हिमालय संकट: समय से पहले जारी हुई रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, पानी से अर्थव्यवस्था तक खतरा
हिमालय संकट
हिमालय संकट को लेकर एक रिपोर्ट तय समय से पहले जारी की गई है। ‘प्रॉस्परस एंड रेजिलिएंट हिमालयाज’ नाम की इस रिपोर्ट को अक्टूबर में जारी किया जाना था, लेकिन 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई बड़ी तबाही के बाद इसका संक्षिप्त हिस्सा अचानक सामने लाया गया। रिपोर्ट के कवर पर इसे ‘इमरजेंसी इश्यू’ बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक हिमालय को सिर्फ पहाड़ समझना बड़ी भूल होगी, क्योंकि भारत का पानी, खेती, बिजली और अर्थव्यवस्था इससे सीधे जुड़ी है।
हिमालय संकट का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर
रिपोर्ट के अनुसार हिमालय से मिलने वाला पानी भारत की जीडीपी के 20 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से को सहारा देता है। यही पानी खेतों, बिजली उत्पादन और शहरों की जरूरतों में इस्तेमाल होता है। ऐसे में हिमालय संकट बढ़ने पर इसका असर केवल पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हिमालय से मिलने वाले संसाधनों का आर्थिक लाभ बड़े स्तर पर मैदानी इलाकों तक पहुंचता है, जबकि बाढ़, भूस्खलन और दूसरी आपदाओं का खतरा पहाड़ी राज्यों को ज्यादा उठाना पड़ता है।
ग्लेशियर पिघले तो आज पानी ज्यादा, कल संकट गहरा सकता है
हिमालय संकट का सबसे बड़ा असर ग्लेशियरों पर दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक हिमालय के कुछ हिस्से दुनिया के औसत तापमान की तुलना में दो से तीन गुना तेजी से गर्म हो रहे हैं। शुरुआत में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन एक समय के बाद ग्लेशियर इतने छोटे हो सकते हैं कि पहले जितना पानी नहीं दे पाएंगे। इसे ‘पीक वॉटर’ कहा जाता है और रिपोर्ट के मुताबिक हिमालय की ज्यादातर नदी घाटियों में इस सदी के बीच तक ऐसी स्थिति आ सकती है। साथ ही ग्लेशियर झीलों के बढ़ने से GLOF यानी अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा भी बढ़ रहा है।
56 ग्लेशियर झीलें बेहद खतरनाक, झरने भी सूख रहे
रिपोर्ट में सरकारी आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि भारत में 189 ग्लेशियर झीलें ज्यादा खतरे वाली और 56 बहुत ज्यादा खतरे वाली श्रेणी में हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में इनका खतरा बताया गया है। हिमालय संकट सिर्फ ग्लेशियरों तक सीमित नहीं है। भारतीय हिमालय में 30 लाख से ज्यादा झरने हैं, जिनमें करीब आधे या तो सूख चुके हैं या पूरे साल पानी नहीं देते। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हिंदूकुश हिमालय के करीब 40 हजार ग्लेशियरों में से केवल करीब 21 की लगातार और विस्तृत निगरानी हो रही है।
निर्माण, ब्लैक कार्बन और पर्यटन से बढ़ रहा हिमालय संकट
हिमालय संकट को बढ़ाने वाले कारणों में बढ़ता निर्माण, पर्यटन और ब्लैक कार्बन भी शामिल हैं। ईंट भट्ठों और उद्योगों से निकलने वाली कालिख हवा के जरिए पहाड़ों तक पहुंचकर बर्फ पर जम सकती है और उसके पिघलने की रफ्तार बढ़ा सकती है। वहीं सड़क, होटल और इमारतों का निर्माण अगर संवेदनशील इलाकों में हो तो बाढ़ और भूस्खलन से नुकसान बढ़ सकता है। रिपोर्ट में ग्लेशियरों और झीलों की निगरानी बढ़ाने, बेहतर चेतावनी व्यवस्था बनाने, झरनों को पुनर्जीवित करने, ब्लैक कार्बन कम करने और जंगलों को बचाने की सलाह दी गई है। रिपोर्ट का संदेश साफ है कि हिमालय संकट सिर्फ पहाड़ों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे भारत के पानी, खेती, बिजली और भविष्य से जुड़ा सवाल है
