भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की हालिया मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने इस बार पारंपरिक महंगाई नियंत्रण से आगे बढ़कर विदेशी निवेश बढ़ाने और रुपये को स्थिर करने पर विशेष फोकस किया है। नई नीति में ऐसे कई उपायों की घोषणा की गई है जिनका उद्देश्य विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) का भरोसा मजबूत करना और देश में पूंजी प्रवाह को बढ़ाना है। इसमें विदेशी निवेश से जुड़े टैक्स ढांचे में राहत, पात्र प्रतिभूतियों के दायरे का विस्तार और पूंजी बाजार में निवेश के लिए आसान रास्ते शामिल हैं। साथ ही रेपो रेट को स्थिर रखकर बाजार को संतुलित संकेत देने की कोशिश की गई है।
आरबीआई की नीति में FCNR (B) डिपॉजिट पर हेजिंग लागत को कम करने, बैंकों को दीर्घकालिक विदेशी मुद्रा जमा जुटाने की अनुमति देने और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (PSU) के लिए रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधाएं देने जैसे अहम कदम शामिल हैं। इसके अलावा, बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECB) को आसान बनाने पर भी जोर दिया गया है, जिससे विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ने की उम्मीद है। विशेषज्ञों के अनुसार इन उपायों से विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) की स्थिति में सुधार आएगा। इससे रुपये पर पड़ रहा दबाव कम होने और विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ने की संभावना है।
विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक परिस्थितियों और कच्चे तेल की कीमतों के बीच रुपये में स्थिरता लाने के लिए यह कदम महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 तक विदेशी निवेश प्रवाह में सुधार देखने को मिलेगा, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। हालांकि, वैश्विक अनिश्चितताओं और पूंजी बहिर्वाह का जोखिम अभी भी बना हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि अंतरराष्ट्रीय हालात स्थिर रहते हैं तो डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति 92-93 के बीच रह सकती है। कुल मिलाकर, आरबीआई की यह नीति विदेशी निवेश बढ़ाने और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में एक रणनीतिक कदम मानी जा रही है।