राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यानमाला ‘100 वर्ष की संघ यात्रा- नए क्षितिज’ में सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ के विचार, नीतियों और दृष्टिकोण को विस्तार से प्रस्तुत किया। इस अवसर पर उन्होंने विश्व के लिए स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि तीन मूलभूत सिद्धांतों—व्यक्ति निर्माण, समाज परिवर्तन और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा—पर संघ कभी समझौता नहीं करेगा। ये सिद्धांत संघ की जड़ें हैं और अपरिवर्तनीय हैं। भागवत ने विभिन्न मुद्दों जैसे हिंदू की परिभाषा, आरक्षण, शिक्षा, जनसंख्या, और काशी-मथुरा जैसे विषयों पर भी स्पष्ट विचार रखे। 200 से अधिक सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण संदेश दिए। आइए, उनके प्रमुख विचारों को समझें।
हिंदू की परिभाषा
मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू वह है जो अपनी श्रद्धा के साथ दूसरों की श्रद्धा का सम्मान करता है। हिंदू विचारधारा सभी को अपने मार्ग पर चलने की स्वतंत्रता देती है, बिना किसी को बदलने या अपमानित करने की कोशिश किए। उन्होंने कहा, “विश्व में कहीं भी वर्षा होती है, वह अंततः सागर में ही जाती है।” इसी तरह, सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। हिंदू परंपरा में आपसी झगड़े नहीं, बल्कि मिलजुलकर चलने का संदेश है।
काशी-मथुरा और राम मंदिर
राम मंदिर आंदोलन में संघ की सक्रिय भूमिका रही, लेकिन काशी और मथुरा के मुद्दों पर भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ स्वयं आंदोलन में नहीं जाएगा। हालांकि, ये तीनों स्थान हिंदू मानस में महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि इन तीन स्थलों को लेकर भाईचारा बढ़ाने के लिए समझदारी दिखाई जानी चाहिए। साथ ही, हर जगह मंदिर या शिवलिंग की खोज से बचने की सलाह दी।
शिक्षा और गुरुकुल पद्धति
भागवत ने गुरुकुल शिक्षा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने फिनलैंड के शिक्षा मॉडल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मातृभाषा में शिक्षा और व्यक्तिगत ध्यान पर बल दिया जाता है, जो गुरुकुल पद्धति से मिलता-जुलता है। उन्होंने सुझाव दिया कि वैदिक काल की 64 कलाओं को व्यावहारिक रूप से पढ़ाया जाए। साथ ही, स्कूलों में संविधान, नागरिक कर्तव्यों और अधिकारों की जानकारी दी जानी चाहिए।
जनसंख्या और सामाजिक समरसता
जनसंख्या नीति पर भागवत ने कहा कि तीन बच्चों तक की नीति उचित है, लेकिन संसाधनों का प्रबंधन भी जरूरी है। सामाजिक समरसता के लिए उन्होंने मंदिर, पानी और श्मशान में भेदभाव खत्म करने की बात कही। उन्होंने वंचित वर्गों के साथ मित्रता और सहयोग को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
स्वदेशी और आत्मनिर्भरता
आत्मनिर्भरता को राष्ट्र की कुंजी बताते हुए भागवत ने स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देने की वकालत की। उन्होंने कहा कि तकनीक का उपयोग मानव के नियंत्रण में होना चाहिए, न कि मानव तकनीक का गुलाम बने।

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