यासीन मलिक का तिहाड़ जेल से दाखिल 85 पेज का हलफनामा कश्मीर की राजनीति में भूचाल ला रहा है। JKLF प्रमुख ने खुद को ‘शांति दूत’ बताते हुए NIA की फांसी की मांग को चुनौती दी है। 2022 से उम्रकैद काट रहे मलिक ने दावा किया कि छह सरकारों ने उन्हें बैकचैनल डिप्लोमेसी के लिए इस्तेमाल किया। आर्टिकल 370 हटने के बाद ये प्रयास ‘धोखा’ बन गए। विपक्ष इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रहा, जबकि सरकार आतंकवाद का बचाव। यह दस्तावेज न सिर्फ मलिक की सजा पर सवाल उठाता है, बल्कि कश्मीर नीति की जटिलताओं को उजागर करता है।
RSS और शंकराचार्यों से कथित रिश्ते: सद्भाव या साजिश?
हलफनामे का सबसे विवादास्पद हिस्सा RSS और हिंदू नेताओं से संपर्क है। मलिक ने 2011 में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में RSS नेताओं के साथ पांच घंटे की बैठक का दावा किया, जो थिंक टैंक ने आयोजित की। विवेकानंद फाउंडेशन के चेयरमैन एडमिरल के.के. नायर ने उन्हें लंच पर बुलाया। “गंभीर आरोपों के बावजूद RSS ने दूरी क्यों नहीं रखी?” मलिक ने सवाल उठाया। इसी तरह, दो शंकराचार्य श्रीनगर उनके घर ‘कई बार’ आए और प्रेस कॉन्फ्रेंस में साथ दिखे। उनका तर्क: यह बहुसंख्यक समुदाय का समर्थन था, जो कश्मीरी पंडितों पर हिंसा के आरोपों को खारिज करता है। पूर्व J&K DGP एसपी वैद ने इसे ‘शर्मनाक’ कहा, तो कांग्रेस के पवन खेड़ा ने BJP पर तंज कसा कि 2011 की बैठक अब क्यों भूली? ये दावे कश्मीर में धार्मिक सद्भाव की पुरानी कोशिशों को याद दिलाते हैं, लेकिन वर्तमान संदर्भ में संदेहास्पद लगते हैं। क्या यह शांति का प्रतीक था या छिपी राजनीतिक चाल?
वाजपेयी से मनमोहन तक: गुप्त बैठकें और युद्धविराम की भूमिका
मलिक ने अपनी ‘शांति भूमिका’ को मजबूत करने के लिए हाई-प्रोफाइल मुलाकातें गिनाईं। 2000-01 में वाजपेयी के रमजान युद्धविराम के दौरान IB के अजित डोभाल ने उन्हें दिल्ली बुलाया, जहां IB चीफ श्यामल दत्ता और NSA ब्रजेश मिश्रा से मिलवाया। वाजपेयी और एलके अडवानी का समर्थन मिला, जिससे 2001 में पहला पासपोर्ट हासिल हुआ। वे अमेरिका, यूके, सऊदी अरब और पाकिस्तान गए, ‘अहिंसक संघर्ष’ पर चर्चा की। 1995 में जेल रिहाई के बाद वाजपेयी से मिले। 2006 में मनमोहन सिंह ने दिल्ली बुलाया, कश्मीर समाधान का वादा किया। मलिक ने 1990 के बाद पीवी नरसिम्हा राव, आईके गुजराल, सोनिया गांधी, पी चिदंबरम और राजेश पायलट से संपर्कों का जिक्र किया। आरके मिश्रा ने वसंत विहार में ब्रजेश मिश्रा के साथ नाश्ता करवाया। ये खुलासे बैकचैनल डिप्लोमेसी की झलक देते हैं, लेकिन NIA इन्हें ‘आतंक को वैधता’ देने का हथकंडा बता रही है।
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हाफिज सईद से मिलन का धमाका: मनमोहन का ‘आभार’ और ‘बेट्रेयल’
सबसे चौंकाने वाला दावा 2006 की पाक यात्रा का है। 2005 कश्मीर भूकंप राहत में IB के वीके जोशी के कहने पर मलिक ने हाफिज सईद और सैयद सलाहुद्दीन से मुलाकात की। सईद ने जिहादी मीटिंग बुलाई, जहां मलिक ने शांति अपील की। लौटकर NSA एमके नारायणन के साथ मनमोहन सिंह को ब्रिफिंग दी, जिन्होंने ‘आभार’ जताया। मलिक ने इसे ‘क्लासिक बेट्रेयल’ बताया, क्योंकि 370 हटने के बाद इसे UAPA के तहत आतंक साबित किया गया। PoK में JKLF के रफीक दर्र से बातचीत से हुर्रियत नेताओं—गिलानी, मिर्वाइज, लोन—के समर्थन से युद्धविराम बयान बने। पूर्व DGP वैद ने इसे ‘सरकार की शर्मिंदगी’ कहा, मलिक बोले कि IB का Gmail अकाउंट था, NIA जांच करे।
NIA की फांसी मांग: 10 नवंबर को फैसला, राजनीतिक तूफान
NIA 2017 फंडिंग केस में मलिक की उम्रकैद को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ बताकर फांसी चाहती है। आरोप: सईद, सलाहुद्दीन, शब्बीर शाह से साजिश, पाक फंड से अशांति। 2022 में कोर्ट ने उम्रकैद दी, NIA ने अपील की। हाईकोर्ट ने 11 अगस्त को चार हफ्ते समय दिया, 10 नवंबर को वर्चुअल सुनवाई। सरकार मलिक पर संप्रभुता खतरे का आरोप लगा रही। PDP की महबूबा मुफ्ती ने दया याचिका मांगी, JKLF के लोन ने NIA को ‘खोखला’ कहा।
कश्मीर शांति का साया: विवाद से भविष्य की चुनौतियां
मलिक का हलफनामा पुरानी शांति वार्ताओं को उघाड़ रहा है, जहां डिप्लोमेसी ने आशा जगाई लेकिन अब हथियार बन गई। विशेषज्ञों का मानना है कि दावे साबित करना मुश्किल, लेकिन नीति की जटिलताएं साफ हैं। विपक्ष BJP पर डबल स्टैंडर्ड का आरोप लगा रहा, सत्ता पक्ष इसे प्रचार बता रही। क्या ये खुलासे मलिक को बचाएंगे या NIA जीतेगी? 10 नवंबर का फैसला न सिर्फ मलिक, बल्कि कश्मीर शांति पर सवाल खड़े करेगा। यह घटना भारत की आंतरिक सुरक्षा और डिप्लोमेसी की गहराइयों को नई बहस दिला रही है।

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