September 3, 2026

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पाकिस्तान में पेट्रोल संकट पर यू-टर्न, क्या शहबाज़ सरकार की राहत टिकाऊ है या सिर्फ चुनावी चाल?

पड़ोसी देश पाकिस्तान इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है, और इसका सबसे बड़ा असर आम जनता की जेब पर पड़ा है। हाल ही में पेट्रोल की कीमतों में भारी उछाल ने देशभर में विरोध प्रदर्शनों की लहर पैदा कर दी। इस्लामाबाद से लेकर लाहौर तक लोग सड़कों पर उतर आए। लेकिन इसी उबाल के बीच प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने अचानक बड़ा फैसला लेते हुए पेट्रोल की कीमतों में ₹80 प्रति लीटर की कटौती का ऐलान कर दिया।

पेट्रोल कीमतों में भारी कटौती: राहत या रणनीति?

कुछ ही दिन पहले तक पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत लगभग ₹458 प्रति लीटर तक पहुंच चुकी थी, जिसने आम आदमी की कमर तोड़ दी थी। लेकिन सरकार के यू-टर्न के बाद अब कीमत घटकर ₹378 प्रति लीटर हो गई है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सरकार पर जनता का भारी दबाव था और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही थी।प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने टीवी पर आकर भावुक अपील करते हुए कहा कि वे जनता की तकलीफ नहीं देख सकते। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ जनदबाव का परिणाम नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे International Monetary Fund (IMF) के दबाव और वैश्विक तेल बाजार की अस्थिरता से भी जुड़ा है।

IMF का दबाव और मिडिल ईस्ट का असर

पाकिस्तान लंबे समय से IMF के बेलआउट पैकेज पर निर्भर है। IMF की शर्तों के तहत सब्सिडी कम करने और टैक्स बढ़ाने जैसे कदम उठाने पड़ते हैं। वहीं, मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को और कमजोर किया है।ऐसे में पेट्रोल पर सब्सिडी देना सरकार के लिए आर्थिक रूप से भारी पड़ सकता है। यही कारण है कि कई जानकार इस फैसले को अस्थायी राहत मान रहे हैं।

मंत्रियों की सैलरी पर भी गाज

सरकार ने सिर्फ पेट्रोल कीमतों में कटौती ही नहीं की, बल्कि अपने मंत्रियों पर भी सख्ती दिखाई है। घोषणा की गई है कि अगले 6 महीनों तक किसी भी मंत्री को वेतन नहीं मिलेगा। यह कदम प्रतीकात्मक रूप से यह दिखाने के लिए उठाया गया है कि सरकार भी जनता के साथ “त्याग” कर रही है।

विपक्ष का हमला: “चुनावी लॉलीपॉप”

पाकिस्तान के विपक्षी दलों ने इस फैसले को सरकार की विफलता करार दिया है। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक “चुनावी लॉलीपॉप” है, जो अस्थायी रूप से जनता को शांत करने के लिए दिया गया है।

क्या यह राहत टिक पाएगी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान इस तरह की सब्सिडी को लंबे समय तक जारी रख पाएगा? देश पहले ही भारी कर्ज, महंगाई और विदेशी मुद्रा संकट से जूझ रहा है। ऐसे में ₹80 की कटौती सरकार के वित्तीय बोझ को और बढ़ा सकती है।विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो पाकिस्तान के लिए इस राहत को जारी रखना मुश्किल होगा। इससे फिर से कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है, जो जनता के गुस्से को और भड़का सकती है।

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