भारत में दहेज प्रथा सिर्फ एक कुप्रथा नहीं, बल्कि एक ऐसा अभिशाप बन चुकी है जो बेटियों की ज़िंदगी को लील रही है। ग्रेटर नोएडा की 28 वर्षीय निक्की भाटी इस कुप्रथा की ताज़ा शिकार बनी। शादी के नौ साल तक उसने शारीरिक और मानसिक यातना सही, और अंत में उसे उसके ही पति और ससुराल वालों ने आग के हवाले कर दिया। यह कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि सालों से पालित दहेज की भूख और लालच का अंजाम था।
किरण बेदी का सख़्त बयान: ‘ये लोग शिक्षित भिखारी हैं’
इस दर्दनाक घटना पर पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सख्त शब्दों में कहा, “ये लोग इंसान नहीं, हैवान हैं। बेटे को संपत्ति समझा जाता है, बेटी को बोझ। ये सोच गंदी है — और घिनौनी।” दहेज के नाम पर पहले गाड़ी, जेवर और नक़द लिया गया, फिर भी मांग जारी रही — 36 लाख रुपये और एक लग्ज़री कार। जब परिवार ने यह नहीं दिया, तो उसकी कीमत निक्की की जान बन गई।
किरण बेदी ने दोषियों को फांसी की सज़ा देने की मांग की और समाज से भी सवाल पूछा — “क्यों नहीं किसी ने शिकायत की जब उसे सालों तक पीटा जा रहा था? क्यों चुप रहा समाज?” यह सवाल केवल निक्की के परिवार या उसके पड़ोसियों से नहीं, हम सब से है।
समाज की चुप्पी: सबसे बड़ा अपराध
हर दहेज हत्या में सिर्फ दोषी वही नहीं होते जो सीधा अत्याचार करते हैं, बल्कि वो भी जो चुप रहते हैं। पड़ोसी, रिश्तेदार, यहां तक कि कई बार मायका भी। डर, सामाजिक दबाव या शर्म के कारण आवाज़ दबा दी जाती है, और उसका नतीजा होता है — एक और बेटी की लाश। क्या निक्की आख़िरी होगी? या फिर अगली निक्की भी इसी अंधकार का शिकार बनेगी?
अब बदलाव की ज़रूरत: कानून, सज़ा और जागरूकता
दहेज हत्या को सिर्फ अपराध की श्रेणी में नहीं, हत्या के बराबर माना जाना चाहिए। कानून है, लेकिन उसका क्रियान्वयन तेज़ नहीं। सज़ा है, लेकिन उदाहरण बनने वाली सज़ा कम है। अब ज़रूरी है कठोर दंड और त्वरित न्याय। इसके साथ ही परिवारों को अपनी बेटियों को चुप रहने की नहीं, बोलने की शिक्षा देनी होगी। बेटियों को ‘बोझ’ नहीं, बराबरी का दर्जा देना होगा।
निक्की भाटी के नाम एक संदेश
निक्की अब नहीं रही। लेकिन उसकी कहानी हमारे सामने आई है एक चेतावनी की तरह। अगर हम आज भी चुप रहे, तो दोषी सिर्फ वो दरिंदे नहीं होंगे — हम भी होंगे। हमें आवाज़ उठानी होगी, बदलाव घरों से शुरू करना होगा। दहेज़ कोई परंपरा नहीं, यह एक अपराध है।

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