लिव-इन रिश्तों पर अनिरुद्धाचार्य की टिप्पणी धर्म का मंच या तिरस्कार की ज़ुबान?

एक बार फिर कथावाचक अनिरुद्धाचार्य अपने विवादित बयान के कारण सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस का केंद्र बन गए हैं। इस बार उन्होंने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले युवाओं की तुलना कुत्तों से कर डाली, जिससे न केवल लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं, बल्कि धर्म और प्रवचन की मर्यादा को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।

क्या कहा कथावाचक ने?

एक धार्मिक कार्यक्रम के मंच से बोलते हुए अनिरुद्धाचार्य ने कहा भारत में हजारों साल से कुत्ते लिव-इन में रहते हैं, और अब जो लड़के-लड़कियाँ लिव-इन में रह रहे हैं, वो भी उसी श्रेणी में हैं।यह बयान वायरल होते ही लोगों के आक्रोश का कारण बन गया। सोशल मीडिया पर यूज़र्स ने इस बयान को न केवल अभद्र और असंवेदनशील, बल्कि धार्मिक मंच की गरिमा के खिलाफ बताया।

पुराने विवादित बयान भी चर्चा में

यह कोई पहली बार नहीं है जब अनिरुद्धाचार्य ने इस तरह का बयान दिया हो। इससे पहले भी उन्होंने कई ऐसे बयान दिए हैं, जिन्हें स्त्री विरोधी, देश विरोधी या अंधविश्वास बढ़ाने वाला कहा गया:25 साल की लड़कियों की तुलना वेश्याओं से की।सुंदर दिखने के लिए चेहरे पर गोबर लगाने की सलाह दी।15 अगस्त को “बेमतलब” बताते हुए कहा – “हमें आज़ादी मिली ही नहीं।”इन बयानों ने उनकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान खड़े किए हैं।

लिव-इन रिलेशनशिप एक संवेदनशील विषय

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भारत में विविध राय पाई जाती है। कुछ इसे निजी स्वतंत्रता का हिस्सा मानते हैं, तो कुछ भारतीय संस्कृति के विरुद्ध।लेकिन ऐसे सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करते वक्त, भाषा की गरिमा और मानवीयता बनाए रखना बेहद ज़रूरी है।किसी भी सामाजिक वर्ग को जानवरों से जोड़ना न केवल अमर्यादित, बल्कि नफरत फैलाने वाला कृत्य माना जाता है।

प्रवचन का उद्देश्य जोड़ना या तोड़ना?

धर्म और प्रवचन का मंच सदियों से समाज को दिशा देने, आदर्श स्थापित करने और मानवता का संदेश फैलाने का माध्यम रहा है। लेकिन जब यही मंच किसी समुदाय को तिरस्कार, अपमान और मजाक का पात्र बना दे, तो फिर यह प्रवचन कम और प्रचार ज़्यादा बन जाता है।लोगों का सवाल लाजमी है क्या ये धर्म सिखा रहे हैं या सिर्फ भीड़ जुटा रहे हैं?भारत जैसे विविध संस्कृति वाले लोकतांत्रिक देश में, जहां हर व्यक्ति को अपने जीवन के चुनाव की स्वतंत्रता है, वहां इस तरह के घृणास्पद और अपमानजनक बयान न केवल सामाजिक ताने-बाने को चोट पहुंचाते हैं, बल्कि धर्म की मूल भावना को भी धुंधला कर देते हैं।प्रवचन को अगर सुनना है, तो उसमें करुणा, समझ और संयम होना चाहिए तिरस्कार नहीं।

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