जब इरादे नेक हों, तो मजहब की दीवारें भी बेमानी हो जाती हैं। मध्य प्रदेश के इटारसी शहर में रहने वाले आरिफ खान ने देश को एकता और इंसानियत का बेहतरीन संदेश दिया है। एक मुसलमान युवक का हिंदू संत को किडनी डोनेट करने का निर्णय आज देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह सिर्फ एक जैविक अंग दान नहीं है, बल्कि दो मजहबों के बीच मोहब्बत, भाईचारे और विश्वास की एक अनोखी मिसाल है।
कौन हैं आरिफ खान?
आरिफ खान इटारसी के एक सामान्य नागरिक हैं, जो एक छोटी सी कोरियर दुकान चलाते हैं। आर्थिक रूप से साधारण परिवार से आने वाले आरिफ की सोच असाधारण है। वे सोशल मीडिया पर संत प्रेमानंद महाराज के प्रवचनों से प्रेरित हुए, जिनमें वे कौमी एकता, सद्भावना और सभी धर्मों में प्रेम फैलाने की बात करते हैं। इन विचारों ने आरिफ के मन में गहरी छाप छोड़ी और उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया, जो आज करोड़ों दिलों को छू रहा है।
क्यों देना चाहते हैं किडनी?
आरिफ का कहना है कि जब भी वे संत प्रेमानंद महाराज को दो धर्मों के बीच प्रेम, शांति और भाईचारे का संदेश देते हुए देखते हैं, उन्हें अंदर से एक आत्मिक सुकून मिलता है। वे मानते हैं कि महाराज जैसे संत नफरत के अंधकार में रोशनी की किरण हैं। आरिफ ने यह कदम उठाते हुए एक पत्र प्रेमानंद महाराज और जिला प्रशासन को भेजा, जिसमें उन्होंने अपनी किडनी दान करने की इच्छा जताई है। उनका मानना है कि यह एक छोटी-सी भेंट है, जो वे उस व्यक्ति को देना चाहते हैं जो देश को जोड़ने का कार्य कर रहा है।
कौमी एकता का सच्चा संदेश
आरिफ खान का यह कदम धर्मनिरपेक्षता की भावना को फिर से जीवंत कर देता है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि भारत की असली पहचान उसकी विविधता और एकता में ही है। जब एक मुसलमान युवक बिना किसी स्वार्थ के एक हिंदू संत की सेवा के लिए आगे आता है, तो यह दर्शाता है कि धर्म सिर्फ पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि सच्चा धर्म है मानवता।
इंसानियत सबसे बड़ा धर्म
आरिफ खान की यह पहल आज के समय में बहुत जरूरी संदेश देती है—कि हम अपने-अपने धर्मों में रहकर भी एक-दूसरे के लिए जी सकते हैं, एक-दूसरे की भलाई चाह सकते हैं। अगर हर भारतीय आरिफ जैसी सोच रखे, तो नफरत की जगह प्रेम, और दीवारों की जगह पुल बनेंगे। यही है वह भारत, जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना पर टिका है।

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