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  • सेलिना जेटली का भाई मेजर विक्रांत UAE में हिरासत में: भावुक अपील और कोर्ट की कार्रवाई

    सेलिना जेटली का भाई मेजर विक्रांत UAE में हिरासत में: भावुक अपील और कोर्ट की कार्रवाई

    कठिन दौर से गुजर रही सेलिना जेटली

    बॉलीवुड अभिनेत्री और पूर्व मिस इंडिया यूनिवर्स सेलिना जेटली इन दिनों बेहद मुश्किल समय से जूझ रही हैं। उनके भाई, रिटायर्ड मेजर विक्रांत कुमार जेटली, पिछले 14 महीनों से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में हिरासत में हैं। सितंबर 2024 से विक्रांत को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। एक चौथी पीढ़ी के सैनिक और 3 पैरा स्पेशल फोर्सेस के पूर्व अधिकारी विक्रांत 2016 से UAE में रह रहे थे, जहां वे MATITI ग्रुप में व्यापार, सलाहकार और जोखिम प्रबंधन सेवाओं से जुड़े थे। सेलिना ने बताया कि उनके भाई को अबू धाबी के एक मॉल से अज्ञात व्यक्तियों द्वारा अगवा किया गया था, और तब से परिवार उनसे संपर्क साधने में असमर्थ है। यह मामला न केवल परिवार के लिए दर्दनाक है, बल्कि भारतीय नागरिकों की विदेशी हिरासत में सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े कर रहा है।

    इंस्टाग्राम पर भावनात्मक संदेश

    सेलिना ने हाल ही में इंस्टाग्राम पर एक दिल दहला देने वाला पोस्ट शेयर किया, जिसमें उन्होंने अपने भाई के लिए गहरी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने लिखा, “मेरे डंपि (भाई), मुझे उम्मीद है तुम ठीक हो… मैं तुम्हारे साथ चट्टान की तरह खड़ी हूं, मुझे उम्मीद है तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे लिए हर रात रोए बिना नहीं सोई… मैं तुम्हारे लिए सब कुछ त्याग दूंगी… कोई भी हमारे बीच नहीं आ सकता… भगवान आखिरकार हम पर मेहरबान हों… तेरा इंतजार कर रही हूं।” यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसे लाखों लोगों ने शेयर किया। सेलिना ने आगे कहा कि उन्होंने हर संभव कोशिश की है—सरकार से लगातार संपर्क, MADAD पोर्टल पर शिकायत, भारतीय दूतावास को अपील—लेकिन अब तक कोई ठोस राहत नहीं मिली। उन्होंने अपने भाई की सेहत पर चिंता जताई, जो कथित तौर पर मानसिक तनाव और चिकित्सकीय समस्याओं से जूझ रहे हैं।

    दिल्ली हाई कोर्ट का हस्तक्षेप

    इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। 4 नवंबर 2025 को सुनवाई के दौरान जस्टिस सचिन दत्ता ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर चार हफ्तों में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया। कोर्ट ने विदेश मंत्रालय (MEA) को निर्देश दिए कि विक्रांत को प्रभावी कानूनी और चिकित्सकीय सहायता सुनिश्चित की जाए। साथ ही, एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति का आदेश दिया गया, जो परिवार से नियमित संपर्क में रहेगा और UAE में चल रही कानूनी प्रक्रिया की निगरानी करेगा। MEA ने कोर्ट को बताया कि विक्रांत को कांसुलर एक्सेस प्रदान किया गया है—मई, जून, अगस्त और सितंबर 2025 में चार मुलाकातें हो चुकी हैं। हालांकि, सेलिना के वकीलों ने पत्नी से दूरी का हवाला देते हुए और अधिक सहायता की मांग की। अगली सुनवाई 4 दिसंबर 2025 को होगी। सेलिना ने कोर्ट के फैसले को “अंधेरे सुरंग के अंत में रोशनी” बताया।

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    MEA और कांसुलर सहायता की स्थिति

    विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय दूतावास UAE के अधिकारियों के संपर्क में है और मामले को पूरी गंभीरता से ले रहा है। विक्रांत की पत्नी से भी संवाद हो रहा है, लेकिन सेलिना ने पेटिशन में दावा किया कि केवल चार कांसुलर विजिट्स पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून और वियना कांसुलर संबंध संधि का हवाला देते हुए तत्काल चिकित्सा और कानूनी मदद की मांग की। MEA के अनुसार, विक्रांत को “एक केस” में गिरफ्तार किया गया, लेकिन विस्तृत जानकारी गोपनीय रखी गई है। सेलिना ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से अपील की है कि उनके भाई को जल्द रिहा किया जाए।

    बॉलीवुड और सोशल मीडिया का समर्थन

    सेलिना के पोस्ट के बाद बॉलीवुड सितारे और फैंस ने उनका साथ दिया। रिटायर्ड मेजर जनरल जी.डी. बख्शी ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, “हमें उसे वापस लाना होगा! मुझे ISI की साजिश का शक है… उनकी बहन की आंसू देखकर दुख हुआ।” कई सेलेब्स जैसे अनुष्का शर्मा और वरुण धवन ने मैसेज शेयर कर समर्थन जताया। एक्स पर #JusticeForVikrant ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग सरकार से दखल की मांग कर रहे हैं। सेलिना ने कहा, “मैं अभी सेलिना जेटली नहीं, सिर्फ एक सैनिक की बहन हूं।”

    भविष्य की उम्मीदें और अपील

    यह मामला भारतीय नागरिकों की विदेशी हिरासत में सुरक्षा पर बहस छेड़ रहा है। सेलिना की अपील है कि राष्ट्र एकजुट होकर विक्रांत को घर लाए। MEA की सक्रियता और कोर्ट की निगरानी से उम्मीद बंधी है। सबकी दुआ है कि विक्रांत जल्द परिवार के पास लौटें, और यह घटना अन्य भारतीयों के लिए सबक बने। सेलिना का साहस प्रेरणा दे रहा है—एक बहन का भाई के लिए संघर्ष, जो लोकतंत्र की ताकत दिखाता है।

  • श्योपुर मिड-डे मील घोटाला: बच्चों को कागज़ पर परोसा भोजन, इंसानियत शर्मसार!

    श्योपुर मिड-डे मील घोटाला: बच्चों को कागज़ पर परोसा भोजन, इंसानियत शर्मसार!

    घटना की भयावह तस्वीर

    मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जो सरकारी योजनाओं की पोल खोल रही है। विजयपुर क्षेत्र के हुल्लपुर गांव स्थित सरकारी मिडिल स्कूल में मिड-डे मील योजना के तहत बच्चों को थाली की जगह रद्दी कागज के टुकड़ों पर खाना परोसा गया। वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि मासूम बच्चे जमीन पर बैठे हैं। उनके सामने कोई स्टील या प्लास्टिक की थाली नहीं, बल्कि पुरानी कॉपियों के फटे पन्नों पर चावल और सब्जी परोसी गई है। हाथ में एक रोटी पकड़े ये बच्चे भूख मिटाने को मजबूर हैं। यह दृश्य न केवल लापरवाही की पराकाष्ठा है, बल्कि बच्चों के अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

    शिक्षकों की उदासीनता और मौन सहमति

    सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह अमानवीय कृत्य स्कूल परिसर में ही हुआ, जहां शिक्षक मौजूद थे। वीडियो फुटेज में साफ देखा जा सकता है कि टीचर पास खड़े हैं, लेकिन किसी ने भी इस गलत प्रथा को रोकने की जहमत नहीं उठाई। क्या शिक्षक, जो बच्चों के मार्गदर्शक माने जाते हैं, इतने असंवेदनशील हो गए हैं? मिड-डे मील योजना का उद्देश्य स्कूली बच्चों को पौष्टिक भोजन देकर उनकी उपस्थिति बढ़ाना और कुपोषण कम करना है। लेकिन यहां तो स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहा है – कागज पर परोसा भोजन बैक्टीरिया और कीटनाशकों से दूषित हो सकता है। शिक्षकों की यह मौन सहमति भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी होने का संकेत देती है।

    योजना में भ्रष्टाचार की जड़ें

    मिड-डे मील भारत की सबसे बड़ी पोषण योजनाओं में से एक है, जो करोड़ों बच्चों को लाभ पहुंचाती है। लेकिन श्योपुर जैसी घटनाएं बताती हैं कि जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार कैसे हावी है। थालियां गायब हैं, शायद बजट की राशि डकार ली गई। अधिकारी निगरानी क्यों नहीं कर रहे? स्कूल प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है, जबकि योजनाएं कागजों पर ही सिमटकर रह गई हैं। यहां तो विडंबना यह कि बच्चों को वही कागज थाली बना दिए गए! क्या यह सिर्फ लापरवाही है या सुनियोजित भ्रष्टाचार? ऐसे मामलों में मेनू, सामग्री और बर्तनों की गुणवत्ता पर सख्त मानक होने चाहिए, लेकिन अमल शून्य है।

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    जांच के आदेश: क्या काफी है?

    वीडियो वायरल होने के बाद शिक्षा विभाग जागा और जांच के आदेश दे दिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या मात्र जांच से समस्या हल हो जाएगी? पिछले कई मामलों में जांच रिपोर्ट धूल फांकती रहती हैं, दोषी बच निकलते हैं। बच्चों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार सिर्फ निलंबन या ट्रांसफर से नहीं रुकेगा। जरूरत है सख्त कार्रवाई की – दोषी शिक्षकों और अधिकारियों पर एफआईआर, बजट का ऑडिट और सीसीटीवी निगरानी। साथ ही, अभिभावकों को सशक्त बनाना और स्थानीय समितियों को सक्रिय करना जरूरी है। अगर अब भी सुधार नहीं हुआ, तो यह इंसानियत पर कलंक बनेगा।

    सबक और आगे की राह

    यह घटना पूरे देश के लिए आईना है। मिड-डे मील जैसी योजनाएं कागजों से उतरकर जमीन पर उतरें, इसके लिए पारदर्शिता जरूरी है। सरकार को डिजिटल मॉनिटरिंग, जीपीएस ट्रैकिंग और थर्ड-पार्टी ऑडिट लागू करना चाहिए। बच्चों का भविष्य दांव पर है – कुपोषण से लड़ाई में ऐसे घोटाले असफलता की गारंटी हैं। श्योपुर की यह शर्मनाक तस्वीर हमें झकझोरती है कि आखिर कब तक मासूमों की भूख का शोषण होता रहेगा? समय है जागने का, सुधारने का और जवाबदेही सुनिश्चित करने का।

  • अफगानिस्तान में महिला पत्रकारों के अधिकारों पर संकट, तालिबान ने संवाद से किया इनकार

    अफगानिस्तान में महिला पत्रकारों के अधिकारों पर संकट, तालिबान ने संवाद से किया इनकार

    अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। हाल ही में अफगान विदेश मंत्री की प्रेस ब्रिफिंग में महिला पत्रकारों को शामिल नहीं किया गया। भारतीय पत्रकारों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन वहां कोई भी महिला पत्रकार मौजूद नहीं थी। तालिबान सरकार ने महिला मीडिया कर्मियों के साथ सीधे संवाद करने से इनकार कर दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठने लगे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम महिलाओं के अधिकारों और मीडिया की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा है। अफगान महिलाओं की स्थिति पहले से ही चिंताजनक है, और मीडिया से उनका बहिष्कार इस असमानता को और बढ़ा रहा है।

    तालिबान का कदम और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

    तालिबान की यह नीति केवल मीडिया के स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह सीधे अफगान महिलाओं के अधिकारों पर हमला है। पत्रकारों और मीडिया हाउस ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है। अंतरराष्ट्रीय संगठन और मानवाधिकार संस्थाएं तालिबान पर दबाव बना रही हैं कि वे महिला पत्रकारों और अन्य पेशेवर महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करें।

    विशेषज्ञों का कहना है कि महिला पत्रकारों को संवाद से अलग करना सिर्फ़ अफगान समाज में असमानता को बढ़ा रहा है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी चिंता का विषय है। मीडिया की स्वतंत्रता और महिला अधिकारों की अनदेखी, दोनों ही लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

    महिला अधिकार और शिक्षा में बाधाएं

    तालिबान के शासन में अफगान महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और मीडिया में भागीदारी लगातार सीमित होती जा रही है। महिलाओं को स्कूल और उच्च शिक्षा से रोका जा रहा है। नौकरी और पेशेवर अवसरों पर प्रतिबंध समाज में असमानता बढ़ा रहे हैं। महिला पत्रकारों को प्रेस ब्रिफिंग से बाहर रखना, इसी असमानता का एक स्पष्ट उदाहरण है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अगर महिला अधिकारों को नजरअंदाज किया गया, तो अफगान समाज में लैंगिक असमानता और बढ़ेगी। शिक्षा और मीडिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि समाज में महिलाओं की आवाज़ और प्रभाव बना रहे।

    मीडिया हाउस और पत्रकारों की प्रतिक्रिया

    अफगान महिला पत्रकारों के बहिष्कार ने मीडिया में खलबली मचा दी है। पत्रकारों ने बताया कि यह कदम सीधे तौर पर महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी है। मीडिया हाउस और अंतरराष्ट्रीय पत्रकार संगठन तालिबान के इस रवैये की आलोचना कर रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि मीडिया में महिलाओं की भागीदारी समाज में बदलाव लाने और लोकतांत्रिक मूल्यों को कायम रखने के लिए जरूरी है। अफगानिस्तान में महिला पत्रकारों को शामिल न करना, समाज और मीडिया दोनों के लिए नुकसानदेह है।

    अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस कदम को गंभीर रूप से देखा जा रहा है। मानवाधिकार संगठन, पत्रकार संघ और विभिन्न देशों ने तालिबान से आग्रह किया है कि वे महिला पत्रकारों और पेशेवर महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करें। तालिबान के इस रवैये से अफगानिस्तान का अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठान भी प्रभावित हो रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह स्थिति जारी रही, तो अफगान महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्रता पर गंभीर असर पड़ेगा। मीडिया की स्वतंत्रता और महिला अधिकार, दोनों ही लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार हैं, और इनकी अनदेखी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफगानिस्तान की छवि को कमजोर करेगी।

  • यूपी में पुलिस का बड़ा ऑपरेशन, 20 गैंगस्टर एनकाउंटर में ढेर, कानून सख्त

    यूपी में पुलिस का बड़ा ऑपरेशन, 20 गैंगस्टर एनकाउंटर में ढेर, कानून सख्त

    उत्तर प्रदेश पुलिस ने राज्य में अपराधियों के खिलाफ सबसे बड़ा ऑपरेशन चलाया है। पिछले 48 घंटों में 20 एनकाउंटर किए गए, जिनमें कई वांटेड अपराधियों को पकड़ने में सफलता मिली। यह अभियान “लंगड़ा” और “खल्लास” के तहत संचालित किया गया, और इसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीरो टॉलरेंस नीति के अनुरूप अंजाम दिया गया।

    मुख्य मुठभेड़ और ऑपरेशन की जानकारी

    सबसे बड़ी मुठभेड़ नगला खेपड़ जंगल में हुई, जहां 30 से अधिक केसों में वांटेड गैंगस्टर इंदरपाल पुलिस मुठभेड़ में ढेर हो गया। इस ऑपरेशन के दौरान बुलंदशहर, शामली, कानपुर, सहारनपुर, लखनऊ, बागपत, मुजफ्फरनगर, गोरखपुर, हापुड़ और मेरठ में गैंगस्टर्स को चारों ओर से घेरकर पकड़ा गया।

    पुलिस अधिकारियों ने बताया कि यह अभियान अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संदेश देने के लिए शुरू किया गया था। राज्य में आपराधिक घटनाओं को रोकने और आम जनता को सुरक्षा का भरोसा दिलाने के लिए यह अभियान बेहद महत्वपूर्ण था।

    सरकार और मानवाधिकार संगठन की प्रतिक्रिया

    इस ऑपरेशन को सरकार ने अपराध पर करारा प्रहार बताया है। अधिकारियों के अनुसार, इससे अपराधियों में भय का माहौल उत्पन्न हुआ है और राज्य में कानून व्यवस्था को मजबूत किया गया है।

    वहीं, कुछ मानवाधिकार संगठन ने इस कार्रवाई की गंभीरता पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि पुलिस को कानून और न्याय प्रक्रिया का पालन करना चाहिए और किसी भी कार्रवाई में मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

    लोकतंत्र और कानून का संतुलन

    उत्तर प्रदेश में इस प्रकार के ऑपरेशन यह दिखाते हैं कि राज्य सरकार अपराध नियंत्रण के लिए गंभीर है। साथ ही, यह भी स्पष्ट करता है कि कानून और लोकतंत्र के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। आम जनता को सुरक्षा और न्याय की गारंटी मिले, इसके लिए पुलिस और सरकार दोनों को मिलकर काम करना होगा।

    उत्तर प्रदेश पुलिस का यह 48 घंटे का अभियान न केवल अपराधियों के खिलाफ एक सख्त संदेश है, बल्कि यह जनता में सुरक्षा की भावना को भी मजबूत करता है। ऑपरेशन “लंगड़ा” और “खल्लास” ने यह सिद्ध किया कि अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से कानून व्यवस्था बेहतर बनाई जा सकती है।

  • जस्टिस अभय ओका का बड़ा बयान: मौलिक अधिकार और आजादी खतरे में

    जस्टिस अभय ओका का बड़ा बयान: मौलिक अधिकार और आजादी खतरे में

    सरकारों का रवैया और मौलिक अधिकारों पर खतरा

    सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय ओका ने हाल ही में सरकारों के रवैये पर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि लोगों की बोलने की आजादी और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में है। जस्टिस ओका, जिन्होंने 22 वर्षों तक न्यायाधीश के रूप में सेवा की, ने यह टिप्पणी मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद एक साक्षात्कार में की। उन्होंने इस दौरान यह भी कहा कि सरकारें, चाहे किसी भी दल की हों, हमेशा से लोगों के मौलिक अधिकारों पर हमला करती रही हैं। उनके अनुसार, इतिहास इस बात का गवाह है कि सत्ता में मौजूद सरकारें लगातार नागरिकों के अधिकारों को कम करने की कोशिश करती हैं। यह बयान मौजूदा समय में लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रता की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाता है।

    न्यायपालिका में सुधार की आवश्यकता

    जस्टिस ओका ने न्यायपालिका में सुधार की जरूरत पर भी बल दिया। उन्होंने जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की वकालत की, जिससे जनता का न्यायपालिका पर भरोसा और मजबूत हो। उनके अनुसार, एक पारदर्शी और निष्पक्ष नियुक्ति प्रणाली न केवल न्यायपालिका की विश्वसनीयता बढ़ाएगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगी कि सही लोग इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए चुने जाएं। जस्टिस ओका का मानना है कि ऐसी प्रणाली से न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास बढ़ेगा, जो लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक है।

    जस्टिस अभय ओका का शानदार करियर

    जस्टिस अभय ओका का करियर न्याय के क्षेत्र में प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने अपने पिता के चैंबर में ठाणे जिला न्यायालय से वकालत शुरू की थी। उनकी मेहनत और प्रतिभा ने उन्हें अगस्त 2003 में बॉम्बे हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश बनाया, और नवंबर 2005 में उन्हें स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया। मई 2019 में, उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। इसके बाद, अगस्त 2021 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। अपने कार्यकाल के दौरान, जस्टिस ओका ने कई ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले दिए, जो भारतीय न्यायपालिका में उनके योगदान को रेखांकित करते हैं। वे 24 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए।

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    लोगों के अधिकारों की रक्षा की जरूरत

    जस्टिस ओका का यह बयान आज के समय में बेहद प्रासंगिक है, जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकारों को लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए जवाबदेह होना चाहिए। उनके विचार न केवल न्यायपालिका के लिए, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए एक चेतावनी हैं कि हमें अपनी आजादी और अधिकारों को संरक्षित करने के लिए सजग रहना होगा। जस्टिस ओका का यह बयान हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि एक मजबूत और निष्पक्ष न्यायपालिका ही लोकतंत्र का आधार है।

  • मणिपुर में फिर भड़की हिंसा, प्रियंका गांधी ने केंद्र की चुप्पी पर उठाए सवाल

    मणिपुर में फिर भड़की हिंसा, प्रियंका गांधी ने केंद्र की चुप्पी पर उठाए सवाल

    मणिपुर एक बार फिर हिंसा और तनाव की गिरफ्त में है। बीते दो वर्षों से इस पूर्वोत्तर राज्य में जातीय संघर्ष, हत्याएं, पलायन और बलात्कार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और हज़ारों परिवार बेघर हो चुके हैं। ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने रविवार (8 जून) को केंद्र सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता पर तीखा हमला किया।

    विरोध प्रदर्शन के बाद इंटरनेट बंद, कर्फ्यू लागू

    शनिवार को मणिपुर की राजधानी इंफाल के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए, जिन पर नियंत्रण पाने के लिए प्रशासन ने सख्त कदम उठाए। पांच जिलों में इंटरनेट सेवाएं पांच दिन के लिए बंद कर दी गई हैं। इसके अलावा, चार जिलों में धारा 144 लागू कर दी गई है ताकि लोगों के सार्वजनिक स्थानों पर इकट्ठा होने पर रोक लगाई जा सके। एक जिले में कर्फ्यू भी लगा दिया गया है।

    प्रियंका गांधी का केंद्र सरकार पर सीधा सवाल

    प्रियंका गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा:

    “मणिपुर एक बार फिर से हिंसा की चपेट में है। करीब दो साल से राज्य के लोग हिंसा, हत्या, बलात्कार और पलायन झेल रहे हैं। सैकड़ों मौतें हो चुकी हैं, हजारों लोग बेघर हैं। आखिर क्या कारण है कि केंद्र का शासन होने के बावजूद वहाँ शांति बहाली नहीं हो पा रही है?”

    प्रियंका ने केंद्र सरकार पर सीधा आरोप लगाया कि मणिपुर में शांति बहाली के लिए कोई ठोस और प्रभावी प्रयास नहीं किए जा रहे। उन्होंने कहा कि केंद्र की निष्क्रियता चिंताजनक है और इससे लोकतंत्र में आमजन का विश्वास डगमगाता है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी उठाए सवाल

    प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौन नीति पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने लिखा:

    “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मणिपुर को उसके हाल पर क्यों छोड़ दिया है? न उन्होंने मणिपुर का दौरा किया, न किसी प्रतिनिधि से मिले, न शांति की अपील की और न ही कोई ठोस पहल की। यह संवेदनहीनता लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।”

    यह बयान केंद्र सरकार की जवाबदेही को कटघरे में खड़ा करता है, खासकर जब राज्य सीधे केंद्र शासन के अधीन है।

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    मणिपुर में शांति की राह चुनौतीपूर्ण

    मणिपुर में जारी संकट को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि इंटरनेट बंद करना या कर्फ्यू लगाना केवल अस्थायी समाधान हैं। स्थायी शांति के लिए सभी पक्षों से संवाद आवश्यक है। जनजातीय समूहों, स्थानीय संगठनों और प्रशासन के बीच विश्वास बहाल करना अब समय की मांग है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार सामाजिक समरसता, न्याय और विकास पर आधारित नीतियाँ लागू नहीं करती, तब तक मणिपुर को स्थायी राहत नहीं मिल पाएगी।

  • जापान में यूनुस की शांति की अपील, बांग्लादेश में इस्लाम बरी

    जापान में यूनुस की शांति की अपील, बांग्लादेश में इस्लाम बरी

    बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस ने 29 मई, 2025 को जापान की राजधानी टोक्यो में एक महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा कि एशिया और विश्व में शांति तेजी से मायावी होती जा रही है। युद्ध और मानव निर्मित संघर्ष हजारों लोगों के जीवन और उनकी आजीविका को नष्ट कर रहे हैं। यूनुस ने जोर देकर कहा कि एशिया को वैश्विक स्तर पर एक नया नैतिक दिशा-निर्देश प्रस्तुत करना चाहिए, जो शक्ति के बजाय शांति, प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग और अल्पकालिक लाभ के बजाय स्थिरता को बढ़ावा दे। यह बयान वैश्विक अशांति के बीच एक सकारात्मक और सहयोगात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

    बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

    यूनुस का यह बयान बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले के कुछ दिनों बाद आया, जिसमें जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख नेता एटीएम अजहरुल इस्लाम को बरी कर दिया गया। इस्लाम पर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान गंभीर अपराधों के आरोप थे, जिनमें 1,256 लोगों की हत्या, 17 लोगों का अपहरण और 13 महिलाओं के साथ बलात्कार शामिल थे। यह फैसला शेख हसीना की सरकार द्वारा पिछले साल दी गई मृत्युदंड की सजा को पलटता है। जमात-ए-इस्लामी ने मुक्ति संग्राम के दौरान इस्लामाबाद का समर्थन किया था, जिसके कारण बांग्लादेश में आज भी इस संगठन के प्रति गुस्सा देखा जाता है।

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    अजहरुल इस्लाम का विवादास्पद इतिहास

    1952 में रंगपुर जिले के बदरगंज के लोहानीपारा गांव में जन्मे अजहरुल इस्लाम ने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान अल-बद्र मिलिशिया के कमांडर के रूप में काम किया था। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तानी सेना का साथ देकर मुक्ति संग्राम को दबाने की कोशिश की थी। 2014 में उन्हें झारूआरबील नरसंहार की साजिश रचने का दोषी ठहराया गया, जिसमें रंगपुर डिवीजन में 1,256 लोगों की क्रूर हत्या और 13 महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था। इस्लाम 2012 से हिरासत में थे और उन्होंने 2015, 2019 और 2020 में अपनी सजा के खिलाफ अपील की थी। अंततः, 27 फरवरी, 2025 को दायर उनकी अपील पर सुनवाई के बाद, मुख्य न्यायाधीश सैयद रेफात अहमद की अगुवाई वाली पूर्ण पीठ ने मंगलवार को उन्हें बरी कर दिया।

    शेख हसीना का जमात-ए-इस्लामी पर कड़ा रुख

    शेख हसीना ने अपने कार्यकाल के दौरान जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाया था और इसके कई नेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की थी। अजहरुल इस्लाम उन छह वरिष्ठ नेताओं में से एक थे, जिन्हें उनकी सरकार के दौरान दोषी ठहराया गया था। इस फैसले ने बांग्लादेश की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने में गहरे विभाजन को उजागर किया है, क्योंकि 1971 के युद्ध के घाव आज भी ताजा हैं।