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  • RSS के शताब्दी समारोह की तैयारियां शुरू, अमित शाह ने स्वयंसेवक के रूप में जताया गर्व

    RSS के शताब्दी समारोह की तैयारियां शुरू, अमित शाह ने स्वयंसेवक के रूप में जताया गर्व

    नागपुर में शताब्दी समारोह की तैयारियां

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपने शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में भव्य आयोजन की तैयारियों में जुट गया है। महाराष्ट्र के नागपुर स्थित मुख्यालय में विजयादशमी के अवसर पर होने वाले इस विशेष कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की जा रही है। इस मौके पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। दलित समुदाय से आने वाले कोविंद को चीफ गेस्ट बनाकर आरएसएस ने समावेशिता और सामाजिक एकता का एक बड़ा संदेश दिया है। यह आयोजन न केवल आरएसएस के 100 वर्षों की गौरवशाली यात्रा को दर्शाएगा, बल्कि संगठन के मूल्यों और भारत के विकास में इसके योगदान को भी रेखांकित करेगा।

    बीजेपी और आरएसएस का मजबूत गठजोड़

    इस बीच, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने उपराष्ट्रपति पद के लिए आरएसएस से जुड़े सीपी राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। यह कदम बीजेपी और आरएसएस के बीच गहरे रिश्ते को और मजबूत करता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में केरल के कोच्चि में आयोजित एक कार्यक्रम में खुद को आरएसएस का स्वयंसेवक बताते हुए गर्व व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “मैं बीजेपी से आता हूं और आरएसएस का स्वयंसेवक हूं। जब तक भारत महान नहीं बन जाता, तब तक हमें आराम करने का अधिकार नहीं है।” शाह ने अपने संबोधन में भारत को विश्व में सम्मानित और समृद्ध राष्ट्र बनाने का सपना दोहराया, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प के अनुरूप है।

    केरल की एलडीएफ सरकार पर अमित शाह का निशाना

    मनोरमा न्यूज के कॉन्क्लेव में अमित शाह ने केरल की वामपंथी एलडीएफ सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अपने कैडर के लिए फंड खर्च कर रही है, जबकि केरल की जनता ऐसी सरकार चाहती है जो उनके लिए काम करे। शाह ने कहा कि केरल में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन कम्युनिस्ट विचारधारा के कारण विकास अवरुद्ध हो रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि आगामी विधानसभा चुनावों में केरल की जनता बदलाव और विकास के लिए मतदान करेगी। गौरतलब है कि केरल में अगले साल चुनाव होने हैं, और बीजेपी ने राज्य में संगठन को मजबूत करने के लिए राजीव चंद्रशेखर को जिम्मेदारी सौंपी है। साथ ही, कांग्रेस सांसद शशि थरूर के बीजेपी के करीब होने की चर्चाएं भी जोरों पर हैं।

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    भारत के विकास में आरएसएस की भूमिका

    अमित शाह ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि जब कभी भारत के विकास का इतिहास लिखा जाएगा, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 11 वर्षों के कार्यकाल का विशेष उल्लेख होगा। उन्होंने आरएसएस के स्वयंसेवकों और देशवासियों से अपील की कि वे भारत को विश्व में अग्रणी बनाने के लिए निरंतर प्रयास करें। आरएसएस का शताब्दी समारोह न केवल संगठन की उपलब्धियों का उत्सव है, बल्कि यह भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों को मजबूत करने का अवसर भी है। इस आयोजन के जरिए आरएसएस समाज के हर वर्ग को जोड़ने और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका को और सशक्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

    आगे की राह

    केरल के बाद अमित शाह तमिलनाडु का दौरा करने वाले हैं, जहां बीजेपी दक्षिण भारत में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश में है। आरएसएस के शताब्दी समारोह और बीजेपी की रणनीति से यह स्पष्ट है कि दोनों संगठन मिलकर भारत को एक समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह आयोजन और नेताओं के बयान देश में एक नए उत्साह और एकजुटता का संदेश दे रहे हैं।

  • केरल बीजेपी उपाध्यक्ष पर यौन उत्पीड़न का आरोप, संपत्ति विवाद की बात

    केरल बीजेपी उपाध्यक्ष पर यौन उत्पीड़न का आरोप, संपत्ति विवाद की बात

    सी कृष्णकुमार पर गंभीर आरोप

    केरल से एक सनसनीखेज खबर सामने आई है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) केरल के उपाध्यक्ष सी कृष्णकुमार पर यौन उत्पीड़न का गंभीर आरोप लगा है। शिकायतकर्ता कोई और नहीं, बल्कि उनकी साली है, जिसने दावा किया है कि कुछ साल पहले कृष्णकुमार ने उसका यौन शोषण किया। इस मामले ने केरल की राजनीति में हलचल मचा दी है। महिला ने बीजेपी के राष्ट्रीय और स्थानीय नेताओं को अपनी शिकायत सौंपी है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। दूसरी ओर, कृष्णकुमार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे संपत्ति विवाद का हिस्सा बताया है।

    महिला का दावा और शिकायत

    महिला ने अपनी शिकायत में कहा है कि उसने यह मामला बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर, आरएसएस दफ्तर में गोपालंकुट्टी मास्टर, और अन्य नेताओं जैसे वी. मुरलीधरन, एम.टी. रमेश और सुभाष के सामने उठाया था। उसका दावा है कि सभी ने उसे न्याय दिलाने का भरोसा दिया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। महिला ने यह भी कहा कि वह इन घटनाओं से अपमानित महसूस कर रही है। उसने बीजेपी से कृष्णकुमार को पार्टी से निष्कासित करने की मांग की है। उसका कहना है कि जिन कृष्णकुमार ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ यौन शोषण के आरोपों पर प्रदर्शन किया था, उन्हें अब खुद इन आरोपों का सामना करना पड़ रहा है।

    कृष्णकुमार का जवाब: संपत्ति विवाद है असली मुद्दा

    सी कृष्णकुमार ने इन आरोपों को पूरी तरह झूठा करार दिया है। उनका कहना है कि यह मामला संपत्ति के बंटवारे को लेकर है। उन्होंने बताया कि शिकायतकर्ता उनकी साली है, जिसने 2010 में दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी की थी। इससे उसके ससुर नाराज हो गए थे। 2014 में, जब उनके ससुर कोयंबटूर के अस्पताल में भर्ती थे, तब शिकायतकर्ता ने प्रॉपर्टी के कागजात चेक किए और पाया कि सारी संपत्ति उनकी पत्नी के नाम है। इससे वह नाराज हो गई और विवाद शुरू हो गया। कृष्णकुमार ने दावा किया कि महिला ने उनके और उनके परिवार के खिलाफ झूठे आरोप लगाए, जिन्हें कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

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    संदीप वारियर का तंज

    इस बीच, पूर्व बीजेपी नेता और अब केपीसीसी प्रवक्ता संदीप जी वारियर ने बीजेपी पर निशाना साधा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या बीजेपी अपने कोर कमेटी के सदस्य पर वही कार्रवाई करेगी, जो वह कांग्रेस के खिलाफ मांग रही थी। संदीप और कृष्णकुमार के बीच पहले से तनातनी रही है। बीजेपी से निष्कासित होने के बाद संदीप ने कांग्रेस का दामन थाम लिया था। कृष्णकुमार ने संकेत दिया कि इन आरोपों के पीछे संदीप का हाथ हो सकता है।

    राजनीतिक हलचल और भविष्य

    यह मामला केरल की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है। बीजेपी के लिए पलक्कड़ में मजबूत चेहरा रहे कृष्णकुमार की छवि को इस विवाद से ठेस पहुंच सकती है। दूसरी ओर, महिला का दावा और पार्टी की चुप्पी बीजेपी की साख पर सवाल उठा रही है। इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है, यह देखना बाकी है।

  • पीएम मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर की आरएसएस की तारीफ, मचा सियासी घमासान

    पीएम मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर की आरएसएस की तारीफ, मचा सियासी घमासान

    आरएसएस की तारीफ ने चौंकाया

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2025 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से अपने संबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की जमकर तारीफ की। उन्होंने आरएसएस को दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) बताया और कहा कि इसने देश के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पीएम ने अपने भाषण में कहा, “मैं गर्व से एक ऐसी संस्था का जिक्र करना चाहता हूं, जिसकी स्थापना को सौ साल पूरे हुए हैं। आरएसएस ने चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया और मातृभूमि के कल्याण के लिए स्वयंसेवकों ने अपना जीवन समर्पित किया।” यह पहली बार है जब किसी प्रधानमंत्री ने लाल किले से खुले तौर पर आरएसएस की प्रशंसा की है, जिसने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है।

    विपक्ष ने उठाए सवाल

    मोदी की इस टिप्पणी ने विपक्षी दलों में खलबली मचा दी। कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों ने इसे संविधान और धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ बताया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने तंज कसते हुए कहा, “पीएम मोदी की कुर्सी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की कृपा पर टिकी है। लाल किले से आरएसएस की तारीफ करके उन्होंने भागवत को खुश करने की कोशिश की है।” वहीं, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने एक्स पर लिखा, “अगर पीएम को आरएसएस की तारीफ करनी थी, तो वे नागपुर जाकर करते। लाल किले से यह तारीफ गलत परंपरा की शुरुआत है।” विपक्ष का कहना है कि यह बयान देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को कमजोर करता है।

    आरएसएस और बीजेपी का रिश्ता

    आरएसएस के वरिष्ठ नेता राम माधव ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “आरएसएस और बीजेपी एक वैचारिक परिवार के हिस्से हैं। बीजेपी राजनीतिक क्षेत्र में काम करती है, जबकि आरएसएस समाज में लोगों के बीच सेवा का कार्य करता है।” जब उनसे बीजेपी और आरएसएस के बीच मतभेद की अफवाहों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट किया, “दोनों संगठनों के बीच कोई मनमुटाव नहीं है। ऐसी चर्चाएं बेवजह छेड़ी जाती हैं।” पीएम मोदी स्वयं आरएसएस के स्वयंसेवक रहे हैं, और उनकी इस तारीफ ने संगठन में उत्साह का संचार किया है।

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    श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रद्धांजलि

    प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर में ‘एक राष्ट्र, एक संविधान’ का सपना देखा था, जिसे आर्टिकल 370 को हटाकर साकार किया गया। यह कदम उनकी सच्ची श्रद्धांजलि है। मुखर्जी ने विशेष दर्जे का विरोध किया था, जिसके कारण उन्हें जेल में डाल दिया गया था, जहां उनकी मृत्यु हो गई।

    आरएसएस का 100वां साल

    2025 में आरएसएस अपनी स्थापना का 100वां वर्ष मना रहा है। इस मौके पर पीएम की तारीफ को संगठन ने गर्व का क्षण बताया। आरएसएस ने देश के सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हालांकि, संगठन का इतिहास विवादों से भी भरा रहा है। इसे कई बार प्रतिबंध का सामना करना पड़ा, लेकिन यह देश के सबसे प्रभावशाली संगठनों में से एक बना हुआ है। पीएम के इस बयान ने आरएसएस के महत्व को राष्ट्रीय मंच पर और मजबूत किया है।

  • बिहार में मतदाता सत्यापन: SIR अभियान और राजनीतिक में हलचल

    बिहार में मतदाता सत्यापन: SIR अभियान और राजनीतिक में हलचल

    SIR अभियान से गरमाई सियासत

    बिहार में चुनाव आयोग के मतदाता सत्यापन अभियान (SIR) की शुरुआत के बाद देश की सियासत में उबाल आ गया है। इस अभियान ने न केवल राजनीतिक दलों के बीच तनाव बढ़ाया, बल्कि संसद को भी 15 दिनों तक ठप कर दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मतदाता सूची में धांधली का गंभीर आरोप लगाकर इस मुद्दे को और हवा दी। कांग्रेस इसे ‘वोट चोरी का घोटाला’ करार दे रही है, जिसमें निशाने पर चुनाव आयोग और बीजेपी की मोदी सरकार है। विपक्ष ‘लोकतंत्र खतरे में है’ के नारे के साथ इस मुद्दे को जन आंदोलन का रूप देना चाहता है। कांग्रेस का दावा है कि यह विरोध 1975 के जेपी आंदोलन से भी बड़ा होगा।

    भ्रष्टाचार का पुराना दांव

    भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार का मुद्दा हमेशा से सत्ता परिवर्तन का कारण रहा है। 1989 में वीपी सिंह ने बोफोर्स घोटाले को उठाकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया था। उनकी रणनीति थी कि जनसभाओं में बोफोर्स से जुड़े कथित नामों वाली पर्ची दिखाकर जनता का समर्थन हासिल किया जाए। इस रणनीति ने कांग्रेस को 404 से 197 सीटों पर ला पटका। 2019 में राहुल गांधी ने राफेल घोटाले का मुद्दा उठाया, लेकिन यह दांव असफल रहा और बीजेपी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। 2024 में कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के साथ जातीय राजनीति का तड़का लगाया, जिससे उनकी सीटें 100 तक पहुंचीं, लेकिन बीजेपी को सत्ता से रोकने में वे पूरी तरह कामयाब नहीं हुए।

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    जाति और भ्रष्टाचार का कॉकटेल

    1990 के दशक में मंडल कमीशन और जातीय राजनीति ने भारतीय सियासत को नया रंग दिया। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर के बावजूद कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। नरसिम्हा राव की सरकार बनी, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों ने उसे भी घेर लिया। 1996 में कांग्रेस की सीटें घटकर 140 रह गईं। इसके बाद 2004 और 2009 में यूपीए की सरकार बनी, जब भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। लेकिन 2014 में घोटालों से घिरी यूपीए सरकार की हार ने साबित किया कि जनता भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील है।

    लोकतंत्र और संविधान का नया नैरेटिव

    2024 में अंबानी-अडाणी जैसे मुद्दों के असफल होने के बाद राहुल गांधी ने ‘लोकतंत्र और संविधान खतरे में’ का नारा अपनाया। उनका आरोप है कि बीजेपी, चुनाव आयोग की मदद से मतदाता सूची में हेरफेर कर रही है। इस मुद्दे को कांग्रेस आरजेडी, टीएमसी, और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर बड़ा आंदोलन बनाना चाहती है। विपक्ष को उम्मीद है कि यह नैरेटिव जनता को जोड़ेगा और बीजेपी की एंटी-इनकंबेंसी उनके पक्ष में काम करेगी।

    क्या 1975 जैसा माहौल बनेगा?

    विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र और संविधान का मुद्दा बीजेपी को परेशान कर सकता है, लेकिन 1975 जैसा आंदोलन खड़ा करना आसान नहीं। उस समय महंगाई और बेरोजगारी ने जनता को आंदोलन के लिए प्रेरित किया था। आज बीजेपी की मजबूत आईटी सेल और गठबंधन सहयोगी इस मुद्दे को कमजोर कर सकते हैं। बिहार के आगामी चुनाव इस रणनीति का असली इम्तिहान होंगे।

  • पीएम मोदी का वाराणसी दौरा: सपा-कांग्रेस पर साधा निशाना

    पीएम मोदी का वाराणसी दौरा: सपा-कांग्रेस पर साधा निशाना

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को वाराणसी में समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने बिना नाम लिए सपा नेता अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए ऑपरेशन महादेव की टाइमिंग पर उठाए गए सवालों का जवाब दिया। साथ ही, 2200 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया और किसानों के लिए कई योजनाओं की जानकारी दी।

    सपा पर पीएम का तीखा हमला

    प्रधानमंत्री ने ऑपरेशन महादेव का जिक्र करते हुए कहा कि सेना ने पहलगाम आतंकी हमले के तीन आतंकियों को मार गिराया। सपा के सवालों पर तंज कसते हुए मोदी ने कहा, “क्या मुझे सपा नेताओं को फोन कर पूछना चाहिए था? सेना लगातार जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ अभियान चला रही थी। मौका मिलते ही आतंकियों को ढेर किया गया।” उन्होंने सपा पर आतंकियों के खिलाफ नरम रवैया अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि सपा शासित यूपी में आतंकियों पर मुकदमे वापस लिए जाते थे।

    2200 करोड़ की परियोजनाओं का तोहफा

    मोदी ने वाराणसी में 2200 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। साथ ही, देशभर के 10 करोड़ किसानों के खातों में पीएम किसान सम्मान निधि की राशि हस्तांतरित की। उन्होंने कहा कि यूपी के ढाई करोड़ किसानों को 90 हजार करोड़ रुपये से अधिक का लाभ मिला, जिसमें काशी के किसानों को 900 करोड़ रुपये मिले।

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    किसान सम्मान निधि पर सपा-कांग्रेस की अफवाहें

    मोदी ने सपा और कांग्रेस पर किसान सम्मान निधि को लेकर अफवाहें फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “2019 में जब यह योजना शुरू हुई, तब सपा-कांग्रेस ने लोगों को गुमराह किया। लेकिन आज तक पौने चार लाख करोड़ रुपये किसानों के खातों में पहुंच चुके हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा कि यह राशि बिना किसी कटौती के सीधे किसानों तक पहुंची।

    प्रधानमंत्री धनधान्य कृषि योजना

    मोदी ने नई योजना ‘प्रधानमंत्री धनधान्य कृषि योजना’ की घोषणा की, जिसके तहत 24 हजार करोड़ रुपये किसानों के कल्याण और कृषि विकास पर खर्च होंगे। इस योजना का फोकस उन जिलों पर होगा जहां कृषि उत्पादन कम है। यूपी के लाखों किसानों को इसका लाभ मिलेगा।

    बीज से बाजार तक किसानों के साथ

    प्रधानमंत्री ने कहा कि एनडीए सरकार किसानों की भलाई के लिए प्रतिबद्ध है। पीएम फसल बीमा योजना के तहत अब तक पौने दो लाख करोड़ रुपये का क्लेम दिया जा चुका है। साथ ही, फसलों की एमएसपी में रिकॉर्ड वृद्धि की गई है। सरकार गोदाम निर्माण और महिलाओं की कृषि में भागीदारी बढ़ाने पर भी ध्यान दे रही है।

    जनधन खातों का केवाईसी अपडेट

    मोदी ने जनधन योजना के 55 करोड़ खातों के केवाईसी अपडेट की जानकारी दी। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे बैंक कैंप में जाकर अपने खातों का केवाईसी करवाएं ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता रहे।

    स्वदेशी को अपनाने की अपील

    मोदी ने ‘वोकल फॉर लोकल’ मंत्र को दोहराते हुए स्वदेशी सामान खरीदने की अपील की। उन्होंने कहा, “दुनिया अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। हमें स्वदेशी माल खरीदकर और बेचकर देश को मजबूत करना होगा।”

  • कांग्रेस का केंद्र सरकार पर हमला: ट्रंप के दावों पर विवाद

    कांग्रेस का केंद्र सरकार पर हमला: ट्रंप के दावों पर विवाद

    कांग्रेस ने एक बार फिर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। यह हमला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत-पाकिस्तान के बीच कथित संघर्ष विराम के दावों के बाद सामने आया है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने ट्रंप के बयानों को लेकर केंद्र सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए और पीएम मोदी की नीतियों पर निशाना साधा। खेड़ा ने ट्रंप की तुलना एक ऐसे सांप से की, जो पीएम मोदी के चारों ओर लिपटा हुआ है और कड़वी सच्चाई फुसफुसा रहा है।

    पवन खेड़ा ने कहा कि राहुल गांधी ने पीएम मोदी को इस विवाद से बाहर निकलने का एक सुनहरा अवसर दिया था। उन्होंने सुझाव दिया था कि मोदी को ट्रंप के दावों को स्पष्ट रूप से झूठा बताना चाहिए। लेकिन, खेड़ा के अनुसार, पीएम मोदी ने जानबूझकर इस सलाह को नजरअंदाज किया, जिसके कारण ट्रंप के बयानों को और बल मिला। खेड़ा ने तंज कसते हुए कहा, “मोदी को राहुल गांधी की सलाह मानने से एलर्जी है। और अब सांप फिर लौट आया है, पहले से कहीं ज्यादा लिपटकर।”

    ट्रंप का टैरिफ का दावा

    पवन खेड़ा का यह बयान ट्रंप के उस हालिया बयान के जवाब में आया है, जिसमें उन्होंने भारत पर 20 से 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की बात कही। ट्रंप ने दावा किया कि भारत-अमेरिका व्यापार सौदा अच्छा चल रहा है, लेकिन भारत ने अमेरिका पर अन्य देशों की तुलना में ज्यादा टैरिफ लगाए हैं। ट्रंप ने कहा, “भारत एक अच्छा दोस्त है, लेकिन अब मैं राष्ट्रपति हूं, और आप ऐसा नहीं कर सकते।” इस बयान ने भारत-अमेरिका संबंधों पर नई बहस छेड़ दी है।

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    राहुल गांधी की लोकसभा में मांग

    कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा के दौरान इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने पीएम मोदी से ट्रंप के दावों को सार्वजनिक रूप से खारिज करने की मांग की। राहुल ने कहा, “ट्रंप ने 29 बार भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम का दावा किया है। पीएम मोदी को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या ट्रंप के ये बयान सही हैं या गलत।” राहुल गांधी का यह बयान केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश थी।

    भारत सरकार का स्पष्टीकरण

    भारत सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम में किसी तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं थी। सरकार के मुताबिक, यह अपील सीधे पाकिस्तान की ओर से की गई थी। इसके बावजूद, ट्रंप बार-बार यह दावा करते रहे हैं कि उन्होंने इस संघर्ष विराम में मध्यस्थता की। कांग्रेस ने इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश की है और सरकार की चुप्पी को कमजोरी के रूप में पेश किया है।

  • तेजस्वी यादव पर BJP का हमला: वक्फ कानून की आड़ में ‘नमाजवाद’ का आरोप

    तेजस्वी यादव पर BJP का हमला: वक्फ कानून की आड़ में ‘नमाजवाद’ का आरोप

    बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले वक्फ अधिनियम को लेकर सियासत तेज हो गई है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव द्वारा वक्फ कानून को “कूड़ेदान में फेंकने” की घोषणा पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कड़ा हमला बोला है। भाजपा ने इस बयान को न सिर्फ असंवैधानिक बताया बल्कि इसे ‘नमाजवाद’ की राजनीति करार दिया है।

    भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने पटना में पत्रकारों से बातचीत के दौरान विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन पर आरोप लगाया कि वह ‘समाजवाद’ की आड़ में ‘नमाजवाद’ को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि संविधान को ‘शरिया की स्क्रिप्ट’ में बदलने का प्रयास हो रहा है, जो खतरनाक और विभाजनकारी राजनीति की ओर इशारा करता है।

    ‘वक्फ बचाओ, संविधान बचाओ’ या ‘शरिया लाओ’?

    गौरतलब है कि तेजस्वी यादव ने हाल ही में पटना के गांधी मैदान में ‘वक्फ बचाओ, संविधान बचाओ’ रैली को संबोधित करते हुए वादा किया था कि अगर विपक्षी गठबंधन सत्ता में आता है तो वह केंद्र सरकार द्वारा संशोधित वक्फ अधिनियम को रद्द कर देगा। इसी बयान को लेकर भाजपा ने उन्हें घेरा और आरोप लगाया कि विपक्ष संविधान की नहीं, बल्कि शरीया कानून की पैरवी कर रहा है।

    भाजपा प्रवक्ता त्रिवेदी ने आरोप लगाया कि यह रैली संविधान के नाम पर शरिया कानून को बढ़ावा देने की कोशिश थी। उन्होंने कहा कि वक्फ की संपत्तियों का वास्तविक लाभ मुस्लिम समुदाय तक नहीं पहुंच रहा, बल्कि यह कुछ स्वयंभू धार्मिक नेताओं के हाथों में केंद्रित हो गई हैं। यह समाजवाद नहीं बल्कि ‘नमाजवाद’ है, जिसका उद्देश्य वोट बैंक की राजनीति करना है।

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    ‘संविधान से नहीं चलने देंगे शरीया’

    भाजपा नेता ने यह भी कहा कि कांग्रेस, राजद और वाम दलों के गठबंधन की असली मंशा संविधान को कमजोर कर शरीया कानून को लाना है। उन्होंने दावा किया कि इन दलों के नेता भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र से इस्लामी कानून की ओर धकेलना चाहते हैं, जो कि न सिर्फ संविधान विरोधी है बल्कि देश की एकता के लिए भी घातक है।

    बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने भी सोशल मीडिया पर इस रैली पर निशाना साधते हुए कहा, “बिहार संविधान से चलेगा, शरीयत से नहीं।” उन्होंने तेजस्वी यादव पर सवाल उठाया कि क्या वे बिहार को बाबा साहब आंबेडकर के संविधान से नहीं बल्कि शरीया से चलाना चाहते हैं।

  • खरगे ने PM से की मांग: जल्द हो लोकसभा उपाध्यक्ष का चुनाव

    खरगे ने PM से की मांग: जल्द हो लोकसभा उपाध्यक्ष का चुनाव

    कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर लोकसभा उपाध्यक्ष (डिप्टी स्पीकर) के रिक्त पद को जल्द भरने की मांग की है। खरगे ने इस बात पर चिंता जताई कि यह महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पिछले दो लोकसभा कार्यकालों (17वीं और 18वीं) से खाली है, जो भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान के प्रावधानों के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संविधान के अनुच्छेद 93 के तहत डिप्टी स्पीकर का चुनाव अनिवार्य है, और इसकी अनदेखी लोकतंत्र के मूल्यों को कमजोर करती है।

    विपक्षी दल से उपाध्यक्ष चुनने की परंपरा

    खरगे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने पत्र का हवाला देते हुए लिखा, “पहली से 16वीं लोकसभा तक हर बार डिप्टी स्पीकर का चुनाव किया गया। परंपरागत रूप से यह पद मुख्य विपक्षी दल के सदस्य को दिया जाता रहा है।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 17वीं लोकसभा (2014-2019) में डिप्टी स्पीकर का चुनाव नहीं हुआ, और यह गलत परंपरा 18वीं लोकसभा में भी जारी है। खरगे ने कहा कि यह स्थिति संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है और इसे तत्काल ठीक करने की आवश्यकता है। आखिरी बार 16वीं लोकसभा में AIADMK के नेता एम थंबी दुरई को डिप्टी स्पीकर चुना गया था।

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    संवैधानिक प्रावधान और डिप्टी स्पीकर की भूमिका

    खरगे ने अपने पत्र में संविधान के अनुच्छेद 93 का उल्लेख किया, जो स्पष्ट रूप से कहता है कि लोकसभा को “जितनी जल्दी हो सके” स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का चुनाव करना होगा। डिप्टी स्पीकर लोकसभा में स्पीकर के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पीठासीन अधिकारी होता है। उनकी मुख्य जिम्मेदारी स्पीकर की अनुपस्थिति में सदन की कार्यवाही का संचालन करना है। इस दौरान उनके पास स्पीकर के समान अधिकार होते हैं, जिसमें व्यवस्था बनाए रखना, बहसों का संचालन करना और नियमों से संबंधित निर्णय लेना शामिल है। खरगे ने कहा कि परंपरागत रूप से डिप्टी स्पीकर का चुनाव लोकसभा के दूसरे या तीसरे सत्र में होता है, और इसकी तारीख स्पीकर द्वारा तय की जाती है।

    डिप्टी स्पीकर की निष्पक्षता जरूरी

    लोकसभा का डिप्टी स्पीकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है, जिसके लिए निष्पक्षता अनिवार्य है। भले ही डिप्टी स्पीकर किसी राजनीतिक दल से चुना जाए, उसे गैर-पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करना होता है। यह पद सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है। खरगे ने इस बात पर जोर दिया कि डिप्टी स्पीकर का पद खाली रहना न केवल परंपराओं के खिलाफ है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों को भी कमजोर करता है।

    खरगे की मांग और भविष्य

    खरगे ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लें और जल्द से जल्द डिप्टी स्पीकर का चुनाव कराएं। उन्होंने कहा कि यह न केवल संवैधानिक आवश्यकता है, बल्कि यह विपक्ष के प्रति सम्मान और लोकतांत्रिक परंपराओं को बनाए रखने का प्रतीक भी है। 2019 के बाद से यह पद खाली है, और 18वीं लोकसभा के गठन के बाद भी इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है। खरगे की यह मांग राजनीतिक और संवैधानिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।

  • वक्फ संशोधन एक्ट के खिलाफ हैदराबाद में बड़ा प्रदर्शन: कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का तीखा बयान

    वक्फ संशोधन एक्ट के खिलाफ हैदराबाद में बड़ा प्रदर्शन: कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का तीखा बयान

    वक्फ संशोधन एक्ट को लेकर देशभर में चल रही बहस अब सड़क पर आ चुकी है। हैदराबाद में इस कानून के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन देखने को मिला, जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। इस प्रदर्शन में विशेष रूप से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद इमरान मसूद की उपस्थिति और उनका सख्त बयान सुर्खियों में है।

    क्या है वक्फ संशोधन एक्ट?

    वक्फ एक्ट, 1995 को केंद्र सरकार संशोधित करने की तैयारी में है। बताया जा रहा है कि संशोधन के ज़रिये वक्फ बोर्ड की संपत्तियों और शक्तियों की समीक्षा की जाएगी, और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि वक्फ की संपत्तियों का उपयोग पारदर्शी और न्यायसंगत तरीके से हो।

    लेकिन विपक्षी पार्टियों और मुस्लिम संगठनों का कहना है कि यह संशोधन मुस्लिम समुदाय के अधिकारों में कटौती और वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण पाने की एक सोची-समझी साजिश है।

    हैदराबाद में उमड़ा विरोध का सैलाब

    हैदराबाद में हुए विरोध प्रदर्शन में बड़ी संख्या में मुस्लिम संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था –
    “हमारे वक्फ की हिफाजत करो”, “हम संविधान के साथ हैं”, “वोट से चुनी सरकार, हक नहीं छीन सकती”।

    प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन जनसमूह का जोश और नाराज़गी साफ़ देखी जा सकती थी।

    इमरान मसूद का तीखा हमला

    इस प्रदर्शन में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने जिस अंदाज़ में सरकार पर हमला बोला, वह अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने कहा:

    “यह कानून मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश है। संविधान ने जो हक हमें दिए, उन पर अब बुलडोजर चलाया जा रहा है।”

    उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इस कानून के जरिए सिर्फ वक्फ संपत्तियों पर कब्जा करना चाहती है।

    “यह बिल केवल एक ‘लैंड ग्रैब पॉलिसी’ है। इसमें कहीं भी पसमांदा मुसलमानों, महिलाओं या अनाथ बच्चों के कल्याण की कोई बात नहीं की गई है।” – इमरान मसूद

    उन्होंने तेलंगाना के मुख्यमंत्री से अपील की कि वे राज्य में इस कानून को लागू न करें और इस पर राज्यसभा में विरोध दर्ज कराएं।

    भाजपा की प्रतिक्रिया

    बीजेपी ने इमरान मसूद के बयानों को “भ्रामक और भड़काऊ” बताया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि वक्फ एक्ट का संशोधन किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि सिस्टम को पारदर्शी बनाने के लिए है। भाजपा प्रवक्ताओं ने कहा कि कई मामलों में वक्फ बोर्ड पर मनमानी और संपत्तियों के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं, जिन्हें रोकना सरकार की ज़िम्मेदारी है।

    उत्तर भारत में भी बढ़ता असर

    हालांकि विरोध प्रदर्शन हैदराबाद में हुआ, लेकिन इसकी गूंज अब उत्तर भारत तक पहुंच रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली और हरियाणा के मुस्लिम इलाकों में इस मुद्दे पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई जगहों पर छोटे-छोटे संगठन लोकल मीटिंग्स और जागरूकता अभियान चला रहे हैं।

    कुछ धार्मिक और सामाजिक संगठन भी इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों से रुख साफ़ करने की मांग कर रहे हैं। खासकर पसमांदा समाज से जुड़े मुस्लिम समुदाय में यह सवाल उठ रहा है कि अगर वक्फ बोर्ड का पैसा और संपत्ति उनके कल्याण पर खर्च नहीं हो रही, तो फिर इसका फायदा किसे हो रहा है?

    वक्फ संशोधन एक्ट को लेकर जो विरोध और बयानबाज़ी शुरू हुई है, वह यह दर्शाती है कि मामला केवल कानून का नहीं, बल्कि आस्था, हक और पहचान से जुड़ा है। इमरान मसूद जैसे नेताओं के तीखे बयानों से यह साफ़ है कि कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भुनाने की तैयारी में है, जबकि भाजपा इसे सुधार और पारदर्शिता की दिशा में एक कदम बता रही है।

    अब देखना होगा कि क्या केंद्र सरकार इस मसले पर मौलिक बदलावों के साथ आगे बढ़ती है, या फिर विरोध के दबाव में आकर कुछ संशोधन करती है। फिलहाल इतना तो तय है कि वक्फ एक्ट की यह लड़ाई सियासत का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

  • वक्फ कानून पर सियासी जंग: ओवैसी का विरोध, योगी का पलटवार

    वक्फ कानून पर सियासी जंग: ओवैसी का विरोध, योगी का पलटवार

    देशभर में वक्फ कानून को लेकर राजनीतिक घमासान तेज, असदुद्दीन ओवैसी और योगी आदित्यनाथ आमने-सामने

    देश में एक बार फिर वक्फ कानून (Waqf Act) को लेकर सियासत गरमा गई है। इस बार मामला सिर्फ किसी कानूनी पेचीदगी का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर राजनीतिक और धार्मिक टकराव का रूप ले चुका है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने वक्फ कानून में संशोधन की कोशिशों को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला है और इसे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ साजिश करार दिया है। वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पलटवार करते हुए कहा है कि वक्फ की आड़ में ग़रीब मुसलमानों का शोषण हो रहा है और सरकार का उद्देश्य उनके अधिकारों की रक्षा करना है।

    वक्फ कानून पर देशभर में विवाद क्यों?

    वक्फ एक्ट, 1995 के तहत मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और परोपकारी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड के अधीन लाया जाता है। हाल के वर्षों में कई राज्यों में वक्फ बोर्ड द्वारा सरकारी और निजी संपत्तियों पर दावा करने की घटनाएं सामने आई हैं। इससे हिंदू संगठनों, किसानों और सामान्य नागरिकों में नाराज़गी बढ़ी है।

    अब जब भाजपा सरकार वक्फ कानून में संशोधन या समीक्षा की बात कर रही है, तो यह मुद्दा पूरी तरह से राजनीतिक मैदान का केंद्र बन गया है।

    ओवैसी का सरकार पर सीधा हमला

    AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने वक्फ एक्ट पर केंद्र सरकार के रुख को “मुसलमानों के अधिकार छीनने की साज़िश” बताया है। उन्होंने कहा:

    “वक्फ की संपत्तियां मुस्लिम समाज की धरोहर हैं। अगर सरकार इन्हें छीनने या नियंत्रण में लेने की कोशिश करती है, तो हम सड़क से संसद तक विरोध करेंगे।”

    ओवैसी का दावा है कि सरकार का असली उद्देश्य वक्फ संपत्तियों को राजनीतिक लाभ के लिए हड़पना है। उन्होंने इसे “सांप्रदायिक एजेंडा” करार दिया और कहा कि मुस्लिम समुदाय को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।

    योगी आदित्यनाथ का पलटवार

    ओवैसी के आरोपों पर पलटवार करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि

    “वक्फ कानून का अब तक दुरुपयोग होता रहा है। ग़रीब मुसलमानों की ज़मीनों और संपत्तियों पर कुछ गिने-चुने लोग कब्जा कर लेते हैं और फिर वक्फ के नाम पर चलाने का दावा करते हैं। यह न्याय नहीं, अन्याय है।”

    योगी ने आगे कहा कि वक्फ बोर्ड को पारदर्शिता और जवाबदेही के दायरे में लाना जरूरी है, ताकि कोई भी मजहब के नाम पर संपत्ति हड़पने का खेल न खेल सके। उन्होंने यह भी कहा कि वक्फ संपत्तियों का लाभ वास्तव में गरीब मुसलमानों तक पहुंचे, इसके लिए सरकार गंभीरता से काम कर रही है।

    विपक्ष में मतभेद

    जहां एक ओर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी वक्फ कानून में बदलाव को राजनीतिक स्टंट बता रही हैं, वहीं अंदरूनी रूप से पार्टी के कई नेता मानते हैं कि कानून में सुधार की ज़रूरत है। खासकर उत्तर भारत के कुछ कांग्रेस नेताओं ने गुपचुप तरीके से वक्फ बोर्ड की शक्तियों पर सवाल उठाए हैं।

    जनता का मूड क्या कहता है?

    उत्तर भारत के कई हिस्सों में आम जनता के बीच वक्फ बोर्ड की भूमिका को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं। कुछ मुस्लिम समाज के लोग मानते हैं कि वक्फ बोर्ड की संपत्तियां वास्तव में उनकी हिफाजत करती हैं, जबकि दूसरी ओर कई ऐसे मामले हैं जिनमें वक्फ बोर्ड पर ज़मीन कब्जाने या मनमानी करने के आरोप लगे हैं।

    कई ग्रामीण इलाकों में किसानों का आरोप है कि वक्फ बोर्ड ने ऐसी ज़मीनों पर दावा किया है, जो पीढ़ियों से उनके पास हैं।

    वक्फ एक्ट अब सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न बन गया है। ओवैसी जैसे नेता जहां इसे धार्मिक अस्तित्व से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं योगी आदित्यनाथ इसे गरीब मुसलमानों के अधिकारों और पारदर्शिता का मामला बता रहे हैं।