किशोर कुमार
हिंदी सिनेमा के सबसे बहुमुखी कलाकारों में शामिल किशोर कुमार आज भी अपनी सदाबहार आवाज और शानदार अभिनय के लिए याद किए जाते हैं। 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में जन्मे किशोर कुमार ने अभिनय, गायन, निर्देशन और फिल्म निर्माण जैसे कई क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। हालांकि उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी गायकी बनी, जिसने चार दशकों तक करोड़ों संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज किया। उनकी 97वीं जयंती पर उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे रोचक किस्से सामने आते हैं, जो उनके व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को दर्शाते हैं।
बचपन की चोट से जुड़ा उनकी आवाज का सबसे चर्चित किस्सा
किशोर कुमार की आवाज को हिंदी सिनेमा की सबसे अलग और अनोखी आवाजों में गिना जाता है। एक पारिवारिक संस्मरण के अनुसार बचपन में उनके पैर में गहरी चोट लग गई थी, जिसके कारण वह लंबे समय तक दर्द से रोते रहे। परिवार का मानना था कि लगातार रोने की वजह से उनकी आवाज का टेक्सचर बदल गया और वही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया। इसी तरह कॉलेज के दिनों में इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज की कैंटीन में लिया गया उधार भी मशहूर हुआ। बताया जाता है कि ‘पांच रुपैया बारह आना’ गीत की प्रेरणा उसी उधारी की घटना से मिली थी।
गायक बनने मुंबई आए, लेकिन किस्मत ने बना दिया सुपरस्टार
बहुत कम लोग जानते हैं कि किशोर कुमार मुंबई अभिनेता बनने नहीं, बल्कि अपने आदर्श के.एल. सहगल की तरह गायक बनने आए थे। बड़े भाई अशोक कुमार की वजह से उन्हें फिल्मों में अभिनय के मौके मिले और बाद में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने उन्हें सफल अभिनेता बना दिया। फिल्म ‘आनंद’ को लेकर भी एक दिलचस्प किस्सा जुड़ा है। बताया जाता है कि इस फिल्म का प्रस्ताव पहले किशोर कुमार को मिला था, लेकिन एक गलतफहमी के कारण यह फिल्म उनके हाथ से निकल गई और बाद में राजेश खन्ना ने इसमें यादगार भूमिका निभाई। हालांकि इस कहानी को लेकर अलग-अलग दावे भी किए जाते हैं।
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बिना शास्त्रीय प्रशिक्षण बने महान गायक, लता और रफी के लिए था खास सम्मान
किशोर कुमार ने कभी शास्त्रीय संगीत की औपचारिक शिक्षा नहीं ली, लेकिन उनकी प्राकृतिक प्रतिभा ने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे सफल पार्श्व गायकों में शामिल कर दिया। सचिन देव बर्मन ने उनकी मौलिक शैली को पहचाना और उसे बनाए रखने की सलाह दी। लता मंगेशकर के प्रति उनका सम्मान इतना था कि कई बार वे अपनी फीस उनसे एक रुपया कम रखने की बात कहते थे। वहीं मोहम्मद रफी के साथ भी उनका रिश्ता प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि आपसी सम्मान का था। दोनों महान गायकों की यह दोस्ती आज भी संगीत जगत में मिसाल मानी जाती है।
अनोखी आदतों ने बनाया रहस्यमयी, लेकिन खंडवा से रहा अटूट लगाव
किशोर कुमार अपनी अनोखी आदतों के कारण भी हमेशा चर्चा में रहे। कभी पेड़ों से बातें करना, कभी मेहमानों को चौंकाने के लिए ड्रॉइंग रूम को अलग अंदाज में सजाना और अपनी पहली कार को बेचने के बजाय बंगले में दफन कर देना, उनके व्यक्तित्व की अलग पहचान बन गए। इसके बावजूद वह बेहद संवेदनशील इंसान थे और हमेशा अपने पैतृक शहर खंडवा से गहरा लगाव रखते थे। 13 अक्टूबर 1987 को मुंबई में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार खंडवा में ही किया गया। आज भी उनकी आवाज, उनके गीत और उनकी यादें करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में जिंदा हैं।