बार्लो का परिचय: सच्चाई उजागर करने की कीमत चुकाई
अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के पूर्व अधिकारी रिचर्ड बार्लो ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। 1985 से 1988 तक CIA में काउंटर-प्रोलिफरेशन विशेषज्ञ के रूप में काम करने वाले बार्लो ने ANI को दिए इंटरव्यू में बताया कि अमेरिका को पाकिस्तान के परमाणु हथियार विकास की पूरी जानकारी थी, लेकिन अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ पाकिस्तान की मदद के लिए आंखें मूंद लीं। बार्लो ने कहा, “हमारे पास सबूत थे कि पाकिस्तान परमाणु हथियार बना रहा है, लेकिन व्हाइट हाउस और पेंटागन ने इसे नजरअंदाज किया।” उन्होंने दावा किया कि अरबों डॉलर की अमेरिकी सैन्य सहायता पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को फंड करने में लगी। बार्लो को सच्चाई उजागर करने की भारी कीमत चुकानी पड़ी – नौकरी गई, शादी टूट गई और 18 साल तक मोटरहोम में रहना पड़ा। विकिपीडिया के अनुसार, बार्लो ने 1987 में पाकिस्तानी एजेंट अर्शद परवेज को गिरफ्तार करवाया, जो यूरेनियम संवर्धन के लिए 25 टन मारेजिंग स्टील खरीद रहा था।
अमेरिका का दोहरा चरित्र: F-16 पर परमाणु हथियारों का राज
बार्लो के अनुसार, अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाए, लेकिन पर्दे के पीछे समर्थन जारी रखा। उन्होंने खुलासा किया कि 1980 के दशक में अमेरिका ने पाकिस्तान को 40 F-16 लड़ाकू विमान बेचे, जिन्हें परमाणु हथियार ले जाने के लिए डिजाइन किया गया था। “1990 में हमारी खुफिया एजेंसियों ने F-16 पर पाकिस्तानी परमाणु हथियार लोड होते देखा,” बार्लो ने कहा। फिर भी, 1989 तक अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने कांग्रेस को गलत सर्टिफिकेट दिए कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार नहीं हैं। द गार्जियन की 2007 रिपोर्ट में उल्लेख है कि F-16 की बिक्री की शर्त थी कि इन्हें परमाणु के लिए इस्तेमाल न किया जाए, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने पाकिस्तान को हाई-टेक उपकरण निर्यात की मंजूरी दी। बार्लो ने कहा, “डिक चेनी के तहत मैंने पाकिस्तान की क्षमताओं पर रिपोर्ट लिखी, जिसमें F-16 की परमाणु डिलीवरी क्षमता का जिक्र था, लेकिन इसे दबा दिया गया।” यह खुलासा कोल्ड वॉर की भू-राजनीति को उजागर करता है, जहां अफगान मुजाहिदीन को हथियार पहुंचाने के लिए पाकिस्तान को छूट मिली।
कहुटा पर भारत-इजराइल का गुप्त प्लान: इंदिरा का फैसला
बार्लो ने एक और सनसनीखेज खुलासा किया कि 1980 के शुरुआती सालों में भारत और इजराइल ने मिलकर पाकिस्तान के कहुटा यूरेनियम संवर्धन संयंत्र पर हमले की योजना बनाई थी। यहां ए.क्यू. खान परमाणु कार्यक्रम चला रहे थे। “यह एक गुप्त कवरेट ऑपरेशन था, जो पाकिस्तान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोक सकता था,” बार्लो ने कहा। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसे मंजूरी नहीं दी। बार्लो ने अफसोस जताया, “यह शर्मनाक है कि इंदिरा ने मंजूरी न दी; इससे कई समस्याएं टल सकती थीं।” एनडीटीवी और इंडिया टुडे की रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक इजराइल की ईरान-विरोधी रणनीति से जुड़ी थी, क्योंकि पाकिस्तान की तकनीक ईरान तक पहुंच सकती थी। बार्लो ने कहा कि रोनाल्ड रीगन प्रशासन ने इसका विरोध किया होता, क्योंकि यह अफगानिस्तान में सोवियत विरोधी अभियान को प्रभावित करता। डीक्लासीफाइड दस्तावेजों से पता चलता है कि पाकिस्तान ने मुजाहिदीन को सहायता रोकने की धमकी देकर अमेरिका को ब्लैकमेल किया। यदि हमला होता, तो पाकिस्तान 1998 के परमाणु परीक्षण तक न पहुंच पाता।
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‘इस्लामिक बम’ की साजिश: ए.क्यू. खान का सपना
बार्लो के मुताबिक, पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम शुरू में भारत का मुकाबला करने के लिए था, लेकिन ए.क्यू. खान ने इसे ‘इस्लामिक बम’ में बदल दिया। खान ने कहा था, “दुनिया में ईसाई बम है, यहूदी बम है, हिंदू बम है – तो मुस्लिम बम भी होना चाहिए।” बार्लो ने बताया कि खान का नेटवर्क 1990 के दशक में ईरान को गैस सेंट्रीफ्यूज तकनीक और परमाणु योजनाएं दे चुका था, जिससे तेहरान का कार्यक्रम दशकों आगे बढ़ गया। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया कि यह विचार जुल्फिकार अली भुट्टो से शुरू हुआ, जिन्होंने 1970 के दशक में ‘इस्लामिक बम’ की मांग की। खान ने यूरोप से चुराई गई तकनीक से कहुटा को हब बनाया और लीबिया, नॉर्थ कोरिया तक फैलाया। बार्लो ने अमेरिका की ‘लापरवाही’ की आलोचना की, “1987-88 में कार्रवाई बंद हुई और अगले 20-24 साल कुछ नहीं किया।” यह खुलासा दक्षिण एशिया की परमाणु दौड़ को नई रोशनी देता है।

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