NALSAR Row Supreme Court: कानून के छात्रों को नियंत्रित करने की BCI के पास शक्ति नहीं
NALSAR Row Supreme Court
NALSAR Row Supreme Court मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI के पास कानून के छात्रों के आचरण को नियंत्रित करने की वैधानिक शक्ति नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि छात्रों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई करना संबंधित शिक्षण संस्थान का विषय है। संस्थान अपने नियमों और विनियमों के अनुसार छात्रों के आचरण पर फैसला ले सकता है।
तीन सदस्यीय पीठ ने सुनाया अहम फैसला
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने हैदराबाद स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। NALSAR Row Supreme Court मामले में अदालत ने BCI की ओर से जारी दो अधिसूचनाओं को भी रद्द कर दिया। हालांकि, विवाद बढ़ने और व्यापक आलोचना के बाद BCI ने दोनों अधिसूचनाएं जारी होने के कुछ ही घंटों के भीतर वापस ले ली थीं।
मुख्य न्यायाधीश की यात्रा को लेकर शुरू हुआ था विवाद
यह विवाद नालसार के छात्रों द्वारा मुख्य न्यायाधीश की प्रस्तावित विश्वविद्यालय यात्रा और दीक्षांत समारोह में उनकी भागीदारी को लेकर जताई गई आपत्तियों से जुड़ा था। 14 अगस्त को BCI ने राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे नालसार के 2026 के स्नातकों का अधिवक्ता के रूप में नामांकन अगले आदेश तक न करें। यह कार्रवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की प्रस्तावित यात्रा के खिलाफ चलाए गए अभियान से जुड़े आरोपों को लेकर की गई थी।
छात्रों पर कार्रवाई का फैसला शिक्षण संस्थान करेगा
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि BCI छात्रों पर उस समय तक नियामक नियंत्रण नहीं रख सकती, जब तक वे अधिवक्ता नहीं बन जाते और कानूनी पेशे को नियंत्रित करने वाले वैधानिक ढांचे के दायरे में नहीं आ जाते। NALSAR Row Supreme Court के फैसले के अनुसार, छात्रों के आचरण को लेकर कार्रवाई करनी है या नहीं, इसका निर्णय संबंधित शिक्षण संस्थान अपने नियमों और विनियमों के तहत करेगा।
CJI ने BCI के हस्तक्षेप पर जताई थी नाराजगी
मामला जब सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था, तब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने BCI के हस्तक्षेप पर कड़ी नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा था कि यह छात्रों और उनके बीच बातचीत का विषय है और BCI का हस्तक्षेप पूरी तरह अनावश्यक है। इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि कानून के छात्रों पर नियामक नियंत्रण की सीमा क्या है और उनके आचरण से जुड़े मामलों में शिक्षण संस्थान की भूमिका महत्वपूर्ण है।
