September 3, 2026

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गोरखनाथ को क्यों चढ़ाई जाती है खिचड़ी, जानिये क्या है पूरी कहानी

मकर संक्राति से जुड़ी यूं तो कई कहानियां हैं। लेकिन गोरखपुर की गोरक्षनाथ पीठ की खिचड़ी का विशेष महत्व है। खिचड़ी का मेला शुरू  हो गया हैं । चरकी आ गई है । फेरी भी तैयार है । छुक छुक ट्रेन भी दौड़ रही है । और रोमाच से भर देने वाला मौत का कुआ भी आपका इंतजार कर रहा है । ये तस्वीर गोरखनाथ परिसर की है ।जहां मकर संक्रांति से सबसे बड़ा खिचड़ का मेला शुरू हो गया है….

खिचड़ी मेले की शुरुआत और पौराणिक मान्यता

मान्यता है कि खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा त्रेता युग से चली आ रही है। कहा जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत महायोगी गुरु गोरक्षनाथ ने की थी। मकर संक्रांति के दिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर तिल, गुड़ और अन्न का विशेष महत्व होता है। इसी दिन श्रद्धालु बाबा गोरक्षनाथ को खिचड़ी अर्पित करते हैं । और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यही वजह है कि यह मेला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और आध्यात्मिक विश्वास का प्रतीक है।

गोरखनाथ मंदिर परिसर में उत्सव का माहौल

गोरखनाथ मंदिर परिसर इन दिनों पूरी तरह मेले के रंग में रंगा हुआ है। चरखी आ चुकी है । फेरी तैयार है । छुक-छुक ट्रेन बच्चों को लुभा रही है । और रोमांच पसंद करने वालों के लिए मौत का कुआं भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। दूर-दराज से आए लोग न सिर्फ दर्शन के लिए पहुंचते हैं, बल्कि मेले की रौनक का आनंद भी लेते हैं। बच्चों की हंसी, दुकानों की चहल-पहल और लोकगीतों की गूंज पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देती है।

धार्मिक आस्था के साथ लोकसंस्कृति का संगम

खिचड़ी मेला इस मायने में भी खास है । कि यहां धार्मिक आस्था और लोकसंस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिलता है। मंदिर में श्रद्धालु सुबह से ही खिचड़ी चढ़ाने के लिए कतारों में खड़े नजर आते हैं । वहीं बाहर मेले में खिलौने, मिट्टी के बर्तन, लकड़ी के झूले, पारंपरिक मिठाइयां और स्थानीय व्यंजन लोगों को आकर्षित करते हैं। यह मेला ग्रामीण और शहरी संस्कृति को एक ही मंच पर जोड़ता है।

पूर्वांचल का सबसे बड़ा धार्मिक मेला

गोरखनाथ खिचड़ी मेला को पूर्वांचल का सबसे बड़ा धार्मिक मेला माना जाता है। उत्तर प्रदेश ही नहीं, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और नेपाल तक से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मकर संक्रांति के दिन से लेकर कई दिनों तक चलने वाला यह आयोजन गोरखपुर की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को भी गति देता है। स्थानीय व्यापारियों, कारीगरों और कलाकारों के लिए यह मेला आजीविका का बड़ा माध्यम बनता है।

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