हर साल की तरह इस वर्ष भी ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन भव्य रूप से किया जा रहा है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एक महान विरासत है, जिसमें श्रद्धालु देश-दुनिया से पहुंचते हैं और भगवान जगन्नाथ की भक्ति में लीन हो जाते हैं।
जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व
पुरी की रथ यात्रा तीन मुख्य देवताओं—भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा—के रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा का प्रतीक है। यह यात्रा लगभग 3 किलोमीटर लंबी होती है और इस दौरान लाखों श्रद्धालु रथों की रस्सियां खींचते हैं। मान्यता है कि रथ खींचने मात्र से ही सभी पापों का नाश होता है और ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।
इस साल की विशेषताएं
2025 की रथ यात्रा पहले से कहीं अधिक भव्य और भक्तिपूर्ण हो रही है। दूसरे दिन की यात्रा में भी लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी है। पुरी के हर कोने से “जय जगन्नाथ” के नारों की गूंज सुनाई देती है। हर भक्त की आंखों में भक्ति और चेहरे पर आस्था की चमक देखी जा सकती है।
रथ यात्रा की प्रक्रिया
यात्रा की शुरुआत जगन्नाथ मंदिर से होती है, जहां से तीनों देवताओं के रथ—नंदीघोष (भगवान जगन्नाथ), तालध्वज (बलभद्र) और दर्पदलन (सुभद्रा)—गुंडिचा मंदिर की ओर बढ़ते हैं। इन रथों को विशेष रूप से हर साल नई लकड़ियों से तैयार किया जाता है।
सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था
पुरी प्रशासन ने इस यात्रा के लिए अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था की है। जगह-जगह CCTV कैमरे लगाए गए हैं, ड्रोन की मदद से निगरानी हो रही है और हजारों पुलिस कर्मी और स्वयंसेवक सेवा में लगे हैं। हर श्रद्धालु की सुविधा और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
धार्मिक और सांस्कृतिक पहलू
जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी है। इसके जरिए भारत की परंपरा, एकता और समर्पण की भावना उजागर होती है। यह आयोजन ओडिशा ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गौरव का विषय है।
जनता की भागीदारी
लाखों लोग इस यात्रा में शामिल होते हैं—कुछ रथ खींचते हैं, कुछ दर्शन करते हैं, और कुछ सेवा कार्यों में लगे होते हैं। हर किसी की यही भावना होती है कि भगवान जगन्नाथ की कृपा उन्हें और उनके परिवार को मिले।

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