर्णय लेने की नहीं, बल्कि उनकी संवेदनशीलता और परिवार से जुड़े रहना भी होता है।इस मुलाकात ने सिखाया कि चाहे नेता कितना ही बड़ा क्यों न हो, उसके निजी संबंध उसकी असली ताकत होते हैं।नीतीश कुमार और उनके बेटे निशांत का यह पल न सिर्फ भावनात्मक था, बल्कि यह इस बात की याद भी है कि परिवार, सत्ता से ऊपर की भावना है। बिहार की राजनीति में यह छोटी-सी घटना आने वाले समय में एक अनोखी तस्वीर की तरह याद रखी जाएगी जहां नेतृत्व और प्यार साथ चलते दिखे।

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