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  • मोकामा हत्याकांड: जदयू उम्मीदवार अनंत सिंह सहित कई गिरफ्तार, 14 दिन की हिरासत!

    मोकामा हत्याकांड: जदयू उम्मीदवार अनंत सिंह सहित कई गिरफ्तार, 14 दिन की हिरासत!

    जन सुराज पार्टी के समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या ने पूरे क्षेत्र में तनाव पैदा कर दिया। वे गुरुवार को मोकामा में जन सुराज प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी के प्रचार के दौरान हमले का शिकार हुए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने खुलासा किया कि हृदय और फेफड़ों में कठोर वस्तु से गहरी चोटें लगने से ‘कार्डियो-रेस्पिरेटरी फेल्योर’ हुआ, जिससे उनकी मौत हुई। पटना SSP ने इसे स्पष्ट हत्याकांड करार दिया है।

    पुलिस की बड़ी कार्रवाई: अनंत सिंह गिरफ्तार

    पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अब तक 80 आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनमें सबसे बड़ा नाम जदयू उम्मीदवार अनंत सिंह का है। अनंत सिंह को उनके दो करीबी सहयोगियों — मणिकांत ठाकुर और रंजीत राम — के साथ शनिवार-रविवार मध्यरात्रि बाढ़ स्थित आवास से हिरासत में लिया गया। पटना कोर्ट ने तीनों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इस घटना से जुड़ी पांच प्राथमिकियां दर्ज हो चुकी हैं और जांच तेज गति से चल रही है।

    सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम: 13 CAPF कंपनियां तैनात

    मोकामा और आसपास के क्षेत्रों में हिंसा की आशंका को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। 13 कंपनियां केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF), दो एसटीएफ टीमें और पटना पुलिस की चार क्यूआरटी यूनिट्स तैनात की गई हैं। पुलिस महानिदेशक विनय कुमार ने सख्त चेतावनी दी:

    “कानून हाथ में लेने वालों को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वे कोई भी हों।”

    राजनीतिक बयानबाजी तेज: तेजस्वी का हमला

    इस गिरफ्तारी पर विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा:

    “इसकी उम्मीद थी, यह पहले ही होना चाहिए था। बिहार में ‘जंगल राज’ जैसी स्थिति है, जहां हत्याएं आम हो चुकी हैं।”

    वहीं, जदयू ने इसे “राजनीतिक साजिश” करार दिया है। अनंत सिंह लंबे समय से विवादों में रहे हैं और पहले भी हत्या, अपहरण जैसे गंभीर मामलों में जेल जा चुके हैं।

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    चुनावी माहौल पर असर, जांच जारी

    मोकामा सीट पर मतदान की तारीख नजदीक है और यह घटना चुनावी समीकरण बदल सकती है। जन सुराज पार्टी ने इसे “लोकतंत्र पर हमला” बताया है। पुलिस सभी CCTV फुटेज, गवाहों के बयान और फोरेंसिक साक्ष्यों की जांच कर रही है। SSP ने आश्वासन दिया कि दोषियों को जल्द सजा मिलेगी।

    यह मामला बिहार की कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। चुनावी हिंसा की यह घटना न केवल मोकामा, बल्कि पूरे राज्य के लिए चिंता का विषय है। पुलिस की सतर्कता और निष्पक्ष जांच ही शांति बहाल कर सकती है।

  • बिहार चुनाव 2025: दुलारचंद यादव हत्याकांड में अनंत सिंह गिरफ्तार, सियासत में उबाल

    बिहार चुनाव 2025: दुलारचंद यादव हत्याकांड में अनंत सिंह गिरफ्तार, सियासत में उबाल

    चुनावी हिंसा का शिकार: दुलारचंद यादव की संदिग्ध मौत

    बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बीच मोकामा सीट पर सियासत और अपराध की घिनौनी साझेदारी एक बार फिर सामने आ गई है। जन सुराज पार्टी के समर्थक दुलारचंद यादव की गुरुवार को हुई मौत ने पूरे राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने सनसनीखेज खुलासा किया है—ना कोई गोली लगी, ना कोई घातक हथियार। बल्कि, फेफड़ों में गंभीर चोट और कई पसलियां टूटने से कार्डियोरेस्पिरेटरी फेलियर हुआ, जो मौत की वजह बना। सवाल उठता है कि चुनाव प्रचार के दौरान ऐसी हिंसक झड़प कैसे हुई? दुलारचंद यादव मोकामा के ही निवासी थे और जन सुराज उम्मीदवार पियूष प्रियदर्शी (लल्लू मुखिया) के मजबूत समर्थक माने जाते थे। घटना के वक्त जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह के समर्थकों के साथ टकराव हुआ, जिसमें पथराव और मारपीट की खबरें हैं। शुरुआती अफवाहों में गोलीबारी की बात कही गई, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। यह मौत न सिर्फ एक व्यक्ति की जिंदगी का अंत है, बल्कि बिहार की चुनावी लोकतंत्र पर करारा प्रहार है।

    तीन FIR और पुलिस की सख्ती: अनंत सिंह पर शिकंजा

    पटना पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए अब तक तीन FIR दर्ज की हैं। पहली FIR मृतक दुलारचंद के पोते की शिकायत पर भदौर थाने में दर्ज हुई, जिसमें अनंत सिंह समेत चार अन्य—कर्मवीर, राजवीर, छोटन सिंह और मणिकांत ठाकुर—के नामजद हैं। दूसरी FIR प्रतिद्वंद्वी गुट की ओर से और तीसरी पुलिस की स्वत: जांच पर आधारित। इन FIR में हत्या, दंगा भड़काने और चुनावी हिंसा के आरोप लगाए गए हैं। गिरफ्तारी से पहले पुलिस ने 80 से अधिक संदिग्धों को हिरासत में लिया था, लेकिन मुख्य आरोपी अनंत सिंह पर फोकस रहा। वीडियो फुटेज, गवाहों के बयान और घटनास्थल की जांच से साबित हुआ कि अनंत सिंह घटनास्थल पर मौजूद थे। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने भी पुलिस को अलर्ट किया, जहां अनंत सिंह के समर्थकों की हिंसक हरकतें कैद हैं। यह कार्रवाई चुनाव आयोग के सख्त निर्देशों का नतीजा है, जिसने DGP से रिपोर्ट मांगी थी और पटना ग्रामीण SP सहित चार अधिकारियों का ट्रांसफर कर दिया।

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    आधी रात का ऑपरेशन: बाढ़ से पटना तक ड्रामा

    1 नवंबर की देर रात पटना SSP कार्तिकेय शर्मा के नेतृत्व में भारी फोर्स ने बाढ़ के कारगिल मार्केट स्थित अनंत सिंह के आवास पर धावा बोला। अनंत सिंह को उनके दो सहयोगी मणिकांत ठाकुर और रंजीत राम के साथ हिरासत में लिया गया। SSP और DM त्यागराजन एसएम ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में गिरफ्तारी की पुष्टि की। अनंत सिंह ने सहयोग किया, लेकिन उनके समर्थक भारी संख्या में जुटे। पुलिस ने चालाकी से काफिले को पटना मोड़ लिया और उन्हें अज्ञात सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर दिया। सुबह कोर्ट में पेशी हुई, जहां रिमांड की मांग की गई। मोकामा, पंडारक और आसपास के इलाकों में रातभर छापेमारी चली, जिसमें और गिरफ्तारियां संभावित हैं। CIID ने जांच की कमान संभाली है, DIG जयंत कांत के नेतृत्व में। यह ऑपरेशन इतना गोपनीय था कि सोशल मीडिया पर ही पहले खबर लीक हुई।

    राजनीतिक भूचाल: जेडीयू को झटका, विपक्ष का हल्ला

    अनंत सिंह की गिरफ्तारी ने जेडीयू को करारा झटका दिया है। मोकामा से NDA समर्थित उम्मीदवार के रूप में वे मजबूत थे, लेकिन अब उनकी उम्मीदवारी पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने ‘जंगलराज की वापसी’ का आरोप लगाया, जबकि प्रशांत किशोर की जन सुराज ने न्याय की मांग की। X (पूर्व ट्विटर) पर बहस छिड़ गई—कुछ इसे सोशल मीडिया की जीत बता रहे, तो कुछ राजनीतिक साजिश। क्या यह BJP-JDU गठबंधन में दरार का संकेत है? चुनाव आयोग की सख्ती से साफ है कि हिंसा बर्दाश्त नहीं। अनंत सिंह से पूछताछ जारी है, और जांच नए सिरे से तेज।

    आगे की चुनौतियां: कानून बनाम सियासत

    यह मामला सिर्फ एक हत्या का नहीं, बल्कि बिहार की अपराध-राजनीति के गठजोड़ का आईना है। अनंत सिंह जैसे बाहुबलियों की गिरफ्तारी से कानून का डर पैदा होता है, लेकिन चुनावी सुरक्षा पर सवाल बरकरार। क्या मोकामा में शांति लौटेगी? या यह हिंसा की श्रृंखला का आगाज है? बिहार की राजनीति, जो अक्सर खून से रंगी होती है, अब न्याय की कसौटी पर खड़ी है। पुलिस ने और गिरफ्तारियां जल्द होने का ऐलान किया है। कुल मिलाकर, यह घटना लोकतंत्र की मजबूती का टेस्ट है—क्या कानून सबके ऊपर है, या सियासत का गुलाम?