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  • UNSC परिषद में Afghanistan पर भारत ने कही बड़ी बात!

    UNSC परिषद में Afghanistan पर भारत ने कही बड़ी बात!

    UNSC: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने साफ शब्दों मे अफगानिस्तान पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। भारत ने कहा कि अफगानिस्तान सिर्फ हमारा पड़ोसी नहीं है बल्कि हमारा बेहद करीबी दोस्त भी है। इसी के साथ भारत ने अफगानिस्तान के तत्कालीन तालिबान सरकार से भी बेहतर तालमेल बनाने की बात कही है। वहीं इसके अलावा भारत ने Afghanistan में पूरे हुए 500 विकास परियोजनाओं को भी दोहराया है। साथ ही अफगानिस्तान की जनता के जीवन में शांति बहाल करने के अपनी में अपनी बात को स्पष्ट रूप से रखा है। आइए एक नज़र डालते है पूरी खबर पर। साथ ही जानेंंगे भारत द्वारा अफगानिस्तान में चलाए जा रहे विकास परियोजनाओं के भी बारे में। तो खबर को अंत तक पढ़ना न भूले।

    UNSC: परिसद में भारत ने पेश की दोस्ती की मिसाल

    जानकारी के लिए बता दे कि भारत ने अब तक अफगानिस्तान में 500 से अधिक विकास परियोजनाओं को पूरा किया है। इसमें मुख्य रूप से बेहतर चिकीत्सा और उच्च शिक्षा वाली परियोजनाएँ शामिल है। इसके अलावा भारत द्वारा काबूल में सैटेलाइट सेंटर और बाल विकास सेंटर की भी स्थापना की गई है। यहीं नही, बारत ने समय समय पर Afghanistan के साथ अपनी बेहतर दोस्ती का सबूत भी दिया है। आपको बता दे कि जब अफगानिस्तान में भूकंप आया था, तो सबसे पहले भारत ही मदद के लिए पहुँचा था. मदद के तौर पर भारत ने अफगानिस्तान में बड़ी संख्या में राहत साम्रगी भी पहुँचाई थी। जिसके बाद से ही भारत और अफगानिस्तान के बीच दोस्ती और गहरी होती दिख रही है।

    तालिबान सरकार पर ऐसा है भारत का रुख

    इसके अलावा UNSC में बात अगर अफगानिस्तान के तत्कालीन तालिबान सरकार के साथ भारत की तालमेल की करें तो, फिलहाल ये रिश्ते भी बेहतर दिखाई दे रहे है। इस सिलसिले में भारत ने तालिबान सरकार संग भारत के रिश्ते को और मजबूत करने की भी बात कही है। इसी के साथ भारत ने Afghanistan में हुए हवाई हमले और नागरिकों की हुई हत्या पर कड़े शब्दों में विरोध जताया है। वहीं काबूल में तकनीकी मिशन को एम्बेसी में बदलकर भारत ने यह संदेश और मजबूत किया कि सच्ची दोस्ती मुश्किल समय में पहचानी जाती है। अब देखना होगा कि आने वाले वक्त में क्या ये रिश्ते और मजबूत होते है या नही।

  • भारत की UN में अपील: अफगानिस्तान से आतंकवाद रोकने की वैश्विक मांग

    भारत की UN में अपील: अफगानिस्तान से आतंकवाद रोकने की वैश्विक मांग

    परिचय: भारत की चिंता और UN में आवाज़

    भारत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में एक महत्वपूर्ण अपील की है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय समुद्री को पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे UN द्वारा घोषित आतंकवादी संगठनों तथा उनके सहयोगियों के खिलाफ सतर्क रहने को कहा गया है। भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने बुधवार (18 सितंबर 2025) को कहा कि भारत अफगानिस्तान की सुरक्षा स्थिति पर कड़ी नजर रख रहा है। उन्होंने जोर दिया कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ये संगठन अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए न करें। यह अपील दक्षिण एशिया में बढ़ते आतंकवाद के खतरे को ध्यान में रखते हुए की गई है, जहां LeT और JeM जैसे समूहों की सक्रियता ने क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाल दिया है।

    भारत-अफगानिस्तान संबंध और शांति की प्रतिबद्धता

    राजदूत हरीश ने स्पष्ट किया कि भारत और अफगानिस्तान के बीच सभ्यतागत संबंध सदियों पुराने हैं, और युद्धग्रस्त देश में शांति व स्थिरता बनाए रखना भारत के सर्वोच्च हित में है। उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय सहयोग के बिना अफगानिस्तान में शांति और विकास संभव नहीं। भारत ने अफगानिस्तान को मानवीय सहायता प्रदान की है और 500 से अधिक विकास परियोजनाओं के माध्यम से सहयोग किया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी से दो बार बातचीत की है। विशेष रूप से, भारत ने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले की अफगान पक्ष द्वारा की गई कड़ी निंदा का स्वागत किया। भारत लगातार अफगानिस्तान में शांति, सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। यह अपील UNSC रेजोल्यूशन 2593 के अनुरूप है, जो अफगान मिट्टी का आतंकवाद के लिए इस्तेमाल न करने की मांग करता है।

    आतंकवादी संगठनों की सक्रियता: LeT और JeM का खतरा

    लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद UN द्वारा प्रतिबंधित संगठन हैं, जो पाकिस्तान से संचालित होकर अफगानिस्तान में ट्रेनिंग कैंप चला रहे हैं। 2025 में इन संगठनों की सक्रियता बढ़ी है। उदाहरणस्वरूप, अप्रैल 2025 में पहलगाम हमले में JeM का हाथ माना गया, जिसके बाद भारत-पाकिस्तान तनाव चरम पर पहुंच गया और 10 मई 2025 को सीजफायर हुआ। LeT और JeM के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं, लेकिन दोनों ही भारत के खिलाफ हमलों की योजना बना रहे हैं। अफगानिस्तान में इनके कैंपों का इस्तेमाल भर्ती और ट्रेनिंग के लिए हो रहा है। भारत ने हाल ही में श्रीनगर के पास LeT से जुड़े तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों को मार गिराया। ये संगठन न केवल भारत, बल्कि नेपाल जैसे पड़ोसी देशों को भी खतरा पैदा कर रहे हैं। UNSC ने इन समूहों को Al-Qaida और तालिबान से जुड़ा बताया है।

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    अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया: क्या कड़े कदम उठेंगे?

    अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ चिंता जताई है, लेकिन कड़े कदम सीमित हैं। NATO ने 2025 में एक अपडेटेड एक्शन प्लान जारी किया, जिसमें अफगानिस्तान को आतंकवादियों का सुरक्षित ठिकाना न बनने देने पर जोर दिया गया। UNSC ने 17 मार्च 2026 तक UNAMA (UN Assistance Mission in Afghanistan) का मंडेट बढ़ाया, जिसमें आतंकवाद विरोधी मॉनिटरिंग पर फोकस है। अमेरिका ने पाकिस्तान की सहयोग की सराहना की है, लेकिन भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद भी पाकिस्तान पर दबाव कम है। तालिबान ने ISIS-K के खिलाफ कार्रवाई की है, लेकिन LeT-JeM जैसे समूहों को बख्शा जा रहा है। USIP की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान की कमजोरी से आतंकवाद बढ़ सकता है। हालांकि, सितंबर 2025 तक कोई बड़ा कदम नहीं उठा, जैसे अतिरिक्त प्रतिबंध या सैन्य सहायता। क्षेत्रीय स्तर पर, पाकिस्तान ने Azm-e-Istehkam अभियान चलाया, लेकिन TTP जैसे समूह अफगानिस्तान से हमले कर रहे हैं।

    मेरा विश्लेषण: कड़े कदमों की संभावना

    मैं सोचता हूं कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान और इन आतंकवादी समूहों पर कड़े कदम उठाने में हिचकिचा रहा है, लेकिन दबाव बढ़ रहा है। 2025 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद UNSC ने चिंता जताई, लेकिन व्यावहारिक कार्रवाई सीमित है। NATO और UN के प्लान सकारात्मक हैं, लेकिन तालिबान की कमजोरी और पाकिस्तान की दोहरी नीति (आतंकवाद का समर्थन और सहयोग का दावा) बाधा हैं। यदि पहलगाम जैसे हमले बढ़ते रहे, तो अमेरिका और यूरोपीय देश अतिरिक्त प्रतिबंध या इंटेलिजेंस शेयरिंग बढ़ा सकते हैं। भारत की अपील ने वैश्विक ध्यान खींचा है, लेकिन वास्तविक बदलाव के लिए क्षेत्रीय सहयोग (जैसे भारत-ईरान-चीन) जरूरी है। कुल मिलाकर, कड़े कदम संभव हैं, लेकिन धीमी गति से।

    शांति के लिए एकजुटता की जरूरत

    भारत की यह अपील दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। अफगानिस्तान में शांति सुनिश्चित करने से न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया लाभान्वित होगी। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को अब शब्दों से आगे बढ़कर कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि LeT-JeM जैसे संगठन कुचले जा सकें। भारत की सक्रिय भूमिका सराहनीय है, और उम्मीद है कि वैश्विक सहयोग से आतंकवाद का सफाया होगा।

  • ईरान-इजरायल जंग और भारत की कूटनीति: ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बदला रुख

    ईरान-इजरायल जंग और भारत की कूटनीति: ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बदला रुख

    इजरायल और ईरान के बीच चल रही लड़ाई ने वैश्विक राजनीति को झकझोर दिया है। इस टकराव में अब अमेरिका की भी एंट्री हो गई है, जिसने ईरान के तीन प्रमुख परमाणु ठिकानों – फोर्डो, इस्फहान और नतांज – पर हमले किए हैं। इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है – क्या ईरान अब भी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बन सकेगा?

    भारत का इस मुद्दे पर रुख हमेशा से स्थिर नहीं रहा है। कभी वह ईरान के खिलाफ खड़ा हुआ, तो कभी मतदान से दूरी बनाकर एक संतुलन साधने की कोशिश की। यह नीति भारत की बहुपक्षीय कूटनीति और वैश्विक दबावों के बीच उसके विवेकपूर्ण निर्णयों को दर्शाती है।

    2005: जब भारत ने ईरान के खिलाफ मतदान किया

    24 सितंबर 2005 को भारत ने IAEA में उस प्रस्ताव का समर्थन किया जिसमें कहा गया था कि ईरान अपने सुरक्षा समझौते का उल्लंघन कर रहा है। यह पहला मौका था जब भारत ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ खड़ा होकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध किया। उस वक्त भारत अमेरिका के साथ अपने असैन्य परमाणु समझौते को लेकर बातचीत कर रहा था।

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    2006 में फिर से ईरान के खिलाफ वोट

    4 फरवरी 2006 को भारत ने फिर से ईरान के खिलाफ मतदान करते हुए इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भेजने के प्रस्ताव का समर्थन किया। हालांकि, भारत ने शुरू में यह आग्रह भी किया था कि मामला IAEA तक ही सीमित रखा जाए।

    2007 से 2024: चुप्पी और संतुलन

    जब मामला UNSC में चला गया, तब से लेकर 2024 तक भारत ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया। हालांकि, भारत ने ईरान से तेल आयात रोकने के बावजूद चाबहार बंदरगाह परियोजना में निवेश जारी रखा, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत ईरान के साथ अपने रणनीतिक संबंध बनाए रखना चाहता है।

    2024: बदलता दृष्टिकोण

    2024 में जब अमेरिका ने ईरान के खिलाफ IAEA में प्रस्ताव रखा, तब भारत ने वोटिंग में भाग नहीं लिया। जून और सितंबर दोनों महीनों में भारत मतदान से अनुपस्थित रहा। यह रुख इजरायल के साथ भारत के बढ़ते रक्षा संबंधों और ईरान के साथ ऐतिहासिक रिश्तों के बीच संतुलन का उदाहरण है।

    भारत की कूटनीतिक रणनीति

    भारत अब यह स्पष्ट कर चुका है कि वह ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का समर्थन करता है, लेकिन साथ ही ईरान से अपनी परमाणु अप्रसार प्रतिबद्धताओं का पालन करने की उम्मीद भी रखता है। भारत का यह संतुलित रुख उसे वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।