तुर्की की मध्यस्थता: पाक-अफगान युद्धविराम के लिए नया कूटनीतिक प्रयास

बाकू बैठक: एर्दोआन-शरीफ के बीच अहम चर्चा

क्षेत्रीय शांति को मजबूत करने की दिशा में तुर्की ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन ने अजरबैजान की राजधानी बाकू में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात के बाद घोषणा की कि तुर्की अपने शीर्ष मंत्रियों और खुफिया प्रमुख को पाकिस्तान भेजेगा। यह प्रतिनिधिमंडल अफगानिस्तान के साथ चल रही युद्धविराम वार्ताओं की प्रगति पर चर्चा करेगा। 8 नवंबर 2025 को हुई इस बैठक में एर्दोआन ने दक्षिण एशिया में स्थायी शांति स्थापित करने का उद्देश्य बताया। उन्होंने कहा कि तुर्की पाकिस्तान में हालिया आतंकी हमलों और अफगानिस्तान के साथ तनाव पर नजर रखे हुए है। बाकू में अजरबैजान के विजय दिवस समारोह के दौरान हुई इस मुलाकात में तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान, रक्षा मंत्री यासर गुलर और खुफिया प्रमुख इब्राहिम कलिन भी मौजूद थे। एर्दोआन ने विमान से लौटते हुए पत्रकारों से कहा, “हमारा लक्ष्य युद्धविराम को स्थायी बनाना और क्षेत्र में आतंकी घटनाओं को हमेशा के लिए खत्म करना है।”

पाक-अफगान तनाव: सीमा विवाद और आतंकवाद का साया

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच संबंध हाल के महीनों में बेहद नाजुक हो गए हैं। दुर्रंद लाइन पर सीमा पार गोलीबारी, आतंकी हमले और आपसी आरोपों ने तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है। पाकिस्तान का दावा है कि अफगानिस्तान तालिबान शासन के तहत तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे समूहों को पनाह दे रहा है, जबकि अफगानिस्तान पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ का आरोप लगाता है। 7 नवंबर 2025 को कंधार के स्पिन बोल्डाक जिले में पाकिस्तानी तोपखाने की गोलीबारी से एक घर क्षतिग्रस्त हो गया, जिसमें नागरिक हताहत हुए। नवंबर 6-7 को तुर्की और कतर की मध्यस्थता में इस्तांबुल में हुई वार्ताएं युद्धविराम को मजबूत बनाने में नाकाम रहीं, लेकिन तुर्की की नई पहल उम्मीद जगाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मध्यस्थता दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली का मोड़ साबित हो सकती है, खासकर जब पाकिस्तान भारत के साथ करीबी बढ़ा रहा है और अफगानिस्तान अपनी संप्रभुता पर जोर दे रहा है।

यह भी पढ़ें : सेलिना जेटली का भाई मेजर विक्रांत UAE में हिरासत में: भावुक अपील और कोर्ट की कार्रवाई

तुर्की की भूमिका: क्षेत्रीय शांति का मध्यस्थ

तुर्की लंबे समय से मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाता आ रहा है। गाजा युद्धविराम वार्ताओं में मिस्र और कतर के साथ मिलकर तुर्की ने महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसमें अक्टूबर 2025 में शर्म अल-शेख में हुई चर्चाएं शामिल हैं। इसी तरह, सूडान के गृहयुद्ध में भी एर्दोआन ने कूटनीतिक हस्तक्षेप का वादा किया है। पाक-अफगान संवाद में तुर्की ने पहले भी इस्तांबुल में दौर आयोजित किए हैं, जहां दोनों पक्षों ने आतंकवाद विरोधी सहयोग और व्यापार बढ़ाने पर बात की। एर्दोआन की यह पहल न केवल द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने का प्रयास है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भी हाल ही में अफगान समकक्ष से बात कर इसी दिशा में समर्थन जताया।

अपेक्षाएं और चुनौतियां: क्या बनेगी स्थायी शांति?

तुर्की प्रतिनिधिमंडल की पाकिस्तान यात्रा इस सप्ताह निर्धारित है, जहां विदेश मंत्री फिदान, रक्षा मंत्री गुलर और खुफिया प्रमुख कलिन अफगान प्रतिनिधियों के साथ त्रिपक्षीय बैठक करेंगे। इसका मुख्य एजेंडा युद्धविराम को स्थायी बनाना, आतंकी घटनाओं पर रोक लगाना और सीमा सुरक्षा तंत्र मजबूत करना होगा। हालांकि, चुनौतियां कम नहीं हैं—अफगानिस्तान की तालिबान सरकार अंतरराष्ट्रीय मान्यता की मांग कर रही है, जबकि पाकिस्तान TTP पर सख्ती चाहता है। वैश्विक शक्तियां जैसे अमेरिका और चीन भी इस क्षेत्र में हितों के टकराव का सामना कर रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि तुर्की की निष्पक्ष भूमिका सफलता की कुंजी हो सकती है, लेकिन स्थायी शांति के लिए दोनों देशों को आपसी समझौते पर अमल करना होगा। ईरान और सऊदी अरब जैसे पड़ोसी देशों का समर्थन भी जरूरी है। यदि यह प्रयास सफल रहा, तो दक्षिण एशिया में व्यापार, ऊर्जा और प्रवासन के रास्ते खुल सकते हैं। दुनिया की निगाहें अब इस कूटनीतिक प्रयोग पर हैं—क्या तुर्की पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच नया विश्वास का पुल बनेगा? आने वाले दिनों में इसका जवाब मिलेगा, जो न केवल इन दो देशों बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए निर्णायक साबित होगा।

Share

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *