बांग्लादेश से सामने आ रही हालिया घटनाओं ने पूरे दक्षिण एशिया में चिंता और बहस को जन्म दे दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि चिटगांव के CRB इलाके में वेस्टर्न कपड़े पहनने पर दो युवतियों के साथ सरेआम मारपीट और अपमान किया गया। बताया जा रहा है कि इन युवतियों का “अपराध” सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत पसंद के कपड़े पहने थे।इन घटनाओं ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है क्या किसी भी समाज में कपड़ों के नाम पर हिंसा को जायज़ ठहराया जा सकता है?और क्या महिलाओं की आज़ादी अब भीड़ और सड़कों के फैसलों पर निर्भर है?
महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल
सोशल मीडिया पर वायरल फुटेज और स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, युवतियों को सार्वजनिक स्थान पर घेरा गया, डराया गया और कथित तौर पर पीटा गया। यदि ये दावे सही हैं, तो यह सिर्फ़ व्यक्तिगत हिंसा नहीं बल्कि महिलाओं की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि
- कपड़ों के आधार पर किसी को निशाना बनाना
- भीड़ द्वारा नैतिक पुलिसिंग करना
- और कानून की जगह डर का राज स्थापित होना
किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक संकेत हैं।
हिंदू युवक की कथित भीड़ हत्या: कानून-व्यवस्था पर सवाल
इन्हीं रिपोर्ट्स के बीच एक और दावा सामने आया है, जिसने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। बताया जा रहा है कि हिंदू युवक दीपु चंद्र दास को कथित तौर पर ब्लास्फ़ेमी (धार्मिक अपमान) के आरोप में भीड़ ने निशाना बनाया।रिपोर्ट्स में दावा है कि युवक को
- बेरहमी से पीटा गया,
- पेड़ से लटकाया गया,
- और बाद में आग लगा दी गई।
अगर ये आरोप सत्य हैं, तो यह घटना सिर्फ़ एक हत्या नहीं बल्कि भीड़तंत्र (Mob Lynching) और कानून-व्यवस्था की पूर्ण विफलता को दर्शाती है।
अल्पसंख्यकों में डर का माहौल?
बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर हिंदुओं, की सुरक्षा को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। ताज़ा घटनाओं ने उन आशंकाओं को और गहरा कर दिया है।विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसी घटनाओं पर तेज़, निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई नहीं होती, तो अल्पसंख्यकों का भरोसा राज्य व्यवस्था से उठ सकता है।
वैश्विक प्रतिक्रिया और दोहरा मापदंड?
एक और सवाल जो सोशल मीडिया पर उठ रहा है, वह यह है कि जब दुनिया के किसी और हिस्से में ऐसी घटनाएं होती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं।लेकिन जब पीड़ित हिंदू या अल्पसंख्यक समुदाय से हों, तो क्या वैश्विक आवाज़ें उतनी ही बुलंद रहती हैं?यह सवाल किसी धर्म के खिलाफ़ नहीं, बल्कि हिंसा के खिलाफ़ और समान मानवाधिकारों की मांग है।

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