UP: उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों धर्म और सियासत के दोहरे मोर्चों पर गर्म है। शंकराचार्य अभिमुक्तेश्वरानंद ने गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध और गौ-माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने के लिए 11 मार्च को लखनऊ में सत्याग्रह का ऐलान किया है। उनका संदेश सीधा है कि सरकार कार्रवाई करे, नहीं तो आंदोलन होगा। इस ऐलान ने संत समाज में दो हिस्सों को जन्म दिया है। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी ने इसे ‘दादागिरी’ बताते हुए कहा कि सरकार से बातचीत चल रही है और मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अभिमुक्तेश्वरानंद के साथ कोई बड़ा संत नहीं है, जिससे सवाल उठता है कि यह धर्म का मुद्दा है या व्यक्तिगत नेतृत्व का संघर्ष।
UP: अभिमुक्तेश्वरानंद के इस कदम से संत समाज बटां
अभिमुक्तेश्वरानंद के इस कदम से संत समाज में मतभेद और स्पष्ट हो गए हैं। राम जन्मभूमि न्यास से जुड़े संत गोविंद देव गिरी ने अभिमुक्तेश्वरानंद को “एंटी-मंदिर” तक कह दिया है और उनके रुख पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने जगन्नाथ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के उदाहरण का हवाला देते हुए उनकी मान्यता पर संदेह जताया। यह साफ संकेत है कि 11 मार्च केवल सत्याग्रह नहीं, बल्कि संत समाज की शक्ति परीक्षा भी बन सकता है।
समाजवादी पार्टी का नया पोस्टर चर्चा में
इसके अलावा सियासत की ओर देखें तो समाजवादी पार्टी का नया पोस्टर चर्चा में है, जिसमें अखिलेश यादव पुलिस बैरिकेडिंग फांदते नजर आ रहे हैं। यह संदेश स्पष्ट करता है कि संघर्ष की राजनीति जारी है। रिपोर्ट्स के अनुसार पश्चिमी यूपी की लगभग 140 सीटों पर नई रणनीति तैयार की जा रही है। ऐसे में सवाल यह है कि धर्म और राजनीति की रेखाएं फिर से आपस में टकराने वाली हैं या 11 मार्च यूपी के लिए नया टर्निंग पॉइंट साबित होगा।

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