ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य सफलता का प्रतीक बन चुका है, लेकिन दुर्भाग्यवश इस पर भी राजनीतिक विष घोला जा रहा है। कांग्रेस ने हाल ही में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के बयान को तोड़-मरोड़कर जिस तरह से पेश किया, वह केवल राजनीतिक अपरिपक्वता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खतरनाक खिलवाड़ है।
क्या कहा गया और कैसे घुमाया गया?
विदेश मंत्री जयशंकर का बयान, जिसमें उन्होंने एक डिप्लोमैटिक प्रक्रिया के तहत पाकिस्तान को सूचित किए जाने की सामान्य बात कही थी, उसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी और फिर पवन खेड़ा ने इस तरह पेश किया, जैसे भारत ने खुद पाकिस्तान को आतंकी ठिकानों पर हमले की मुखबिरी की हो।
क्या यह बयान सही था या एक गढ़ी हुई कहानी?
विदेश मंत्रालय की ओर से स्पष्ट किया गया कि जयशंकर का बयान तथ्यों से परे तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। उन्होंने कहीं भी यह नहीं कहा कि भारत ने पाकिस्तान को हमले से पहले पूरी जानकारी दी थी। फिर भी राहुल गांधी अपनी बात पर अड़े रहे और कांग्रेस प्रवक्ता इसे आगे बढ़ाते गए।
पाकिस्तान ने लपका मौका
राहुल गांधी के बयानों को पाकिस्तान के मीडिया ने तुरंत उठाया और भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कमजोर करने का प्रयास किया। क्या कांग्रेस को इसका अंदाज़ा नहीं था? या फिर उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं?
कूटनीति पर भी राजनीति
कांग्रेस इससे भी खफा है कि शशि थरूर जैसे वरिष्ठ नेता को एक बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया। जबकि वह खुद यह पूछने को तैयार नहीं कि यदि थरूर इतने योग्य हैं, तो कांग्रेस ने पहले से उनका नाम क्यों नहीं प्रस्तावित किया?
INDIA गठबंधन की संकीर्ण सोच
तृणमूल कांग्रेस ने भी इस पर आपत्ति जताई कि सरकार बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल के नाम तय नहीं कर सकती।ममता बनर्जी के दबाव में यूसुफ पठान ने प्रतिनिधिमंडल से अलग होने का निर्णय ले लिया। क्या यह राष्ट्रीय मंच पर विपक्ष की टूट और असहमति को नहीं दर्शाता?

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