वक्फ संशोधन बिल पर लोकसभा में बहस: रविशंकर प्रसाद बनाम कल्याण बनर्जी

लोकसभा में वक्फ संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद और तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद कल्याण बनर्जी ने अपने-अपने विचार रखे। जहां रविशंकर प्रसाद ने इस बिल को देश और अल्पसंख्यकों के हित में बताया, वहीं कल्याण बनर्जी ने इसका विरोध किया और इसे संविधान के खिलाफ करार दिया।

कल्याण बनर्जी: वक्फ बिल संविधान की मूल संरचना के खिलाफ

तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने वक्फ संशोधन विधेयक का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह विधेयक संविधान की मूल संरचना को प्रभावित करता है और मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता दी गई है और वक्फ संपत्तियाँ इस स्वतंत्रता का हिस्सा हैं। उनका दावा था कि सरकार का यह कदम मुस्लिम समुदाय को कमजोर करने की मंशा से उठाया गया है।

संसद को वक्फ कानून बनाने का अधिकार नहीं?

कल्याण बनर्जी ने यह भी कहा कि वक्फ संपत्तियों के संबंध में कानून बनाने का अधिकार संसद के पास नहीं है, क्योंकि यह विषय राज्य सूची के अंतर्गत आता है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुसार, भूमि और धार्मिक संपत्तियों से संबंधित कानून राज्य सरकारों के अधीन आते हैं, इसलिए केंद्र सरकार को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

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हिंदू और मुस्लिम कानूनों में भेदभाव का आरोप

कल्याण बनर्जी ने हिंदू और मुस्लिम संपत्ति कानूनों के बीच अंतर पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदू धार्मिक संपत्तियों को निजी अधिकारों के तहत देखा जाता है, जबकि मुस्लिम संपत्तियों को वक्फ बोर्ड के माध्यम से सरकारी नियंत्रण में रखा जाता है। उन्होंने कहा कि यह भेदभाव संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ है।

टीएमसी का रुख और विपक्ष की रणनीति

टीएमसी सांसद ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और वह इस विधेयक का पुरजोर विरोध करेगी। उन्होंने अन्य विपक्षी दलों से भी अपील की कि वे इस बिल का विरोध करें और इसे पास होने से रोकें।

रविशंकर प्रसाद: वक्फ संपत्तियों का पारदर्शी उपयोग जरूरी

रविशंकर प्रसाद ने अपने भाषण में स्पष्ट किया कि वक्फ किसी धार्मिक संस्था की तरह कार्य नहीं करता, बल्कि यह एक वैधानिक संस्था है। उन्होंने कहा कि वक्फ की संपत्तियाँ एक ट्रस्ट के रूप में कार्य करती हैं, और उनका उचित प्रबंधन आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि पूरे देश में वक्फ बोर्ड के अंतर्गत करीब 8,00,000 संपत्तियाँ आती हैं। यह संपत्तियाँ सरकार द्वारा दी गई सुविधाओं और कर लाभों के अंतर्गत आती हैं, लेकिन इनका सही उपयोग कितना हुआ है, इस पर सवाल उठाए जाने चाहिए।

वक्फ संपत्तियों का सही उपयोग क्यों नहीं हो रहा?

रविशंकर प्रसाद ने अपने भाषण में पूछा कि इन लाखों वक्फ संपत्तियों का इस्तेमाल सामाजिक विकास के लिए कितना हुआ है? उन्होंने कहा कि इन संपत्तियों पर कितने स्कूल, अस्पताल और स्किल डेवलपमेंट सेंटर बनाए गए हैं, इसका आकलन होना चाहिए।

उनका तर्क था कि अगर वक्फ संपत्तियाँ अल्पसंख्यक समाज के हित में हैं, तो फिर इनका सही ढंग से उपयोग क्यों नहीं किया गया? उन्होंने यह भी कहा कि यदि वक्फ संपत्तियों से जनता को फायदा नहीं हो रहा, तो उनके प्रबंधन पर ध्यान देने की जरूरत है।

मुतवल्ली की भूमिका और नियंत्रण की आवश्यकता

रविशंकर प्रसाद ने कहा कि मुतवल्ली (वक्फ संपत्तियों का प्रबंधक) सिर्फ एक मैनेजर की भूमिका निभाता है, न कि मालिक की। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुतवल्ली पर उचित नियंत्रण होना चाहिए ताकि संपत्तियों का दुरुपयोग न हो।

उन्होंने कहा कि अक्सर मुतवल्ली की भूमिका पर सवाल उठाए जाते हैं क्योंकि कई मामलों में संपत्तियों को व्यावसायिक रूप से किराए पर दिया जाता है, लेकिन उस धन का सही उपयोग नहीं किया जाता। इसलिए, इस पर एक उचित प्रणाली लागू होनी चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

विपक्ष पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप

अपने भाषण में रविशंकर प्रसाद ने विपक्षी दलों पर भी निशाना साधा और आरोप लगाया कि वे इस मुद्दे को धार्मिक रंग देकर वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब भी सरकार वक्फ बोर्ड के नियमों में पारदर्शिता लाने की कोशिश करती है, तो इसे धर्म से जोड़ा जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष केवल अल्पसंख्यक समाज को एक खास मानसिकता में रखने की कोशिश करता है, जबकि सरकार का उद्देश्य सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना है।

वक्फ संशोधन बिल को लेकर लोकसभा में तीखी बहस हुई। रविशंकर प्रसाद ने इसे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाला बताया, जबकि कल्याण बनर्जी ने इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करार दिया।

इस बिल को लेकर सरकार और विपक्ष की राय भले ही अलग-अलग हो, लेकिन यह स्पष्ट है कि वक्फ संपत्तियों के उपयोग और प्रबंधन को लेकर एक ठोस नीति की जरूरत है। अब देखना यह होगा कि यह विधेयक आगे क्या रूप लेता है और इसका देश की धार्मिक और सामाजिक संरचना पर क्या प्रभाव पड़ता है।

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