Category: धर्म

  • Shattila Ekadashi 2026: तिल के 6 पवित्र उपाय, जिनसे मिटता है दुर्भाग्य!

    Shattila Ekadashi 2026: तिल के 6 पवित्र उपाय, जिनसे मिटता है दुर्भाग्य!

    Shattila Ekadashi 2026: माघ मास की कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी इस वर्ष 14 जनवरी को मनाई जाएगी। हिंदू धर्म में यह तिथि भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन तिल का विशेष महत्व होता है और इसके छह प्रकार के उपयोग करने से पापों का नाश, मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। व्रत, पूजा और तिल से जुड़े उपाय आध्यात्मिक शुद्धि के साथ-साथ घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।

    Shattila Ekadashi 2026: जाने क्या है वो 6 उपाय

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, षटतिला एकादशी पर तिल स्नान, तिल से बने उबटन का प्रयोग, तिलोदक द्वारा पितृ तर्पण, तिल का हवन, तिल से बने सात्विक भोजन का सेवन और तिल का दान, ये छह उपाय विशेष फलदायी माने गए हैं। ब्रह्म मुहूर्त में जल में तिल मिलाकर स्नान करने से आत्मिक शुद्धि होती है, जबकि तिलोदक से पितरों का तर्पण करने पर उनकी कृपा बनी रहती है। वहीं मंत्रोच्चार के साथ तिल हवन करने से वातावरण शुद्ध होता है और नकारात्मक शक्तियों का नाश माना जाता है।

    जाने क्या कहते है शास्त्र

    शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि बिना दान के एकादशी व्रत अधूरा माना जाता है। वहीं बात अगर Shattila Ekadashi 2026 की करें तो, षटतिला एकादशी के दिन तिल, तिल-गुड़ या तिल के लड्डुओं का दान करने से दरिद्रता दूर होती है और सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही गौ सेवा का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि तिल के इन छह पवित्र उपयोगों से न केवल सांसारिक कष्ट दूर होते हैं, बल्कि भगवान विष्णु की विशेष कृपा से जीवन में शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि का वास होता है।

  • गोरखनाथ को क्यों चढ़ाई जाती है खिचड़ी, जानिये क्या है पूरी कहानी

    गोरखनाथ को क्यों चढ़ाई जाती है खिचड़ी, जानिये क्या है पूरी कहानी

    मकर संक्राति से जुड़ी यूं तो कई कहानियां हैं। लेकिन गोरखपुर की गोरक्षनाथ पीठ की खिचड़ी का विशेष महत्व है। खिचड़ी का मेला शुरू  हो गया हैं । चरकी आ गई है । फेरी भी तैयार है । छुक छुक ट्रेन भी दौड़ रही है । और रोमाच से भर देने वाला मौत का कुआ भी आपका इंतजार कर रहा है । ये तस्वीर गोरखनाथ परिसर की है ।जहां मकर संक्रांति से सबसे बड़ा खिचड़ का मेला शुरू हो गया है….

    खिचड़ी मेले की शुरुआत और पौराणिक मान्यता

    मान्यता है कि खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा त्रेता युग से चली आ रही है। कहा जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत महायोगी गुरु गोरक्षनाथ ने की थी। मकर संक्रांति के दिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर तिल, गुड़ और अन्न का विशेष महत्व होता है। इसी दिन श्रद्धालु बाबा गोरक्षनाथ को खिचड़ी अर्पित करते हैं । और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यही वजह है कि यह मेला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और आध्यात्मिक विश्वास का प्रतीक है।

    गोरखनाथ मंदिर परिसर में उत्सव का माहौल

    गोरखनाथ मंदिर परिसर इन दिनों पूरी तरह मेले के रंग में रंगा हुआ है। चरखी आ चुकी है । फेरी तैयार है । छुक-छुक ट्रेन बच्चों को लुभा रही है । और रोमांच पसंद करने वालों के लिए मौत का कुआं भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। दूर-दराज से आए लोग न सिर्फ दर्शन के लिए पहुंचते हैं, बल्कि मेले की रौनक का आनंद भी लेते हैं। बच्चों की हंसी, दुकानों की चहल-पहल और लोकगीतों की गूंज पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देती है।

    धार्मिक आस्था के साथ लोकसंस्कृति का संगम

    खिचड़ी मेला इस मायने में भी खास है । कि यहां धार्मिक आस्था और लोकसंस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिलता है। मंदिर में श्रद्धालु सुबह से ही खिचड़ी चढ़ाने के लिए कतारों में खड़े नजर आते हैं । वहीं बाहर मेले में खिलौने, मिट्टी के बर्तन, लकड़ी के झूले, पारंपरिक मिठाइयां और स्थानीय व्यंजन लोगों को आकर्षित करते हैं। यह मेला ग्रामीण और शहरी संस्कृति को एक ही मंच पर जोड़ता है।

    पूर्वांचल का सबसे बड़ा धार्मिक मेला

    गोरखनाथ खिचड़ी मेला को पूर्वांचल का सबसे बड़ा धार्मिक मेला माना जाता है। उत्तर प्रदेश ही नहीं, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और नेपाल तक से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मकर संक्रांति के दिन से लेकर कई दिनों तक चलने वाला यह आयोजन गोरखपुर की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को भी गति देता है। स्थानीय व्यापारियों, कारीगरों और कलाकारों के लिए यह मेला आजीविका का बड़ा माध्यम बनता है।

  • Ram Mandir: ध्वजारोहण से पहले अखिलेश के पोस्ट ने खींचा सबका ध्यान!

    Ram Mandir: ध्वजारोहण से पहले अखिलेश के पोस्ट ने खींचा सबका ध्यान!

    Ram Mandir: आज अयोध्या में राम मंदिर पर ध्वजारोहण समारोह का आयोजन किया गया है। जिसमें देश भर से कई बड़े नाता भी शामिल होंगे। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अयोध्या में उपस्थित हो चुके है। अब इसी मौके पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर एक ट्वीट किया है। Akhilesh Yadav के इस ट्वीट ने लोगो का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। आइए जानते है कि अखिलेश यादव ने अपने सोसल मीडिया प्लैटफॉर्म पर क्या कुछ कहा।

    Ram Mandir: जाने अखिलेश यादव ने क्या कुछ कहा

    जानकारी के लिए बता दे कि अखिलेश यादव ने अपने इशारो इशारो में लोगो का ध्यान उस मंदिर पर भी खींचा जिसे अखिलेश यादव और उनका परिवार खुद बनवा रहा है। वहीं बात अगर अखिलेश यादव के पोस्ट की करें तो, उन्होने लिखा ‘आस्था जीवन को सकारात्मकता और सद्भाव से भरनेवाली ऊर्जा का ही नाम है। दर्शन के लिए ईश्वरीय इच्छा ही मार्ग बनाती है, वही बुलाती है। सच तो ये है कि हम सब तो ईश्वर के बनाएं मार्ग पर बस चलकर जाते हैं।’ आगे Akhilesh Yadav ने लिखा कि ‘ईश्वरीय प्रेरणा से इटावा में निर्माणाधीन ‘श्री केदारेश्वर महादेव मंदिर’ के पूर्ण होने पर अन्य मंदिरों के दर्शन का संकल्प भी पूर्ण करेंगे’

    राम मंदिर पर अखिलेश ने कही थी ये बड़ी बात

    बता दे कि अखिलेश यादव ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि अयोध्या Ram Mandir के निर्माण पूरा होने के बाद ही वो दर्शन करने जाएँगे। साथ ही उन्होने ये भी कहा था कि इटावा में बनने वाला ‘श्री केदारेश्वर महादेव मंदिर’ का निर्माण भी पूरा होने वाला है, जैसे ही मंदिर का निर्माण पूरा हो जाएगा, वहां के दर्शन करके सीधा परिवार के साथ अयोध्या जाएँगे। अब देखना ये होगा कि Akhilesh Yadav और परिवार कब रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या जाते है।

  • Premanand Maharaj का संदेश, राधा रानी में स्नेह और करुणा का प्रतीक…

    Premanand Maharaj का संदेश, राधा रानी में स्नेह और करुणा का प्रतीक…

    जब भी हम राधा रानी का नाम लेते हैं, मन में अपने आप भक्ति, प्रेम और समर्पण की भावना जाग उठती है। राधा रानी केवल कृष्ण की प्रेयसी नहीं हैं, बल्कि आध्यात्मिक प्रेम और सच्ची भक्ति का सर्वोच्च प्रतीक हैं। उनकी अनुपस्थिति में श्रीकृष्ण अधूरे हैं, और श्रीकृष्ण के बिना राधा रानी अधूरी हैं।

    राधा रानी को ‘मां’ कहना: क्या सही है?

    भक्त अक्सर पूछते हैं – क्या राधा रानी को ‘मां’ कहा जा सकता है? इस सवाल का उत्तर Premanand महाराज ने दिया है। उनके अनुसार, राधा रानी आदिशक्ति हैं और सभी शक्तियों का आधार हैं। इसलिए उन्हें ‘मां’ कहना केवल प्रेम और भक्ति से उपजा भाव है। यह सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक है, और इसमें कोई गलती नहीं है।

    जो भक्त राधा रानी को किशोरी जी के रूप में पूजते हैं, उनके लिए वे सखा हैं – प्रेम और मित्रता की मूर्ति। वहीं, जो उन्हें माता के रूप में देखते हैं, उनके लिए राधा रानी करुणा, स्नेह और पालन-पोषण का प्रतीक बन जाती हैं। भक्ति में बंधन नहीं, केवल प्रेम और श्रद्धा का अनुभव होता है।

    राधा-श्रीकृष्ण का दिव्य संबंध

    राधा और श्रीकृष्ण का संबंध केवल प्रेम का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक गहराई और चेतना का प्रतीक है। उनके बीच का प्रेम न केवल भौतिक प्रेम है, बल्कि यह आत्मा और परमात्मा के बीच के संबंध को दर्शाता है। यही कारण है कि भक्तों के मन में राधा रानी का नाम लेते ही श्रद्धा, प्रेम और आत्मीयता की भावना जाग उठती है।

    भक्ति में विविध दृष्टिकोण

    भक्ति के अलग-अलग रूप हैं – कोई राधा रानी को मित्र, सखा या प्रेमिका मानकर पूजा करता है, तो कोई उन्हें माता के रूप में देखता है। दोनों ही दृष्टिकोण समान रूप से सम्माननीय हैं। प्रेमानंद महाराज के अनुसार, भक्ति में नियम या बंधन नहीं होते, केवल श्रद्धा और प्रेम की भावना महत्वपूर्ण होती है।

    आध्यात्मिक संदेश

    राधा रानी का जीवन और उनका प्रेम हमें सिखाता है कि भक्ति केवल पूजा और मंत्रों तक सीमित नहीं है। यह अनुभव, श्रद्धा, करुणा और प्रेम से परिपूर्ण होना चाहिए। उनके प्रति सम्मान और प्रेम हमारे जीवन में आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खोलता है।

    राधा रानी के प्रति प्रेम और भक्ति का सही अर्थ समझना आवश्यक है। उन्हें ‘मां’ कहने का भाव, चाहे सखा या किशोरी रूप में पूजा करना, सभी भक्तों के लिए एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव है। प्रेमानंद महाराज की शिक्षाओं के अनुसार, भक्ति का वास्तविक सार प्रेम, श्रद्धा और करुणा में निहित है। राधा रानी के प्रति यह श्रद्धा हमें जीवन में शांति, प्रेम और आध्यात्मिक जागरूकता प्रदान करती है।

  • खराब मौसम के बाद माता वैष्णो देवी यात्रा फिर से शुरू, भक्तों में लौट आया उत्साह

    खराब मौसम के बाद माता वैष्णो देवी यात्रा फिर से शुरू, भक्तों में लौट आया उत्साह

    तीन दिन के खराब मौसम के कारण रोक के बाद अब माता वैष्णो देवी यात्रा फिर से शुरू हो गई है। माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जानकारी साझा की है। यात्रा के पुनः शुरू होने से श्रद्धालुओं में खुशी और उत्साह का माहौल देखने को मिला।

    यात्रा पंजीकरण और सुरक्षा उपाय

    श्राइन बोर्ड ने बताया कि सभी यात्रा पंजीकरण काउंटर बुधवार, 8 अक्टूबर 2025 को सुबह 6 बजे से चालू रहेंगे। बोर्ड ने भक्तों से अपील की है कि वे यात्रा की पूरी जानकारी के लिए केवल आधिकारिक माध्यमों से अपडेट लेते रहें। इससे यात्रियों को भ्रम और किसी प्रकार की परेशानी से बचाया जा सकेगा।

    सुरक्षा और सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है। श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस और सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है। साथ ही, हॉल्टिंग पॉइंट्स और रेस्टिंग पॉइंट्स पर आवश्यक व्यवस्थाएं भी बनाई गई हैं।

    भक्तों का उत्साह और श्रद्धा

    यात्रा शुरू होते ही भक्तों का उत्साह और श्रद्धा फिर लौट आई है। माता के दर्शन के लिए निकलने वाले श्रद्धालु अपने परिवार और दोस्तों के साथ रोटेशन के हिसाब से यात्रा में शामिल हो रहे हैं। पवित्र गुफा तक पहुँचने के लिए पैदल मार्ग पर साफ-सफाई और मार्गदर्शन की पूरी व्यवस्था की गई है।

    भारी भीड़ और मार्ग व्यवस्थापन

    श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए बोर्ड ने विशेष मार्गदर्शन टीम तैयार की है। यह टीम यात्रियों को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से गुफा तक पहुँचाने में मदद कर रही है। इसके अलावा, भक्तों से अपील की गई है कि वे व्यक्तिगत सुरक्षा का ध्यान रखें और कोरोना या किसी अन्य स्वास्थ्य जोखिम से बचाव के लिए मास्क और सैनिटाइज़र का उपयोग करें।

    भक्तों के लिए जरूरी जानकारी

    • यात्रा के दौरान सभी आवश्यक दस्तावेज और पंजीकरण की जानकारी साथ रखें।
    • मार्ग पर पानी और खाने-पीने की पर्याप्त व्यवस्था की गई है, फिर भी व्यक्तिगत व्यवस्था रखें।
    • खराब मौसम की संभावना के मद्देनजर ऊनी कपड़े और जैकेट साथ रखें।
    • यात्रा के दौरान मोबाइल चार्जिंग और संपर्क व्यवस्था का ध्यान रखें।

    माता वैष्णो देवी यात्रा का यह पवित्र अवसर भक्तों के लिए आध्यात्मिक अनुभव का समय है। खराब मौसम के बाद यात्रा की पुनः शुरुआत ने सभी श्रद्धालुओं में नई ऊर्जा और उमंग का संचार किया है। माता रानी के दर्शन के इस पवित्र मौके का लाभ उठाते हुए भक्त अपनी भक्ति और श्रद्धा के साथ इस यात्रा का आनंद लें।

  • प्रेमानंद जी महाराज की पदयात्रा स्थगित: भक्तों के लिए महत्वपूर्ण सूचना और स्वास्थ्य अपडेट…

    प्रेमानंद जी महाराज की पदयात्रा स्थगित: भक्तों के लिए महत्वपूर्ण सूचना और स्वास्थ्य अपडेट…

    वृंदावन से प्राप्त ताज़ा जानकारी के अनुसार, प्रेमानंद जी महाराज की प्रतिदिन सुबह 4 बजे निकलने वाली पदयात्रा को स्वास्थ्य कारणों के चलते अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है। यह निर्णय महाराज जी के स्वास्थ्यऔर भक्तों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

    महाराज जी के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से यह सूचना साझा की गई है। भक्तों से निवेदन किया गया है कि वे प्रातः 4 बजे दर्शन के लिए एकत्र न हों। अब प्रतिदिन की पदयात्रा अगली सूचना तक आयोजित नहीं होगी।

    भक्तों से विशेष अनुरोध

    वृंदावन आने वाले सभी भक्तों से आग्रह किया गया है कि वे केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करें। किसी भी अफवाह या अनौपचारिक जानकारी पर विश्वास करने से बचें। इस निर्णय का उद्देश्य महाराज जी की भक्ति और स्वास्थ्य दोनों की सुरक्षा करना है।

    भक्तों को यह समझना चाहिए कि सतर्कता और संवेदनशीलता आवश्यक है। आप अपनी भक्ति बनाए रखें, लेकिन स्वास्थ्य सुरक्षा को प्राथमिकता दें।

    सोशल मीडिया और आधिकारिक सूचनाएं

    भक्त किसी भी फेक न्यूज़ या अनौपचारिक रिपोर्टों पर भरोसा न करें। महाराज जी की पदयात्रा अपडेट और अन्य कार्यक्रमों की सूचना केवल आधिकारिक सोशल मीडिया या आश्रम के माध्यम से ही साझा की जाएगी।

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे Facebook, Instagram, Twitter पर प्रेमानंद जी महाराज के आधिकारिक अकाउंट्स नियमित रूप से अपडेट देते हैं। भक्तों को केवल इन्हीं स्रोतों से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।

    स्वास्थ्य और भक्ति का संतुलन

    महाराज जी की स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का निर्णय भक्तों के लिए भी महत्वपूर्ण है। भक्ति का आनंद लें, लेकिन स्वास्थ्य और सुरक्षा नियमों का पालन करना भी आवश्यक है।

    भक्तगण अपने समाज और परिवार के लिए भी जिम्मेदार हैं। पदयात्रा स्थगित होने के बावजूद, आप अपने घर या आश्रम से भक्ति जारी रख सकते हैं।

    महाराज जी की स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का निर्णय भक्तों के लिए भी महत्वपूर्ण है। भक्ति का आनंद लें, लेकिन स्वास्थ्य और सुरक्षा नियमों का पालन करना भी आवश्यक है।

    भक्तगण अपने समाज और परिवार के लिए भी जिम्मेदार हैं। पदयात्रा स्थगित होने के बावजूद, आप अपने घर या आश्रम से भक्ति जारी रख सकते हैं।

  • भगवान शिव और नीला विष: समुद्र मंथन की कथा से प्रेरणा और जीवन का संदेश

    भगवान शिव और नीला विष: समुद्र मंथन की कथा से प्रेरणा और जीवन का संदेश

    भगवान शिव, जिनमें भगवान शिव भी शामिल हैं, केवल विनाशक नहीं बल्कि ब्रह्मांड के रक्षक भी हैं। उनका गला नीला क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर हमें समुद्र मंथन की कथा में मिलता है। देवता और असुर अमृत की खोज में समुद्र मठ रहे थे, तभी समुद्र से निकला कालकूट विष। यह इतना प्रचंड जहर था कि पूरी सृष्टि जल गई।

    कालकूट विष का खतरा

    जैसे ही विष का उदय हुआ, देवता और असुर दोनों डर गए। यदि यह समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है, तो ब्रह्मांडीय विनाश निश्चित था। सभी देवता भगवान शिव के पास गए और प्रार्थना की कि सृष्टि को बचाएं। यह घटना सच्ची शक्ति और त्याग की है, जो केवल महान चमत्कारों में ही है।

    भगवान शिव ने विष पी लिया

    भगवान शिव ने सृष्टि के लिए कालकूट विष स्वयं पी लिया। उन्होंने इसे डिजाइन नहीं किया, न ही उगला, बल्कि अपनी गर्दन में रोक लिया। यही कारण है कि उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा – “नीला गुलाब वाला महादेव“। यह घटना सिखाती है कि कठिन समय में खुद को समर्पित करना और दोस्तों के लिए त्याग करना ही सच्ची वीरता है।

    जीवन में नीलकंठ की शिक्षा

    नीलकंठ शिव की कथा केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन का पाठ भी है। यह हमें सिखाता है कि जब जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, तो हमें अपने अंदर के जीवन को सहन करना चाहिए और जीवन की कला सीखनी चाहिए। यह त्याग, धैर्य और आंतरिक शक्ति का प्रतीक है।

    प्रेरणा और आध्यात्मिक संदेश

    भगवान शिव का यह बलिदान आदर्श है कि महान कार्य तभी संभव हैं जब हम निस्वार्थ भाव से अपनाते हैं। व्यक्तिगत दुख हो या विषम परिस्थितियाँ, निशानों की तलाश के लिए अपने शौक और भय को त्यागना ही सच्चा मार्ग है। यह कहानी बच्चों और सभी बदमाशों के लिए प्रेरणादायक कहानी बन सकती है।

    नीला विष और जीवन दर्शन

    नीलकंठ शिव की कथा हमें याद दिलाती है कि सच्ची शक्ति केवल बाहरी शक्ति में नहीं है, बल्कि मानसिक लचीलापन, आत्म-नियंत्रण और बलिदान है। संयम का सामना करते हुए संयम और धैर्य बनाए रखना ही जीवन में सफलता और दृढ़ता का मार्ग है। भगवान शिव की तरह, जब हम अपने अंदर के विष को धारण करना सीख लेते हैं, तो हम केवल खुद को मजबूत नहीं बना पाते, बल्कि समाज और सृष्टि के लिए भी अपना योगदान दे सकते हैं।

  • रावण दहन का इतिहास और दशहरे का असली महत्व

    रावण दहन का इतिहास और दशहरे का असली महत्व

    दशहरा भारत में बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाने वाला त्योहार है। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। रामायण के अनुसार, भगवान राम ने रावण का वध किया और धर्म और न्याय की स्थापना की।

    इस पर्व का उद्देश्य हमें यह सिखाना है कि चाहे बुराई कितनी भी बड़ी हो, अंततः अच्छाई की हमेशा जीत होती है। दशहरा सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि नैतिकता, सच्चाई और अच्छाई के संदेश का प्रतीक है।

    दशहरा भारत का प्रमुख पर्व है, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। जानिए रावण दहन की शुरुआत कब हुई, इसकी इतिहासिक सच्चाई और दशहरे का वास्तविक महत्व।

    रावण दहन की वास्तविक शुरुआत

    कई लोगों की मान्यता है कि रावण दहन सदियों पुरानी परंपरा है। लेकिन सच्चाई यह है कि रावण दहन की परंपरा हमेशा से नहीं चली आ रही है।

    इतिहासकारों के अनुसार, रावण दहन की शुरुआत 1948 में झारखंड के रांची से हुई। यह परंपरा वहां आए पाकिस्तान से आए शरणार्थियों द्वारा शुरू की गई थी। शुरुआत में इसका उद्देश्य बुराई पर अच्छाई की विजय को दिखाना और समाज में नैतिकता का संदेश देना था।

    इसके बाद यह परंपरा धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गई और आज दशहरे का अनिवार्य हिस्सा बन गई।

    दशहरा और राजनीति

    कुछ लोग सोचते हैं कि रावण दहन ब्रिटिश काल या कांग्रेस के पहले से चल रही परंपरा है, लेकिन यह गलतफहमी है। असल में, यह परंपरा स्वतंत्र भारत में शुरू हुई और समाज में नैतिक संदेश देने के लिए अपनाई गई।

    दशहरा हमें यह भी सिखाता है कि त्योहारों को सही अर्थ और समझ के साथ मनाना जरूरी है। यह केवल उत्सव और मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि अच्छाई, नैतिकता और धर्म का प्रतीक है।

    आज का संदेश

    आज जब हम रावण दहन करते हैं, तो हमें केवल पुतले जलाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए। हमें यह याद रखना चाहिए कि इसका असली संदेश बुराई पर अच्छाई की विजय है।

    इस दशहरे, अपने भीतर के नकारात्मक विचारों को जलाएं और सकारात्मकता, सच्चाई और अच्छाई को अपनाएं। यही असली जश्न है।

  • शारदीय नवरात्रि 2025: देशभर के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़

    शारदीय नवरात्रि 2025: देशभर के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़

    शारदीय नवरात्रि 2025 का आगमन हो चुका है और देशभर के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। हिंदू धर्म के पवित्र त्योहारों में से एक नवरात्रि मां भगवती की उपासना और शक्ति का पर्व है। इस साल नवरात्रि का पहला दिन सोमवार, 22 सितंबर 2025 से शुरू हुआ। देशभर के श्रद्धालु सुबह से ही अपने-अपने मंदिरों में जय माता दी के जयकारे लगाते नजर आए।

    नवरात्रि की शुरुआत और घटस्थापना

    नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की जाती है। यह रिति-रिवाज मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र गागर (घट) को स्थापित करने की परंपरा है। पहले दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई पूजा और आराधना से मां भगवती अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

    इस साल भी दिल्ली-एनसीआर, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और पूरे देश के मंदिरों में श्रद्धालुओं की लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। छतरपुर स्थित श्री आद्या कात्यायनी शक्तिपीठ मंदिर में भी श्रद्धालुओं ने सुबह से ही पूजा-अर्चना शुरू कर दी है। भक्तजन माता के जयकारे लगाते और मंत्रोच्चारण करते नजर आए।

    देशभर के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़

    देश के प्रमुख मंदिरों में इस साल भी उत्साह और श्रद्धा का माहौल देखने को मिला। दिल्ली-एनसीआर के मंदिरों में सुबह-सुबह श्रद्धालुओं की कतारें लगी हुई थीं। वहीं, मुंबई, पुणे, कोलकाता और बेंगलुरु में भी भक्तजन नवरात्रि की पूजा के लिए मंदिरों में उमड़ पड़े। कई वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आई हैं, जिसमें लोग मां दुर्गा की आराधना करते और जय माता दी के जयकारे लगाते दिखाई दे रहे हैं।

    नवरात्रि का महत्व

    शारदीय नवरात्रि केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह पर्व नौ दिनों तक चलता है और मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि के दौरान व्रत, उपवास और भजन-कीर्तन का विशेष महत्व होता है। इसे आत्म-संयम, आध्यात्मिक शक्ति और श्रद्धा का पर्व भी कहा जाता है।

    श्रद्धालुओं के लिए टिप्स

    1. मंदिर जाते समय सुबह जल्दी निकलें, भीड़ से बचने के लिए।
    2. पूजा सामग्री और फूल लेकर जाएँ, ताकि किसी अन्य से वस्तु लेने की आवश्यकता न पड़े।
    3. सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें और कोविड प्रोटोकॉल का ध्यान रखें।
    4. मंदिर में मोबाइल का उपयोग सीमित रखें और पूजा पर ध्यान केंद्रित करें।

    सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो

    इस नवरात्रि के मौके पर देशभर के मंदिरों से कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु के मंदिरों में श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़ को सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है। इन वीडियो में भक्तजन माता की आराधना करते, दीप जलाते और भजन-कीर्तन में भाग लेते दिखाई दे रहे हैं।

    शारदीय नवरात्रि 2025 ने पूरे देश में धार्मिक और आध्यात्मिक उत्साह को नया आयाम दिया है। भक्तजन माँ दुर्गा की पूजा कर अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना कर रहे हैं। यह पर्व हमें शक्ति, श्रद्धा और भक्ति का संदेश देता है।

  • गणपति विसर्जन या अपमान? क्यों हो रहा है बप्पा के साथ ऐसा व्यवहार?

    गणपति विसर्जन या अपमान? क्यों हो रहा है बप्पा के साथ ऐसा व्यवहार?

    क्या आपने हाल ही में एक ऐसा वीडियो देखा, जिसमें गणपति बप्पा की मूर्तियों को JCB से कुचला जा रहा है? लोग उनके हाथ, पैर और सिर तोड़ रहे हैं… और फिर उसी पर नाच रहे हैं! यह दृश्य न केवल आस्था पर चोट करता है, बल्कि हमारी संस्कृति और सनातन परंपरा पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

    हर साल गणेशोत्सव में हम पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ बप्पा को अपने घर लाते हैं। दस दिन तक आरती, पूजा और भोग करते हैं। कहते हैं, गणपति बप्पा मोरया! लेकिन विसर्जन के बाद क्या होता है? क्या हमने कभी सोचा कि जिन भगवान को हम इतने सम्मान से बुलाते हैं, उनके साथ अंत में ऐसा बर्ताव क्यों?

    गणपति विसर्जन का असली उद्देश्य क्या था?

    गणपति विसर्जन का अर्थ भगवान को अपमानित करना नहीं, बल्कि उन्हें सम्मानपूर्वक जल में विसर्जित कर प्रकृति को सौंपना है।
    लेकिन आज क्या हो रहा है?

    • मूर्तियों को JCB से तोड़ा जा रहा है
    • उनके अंगों को क्षत-विक्षत कर मलबा बना दिया जाता है
    • श्रद्धा की जगह लापरवाही और असंवेदनशीलता हावी है

    क्या यही हमारी सनातन संस्कृति है?

    कौन हैं ये लोग? और क्यों चुप है समाज?

    क्यों कोई आवाज़ नहीं उठा रहा? क्या हमारी आस्था इतनी कमजोर हो गई है कि भगवान का अपमान भी हमें स्वीकार है?
    गणपति सिर्फ मूर्ति नहीं हैं — वे विघ्नहर्ता, बुद्धि और समृद्धि के देवता हैं।

    धर्म और आस्था का अपमान – सिर्फ पाप नहीं, अपराध है

    किसी भी धर्म में, किसी भी भगवान के साथ ऐसा व्यवहार अस्वीकार्य है। आज अगर गणपति हैं, कल किसी और देवता के साथ ऐसा हो सकता है।
    हमें यह समझना होगा कि भगवान का अपमान केवल धार्मिक अपराध नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पतन का संकेत है।

    समाज को संदेश

    यदि आप भी मानते हैं कि यह गलत है, तो इस संदेश को फैलाइए।
    गणपति का स्वागत आदर से हुआ, तो विदाई भी सम्मान और संस्कृति के अनुसार होनी चाहिए।
    अगर आप इसके खिलाफ नहीं बोलते, तो यह अपमान कल और बढ़ेगा।