पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार द्वारा 1960 की इंडस जल संधि को निलंबित करने का फैसला पश्चिमी राजस्थान के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आया है। पाकिस्तान से लगते सीमावर्ती इलाकों — बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर और जोधपुर — के लोगों में इस फैसले से उत्साह और राहत की लहर दौड़ गई है। दशकों से जल संकट से जूझ रहे इन इलाकों को अब लगता है कि शायद उनकी प्यास बुझाने का वक्त आ गया है।
“पानी आएगा, खेत हरियाले होंगे” — यही सपना अब यहां के लोगों की आंखों में झलक रहा है। बाड़मेर जिले के एक छोटे से गांव के किसान शेर सिंह सोढ़ा कहते हैं, “अगर इंडस नदी का पानी यहां तक आ जाए तो हमारी खेती की तस्वीर ही बदल जाएगी। यह फैसला हमारे लिए एक क्रांतिकारी कदम है।”
क्यों है ये फैसला महत्वपूर्ण?
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में हुई इंडस जल संधि के तहत भारत ने सिंधु नदी प्रणाली की तीन पूर्वी नदियों (रावी, सतलुज, ब्यास) का पानी अपने उपयोग के लिए रखा, जबकि तीन पश्चिमी नदियां (सिंधु, चिनाब और झेलम) का अधिकतर पानी पाकिस्तान को इस्तेमाल करने दिया गया। लेकिन अब जब भारत ने यह संधि निलंबित करने का फैसला लिया है, तो इस पानी के इस्तेमाल पर पुनर्विचार की संभावना बन रही है।
इस निर्णय से भारत अब अपने हिस्से के पानी का पूरी तरह उपयोग कर सकता है, और अगर तकनीकी रूप से संभव हुआ, तो इसे राजस्थान जैसे सूखे इलाकों तक मोड़ा जा सकता है।
बाड़मेर की उम्मीदें क्यों हैं बड़ी?
बाड़मेर, जो पाकिस्तान सीमा के नजदीक स्थित है, दशकों से जल संकट का सामना कर रहा है। यहां के गांवों में आज भी पीने का पानी टैंकरों और कुओं पर निर्भर है। खेती केवल मानसून पर आधारित है, और वह भी बहुत सीमित।
गांव के बुजुर्ग हाकम सिंह कहते हैं, “मोदी सरकार पर हमें पूरा भरोसा है। जब नर्मदा का पानी इतनी दूर से बाड़मेर तक आ सकता है, तो इंडस का पानी भी आ सकता है। यह सरकार जब चाहती है, कर दिखाती है।”
राजस्थान सरकार की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, राजस्थान सरकार पहले ही इस फैसले को लेकर केंद्र से बातचीत में जुट गई है। राज्य के जल संसाधन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अगर केंद्र से अनुमति मिलती है, तो सिंधु जल को राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों तक लाने के लिए योजनाएं तैयार की जा सकती हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय प्रभाव
इस फैसले का राजनीतिक रूप से भी असर दिख रहा है। जहां पाकिस्तान ने इस फैसले का विरोध किया है, वहीं देश में इसे एक सख्त लेकिन जरूरी कदम बताया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से भारत पाकिस्तान को यह संदेश देने में सफल रहा है कि अब ‘पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते’।
हालांकि, सिंधु नदी का पानी राजस्थान तक लाना आसान नहीं होगा। इसके लिए बड़ी परियोजनाएं, नहरों का निर्माण और राज्यों के बीच समन्वय जरूरी होगा। लेकिन यह पहला कदम उस दिशा में उठ चुका है, जिसकी लोगों को बरसों से प्रतीक्षा थी।
इंडस जल संधि को निलंबित करना सिर्फ एक कूटनीतिक कदम नहीं, बल्कि पश्चिमी राजस्थान के लाखों लोगों के लिए जीवन की उम्मीद है। बाड़मेर से बीकानेर तक लोगों की आंखों में अब उम्मीदों की चमक है — शायद अब उनके खेतों में हरियाली लौटेगी, और बच्चों को साफ पानी नसीब होगा।

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