पश्चिम बंगाल के कोलकाता के पास स्थित मध्यमग्राम में अचानक सैकड़ों परिवार अपने घरों को छोड़कर भागने लगे। गलियों में ताले लगे घर, खाली झोपड़ियां और एक अजीब सा डर पूरे वातावरण में छाया हुआ दिखाई दिया। लोग ये सवाल कर रहे हैं आखिर ऐसा क्या हुआ कि पूरी बस्ती रातों-रात खाली हो गई?दरअसल, इस इलाके में SIR (Special Summary Revision) की प्रक्रिया चल रही है। यह एक सामान्य सरकारी प्रक्रिया है, जिसके तहत हर साल वोटर लिस्ट को अपडेट किया जाता है। अधिकारी घर-घर जाकर दस्तावेज़ मांगते हैं, पहचान की जांच करते हैं और नया डेटा ऑनलाइन दर्ज किया जाता है।लेकिन इस बार जैसे ही अधिकारी दस्तावेज़ लेकर दरवाजों पर पहुंचे, लोगों में भय फैल गया कि कहीं यह NRC (National Register of Citizens) की तैयारी तो नहीं!?
घबराहट क्यों? 10–12 साल पुराना डर जाग उठा
बस्ती से भागने वाले ज्यादातर लोग कचरा बीनकर आजीविका चलाने वाले प्रवासी हैं। माना जाता है कि ये लोग 10–12 साल पहले बांग्लादेश से आए थे। इनके पास अक्सर पूरे दस्तावेज़ नहीं होते जैसे राशन कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र या स्थायी पते का प्रमाण।
यहीं से डर शुरू होता है अगर कागज़ पूरे नहीं हुए तो हमें घुसपैठिया घोषित कर दिया जाएगा…लोगों में यह भी भय है कि अगर उनका नाम वोटर लिस्ट से हट गया तो उन्हें तुरंत डिटेंशन सेंटर भेज दिया जाएगा या बांग्लादेश वापस भेजाने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
क्या ये सिर्फ अफवाह है या हकीकत?
अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ मतदाता सूची सुधार का सामान्य अभियान है। लेकिन लोगों की सोच इस बयान से बदल नहीं रही। वजह है — पिछले कुछ वर्षों में नागरिकता, NRC, CAA और घुसपैठ जैसे शब्दों पर पूरे देश में राजनीतिक बहस और डर का फैलना।भले ही सरकार और प्रशासन इसे साधारण प्रक्रिया बताए, लेकिन जिन लोगों के पास कागज़ नहीं हैं, उनका डर असली है। उनके लिए सूची, दस्तावेज़ और पहचान अब सिर्फ कागज़ नहीं, जीवन-मृत्यु का मुद्दा बन गया है।वोटर लिस्ट और नागरिकता का सवाल यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है क्या SIR सिर्फ वोटर लिस्ट अपडेट की प्रक्रिया है?या क्या वास्तव में NRC की जमीन तैयार की जा रही है?सच यह है कि जवाब स्पष्ट नहीं है। और जब जवाब स्पष्ट न हो, तो डर अपने आप पैदा हो जाता है।मध्यमग्राम की यह घटना दिखाती है कि नागरिकता केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि मनोविज्ञान और भरोसे का भी मुद्दा है। जहां भरोसा टूटे, वहां कानून भी डर बन जाता है।

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