लद्दाख में हिंसा का काला अध्याय: राज्यhood की मांग ने लिया खतरनाक मोड़

लद्दाख, हिमालय की गोद में बसा शांतिपूर्ण क्षेत्र, जो कभी बौद्ध संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और सौहार्द का प्रतीक था, आज आंसू गैस, गोलीबारी और आग की लपटों से गूंज रहा है। लेह में 24 सितंबर 2025 को राज्यhood और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर शुरू हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने अचानक हिंसक रूप धारण कर लिया। चार निर्दोष जानें गईं, 80 से अधिक लोग घायल हुए, बीजेपी कार्यालय में आग लगा दी गई और पुलिस वाहनों पर हमला किया गया। पुलिस ने 50 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें कांग्रेस पार्षद स्टैनजिन त्सेपाग भी शामिल हैं। वायरल वीडियो और फोटो इस हिंसा को सुनियोजित साजिश का रूप देते हैं, लेकिन सवाल उठता है—क्या यह आंदोलन लोकतंत्र की आवाज है या राजनीतिक उकसावे का नतीजा? आइए, इस संकट की गहराई समझें।

प्रदर्शन का उदय: राज्यhood से हिंसा तक का सफर

यह आंदोलन नया नहीं है। 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, लेकिन विधानसभा के बिना स्थानीय लोकतंत्र की कमी ने असंतोष को जन्म दिया। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) ने राज्यhood, छठी अनुसूची (जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष संरक्षण), स्थानीय नौकरियों में आरक्षण, लेह-करगिल के लिए अलग लोकसभा सीटें और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर लंबे समय से संघर्ष किया है।

24 सितंबर को LAB की युवा इकाई ने बंद का आह्वान किया, जो पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के 10 सितंबर से शुरू हुए 15 दिवसीय अनशन से प्रेरित था। एनडीएस मेमोरियल ग्राउंड पर हजारों लोग जमा हुए, नारे लगाए, लेकिन प्रदर्शन के दौरान भीड़ उग्र हो गई। पत्थरबाजी, आगजनी और पुलिस पर हमले हुए। आंसू गैस और लाठीचार्ज के बाद पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई, जिसमें चार युवाओं की मौत हो गई। बीजेपी कार्यालय और सीआरपीएफ वाहन जला दिए गए। सोनम वांगचुक ने अनशन समाप्त कर हिंसा की निंदा की, लेकिन कहा कि युवाओं का गुस्सा बेरोजगारी और अधिकारों की अनदेखी से उपजा है।

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राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप: साजिश या स्वाभाविक विद्रोह?

बीजेपी ने कांग्रेस और सोनम वांगचुक पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया। गृह मंत्रालय ने वांगचुक के “उकसाने वाले बयानों” को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि 6 अक्टूबर को केंद्र के साथ बैठक तय थी, फिर भी “मॉब” ने हिंसा की। वांगचुक ने खुद को “बलि का बकरा” बताया और कहा कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण था। कांग्रेस ने इसे “बीजेपी की नाकामी” करार दिया, कहा कि लद्दाख की मांग वैध है और केंद्र ने वादे पूरे नहीं किए। पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. करण सिंह ने युवाओं के असंतोष को मान्यता दी।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह राजनीतिक रंग ले चुका आंदोलन है। लेह (बौद्ध बहुल) और करगिल (मुस्लिम बहुल) के बीच ऐतिहासिक मतभेद थे, लेकिन अब दोनों एकजुट हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में युवा “जन-जेड” पीढ़ी का गुस्सा दिखता है, जो नौकरियों और पहचान के संकट से जूझ रही है। लेकिन नेतृत्व में सियासी चेहरों का आना हिंसा को बढ़ावा दे सकता है, जैसा कि मणिपुर जैसे मामलों में देखा गया।

केंद्र के कदम: वादे पूरे या अपर्याप्त?

सरकार का दावा है कि लद्दाख के लिए कई कदम उठाए गए हैं। जून 2025 में 85% स्थानीय नौकरियों में आरक्षण, डोमिसाइल नीति, महिलाओं के लिए 33% पंचायत आरक्षण, अनुसूचित जनजातियों के लिए कोटा वृद्धि और लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई। दो हिल डेवलपमेंट काउंसिल (लेह और करगिल) को मजबूत किया गया, जो भूमि, विकास और कर पर अधिकार रखते हैं। केंद्र ने 13 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा, 12 जीडब्ल्यूएच बैटरी स्टोरेज और ग्रीन हाइड्रोजन बसों का वादा किया है।

हाई-पावर्ड कमिटी और उप-समिति के माध्यम से बातचीत चल रही है, पिछली बैठक मई 2025 में हुई थी। लेकिन आंदोलनकारी कहते हैं कि छठी अनुसूची जैसी संवैधानिक सुरक्षा के बिना ये अपर्याप्त हैं, जो असम-मेघालय जैसे राज्यों में जनजातीय स्वायत्तता सुनिश्चित करती है। सवाल है—क्यों ठीक बैठक से पहले हिंसा? क्या यह सरकार की चुप्पी का नतीजा है?

लद्दाख का भविष्य: शांति या संकट की आग?

25 सितंबर को लेह में कर्फ्यू लगा, स्कूल-कॉलेज बंद, भारी सुरक्षा बल तैनात। लद्दाख ब्यूडिस्ट एसोसिएशन ने हिंसा की निंदा की, कहा कि युवा शांति चाहते हैं। फारूक अब्दुल्ला ने युवाओं के गुस्से को समझा, लेकिन संवाद की अपील की।

यह संकट सिर्फ स्थानीय नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। चीन और पाकिस्तान से सटे लद्दाख में स्थिरता जरूरी है। आंदोलन को राजनीतिकरण से बचाना होगा। लद्दाख को आवाज चाहिए, लेकिन हिंसा से नहीं। लोकतंत्र में मांगें संवाद से हल होती हैं, न कि आगजनी से। केंद्र को 6 अक्टूबर की बैठक में ठोस कदम उठाने होंगे, वरना यह आग पूरे हिमालय को भस्म कर सकती है। लद्दाख की शांति भारत की शांति है—समय आ गया है कि वादों को हकीकत में बदला जाए।

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