एक बार फिर भारतीय किसान आंदोलन के भीतर मतभेद की आहट सुनाई दे रही है। हाल ही में किसान नेता नरेश टिकैत ने एक सार्वजनिक मंच से ऐसा बयान दिया जिससे यह संकेत मिला कि सरकार और किसान संगठनों के बीच तनाव अभी भी बरकरार है। लेकिन इसी बीच उनके छोटे भाई और किसान नेता राकेश टिकैत ने इस पर अलग रुख अपनाते हुए कहा – “हम सरकार के साथ हैं।”
इस बयान के बाद किसान राजनीति में खलबली मच गई है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा-पंजाब के किसान जहां टिकैत बंधुओं को एकजुट मानते आए हैं, वहीं अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या किसान आंदोलन दो धाराओं में बंट गया है?
नरेश टिकैत का बयान – क्या है मामला?
मुजफ्फरनगर में एक पंचायत को संबोधित करते हुए नरेश टिकैत ने कहा था कि सरकार किसानों के मुद्दों को हल करने में गंभीर नहीं है। उन्होंने एमएसपी गारंटी कानून, गन्ना भुगतान और आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमों की वापसी जैसे मुद्दों को उठाया। नरेश टिकैत ने यह भी कहा कि “अगर सरकार नहीं मानी, तो आंदोलन फिर से तेज़ होगा।”
उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि शायद भारतीय किसान यूनियन एक बार फिर आक्रामक मोड में जाने की तैयारी कर रही है।
राकेश टिकैत का पलटवार – ‘गलतफहमी न फैलाएं’
नरेश टिकैत के बयान के कुछ घंटों बाद राकेश टिकैत ने प्रेस से बात करते हुए कहा, “हम सरकार के साथ हैं। बातचीत चल रही है। गलतफहमी फैलाने की ज़रूरत नहीं है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसान संगठन सरकार के साथ मिलकर समाधान की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और किसी तरह का टकराव इस समय उचित नहीं।
राजनीतिक संकेत क्या हैं?
राकेश टिकैत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब लोकसभा चुनाव 2024 के परिणामों के बाद किसान संगठनों पर विभिन्न राजनीतिक दलों की नज़र है। माना जा रहा है कि कुछ दल किसान मुद्दों को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राकेश टिकैत का ‘सरकार के साथ’ होना, न केवल एक रणनीतिक कदम है, बल्कि यह भी संकेत है कि किसान संगठन अब आंदोलन की जगह संवाद की नीति अपना रहे हैं।
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किसानों में भ्रम या रणनीति?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के किसानों में इस वक्त भ्रम की स्थिति है। एक ओर नरेश टिकैत का सख्त बयान, दूसरी ओर राकेश टिकैत की संयमित प्रतिक्रिया – इससे आम किसानों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या दोनों नेताओं की सोच में अंतर है या यह कोई रणनीति का हिस्सा है?
कुछ वरिष्ठ किसान नेताओं का मानना है कि यह ‘गुड कॉप-बैड कॉप’ रणनीति हो सकती है, ताकि सरकार पर दबाव भी बना रहे और संवाद का रास्ता भी खुला रहे।
आम किसान की प्रतिक्रिया
बागपत, शामली, करनाल और मेरठ जैसे क्षेत्रों में किसानों ने कहा कि उन्हें टिकैत बंधुओं पर अब भी भरोसा है, लेकिन अगर एकता में दरार आती है तो आंदोलन की धार कमज़ोर हो सकती है।
किसानों का यह भी कहना है कि जो भी फैसला हो, वह एकजुट होकर होना चाहिए। “हम सरकार से टकराव नहीं चाहते, लेकिन अपने हक से भी पीछे नहीं हट सकते,” एक किसान ने कहा।
आगे का रास्ता क्या होगा?
फिलहाल किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच बातचीत की प्रक्रिया चल रही है। गन्ना मूल्य, एमएसपी पर कानून और पुराने केसों को लेकर कई दौर की वार्ता हो चुकी है, लेकिन अभी कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है।
राकेश टिकैत ने यह साफ किया है कि आंदोलन की बात तभी होगी जब बातचीत से समाधान न निकले। वहीं, नरेश टिकैत के तेवर बता रहे हैं कि वह सरकार की नीयत से संतुष्ट नहीं हैं।
टिकैत बंधुओं के बयानों में विरोधाभास चाहे रणनीति हो या मतभेद, लेकिन इससे किसान आंदोलन की दिशा पर ज़रूर असर पड़ेगा। उत्तर भारत के किसानों के लिए यह समय सतर्क रहने का है – क्योंकि अगर नेतृत्व में एकरूपता नहीं रही, तो सरकार के साथ सौदेबाज़ी में भी कमजोरी आ सकती है।
फिलहाल राकेश टिकैत की बातों से यही संकेत मिलता है कि संघर्ष की जगह संवाद को प्राथमिकता दी जा रही है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस संवाद को किस हद तक गंभीरता से लेती है।

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