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  • सुप्रीम कोर्ट में चौंकाने वाला हमला  71 वर्षीय वकील ने CJI बी.आर. गवई पर जूता फेंका

    सुप्रीम कोर्ट में चौंकाने वाला हमला 71 वर्षीय वकील ने CJI बी.आर. गवई पर जूता फेंका

    भारत की सुप्रीम कोर्ट जहाँ हर शब्द और हर बहस कानून के इतिहास में दर्ज होती है, वहाँ सोमवार को कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे देश को हिला दिया। कोर्ट नंबर 1 में कार्यवाही अचानक हंगामेदार हो गई, जब वरिष्ठ वकील राकेश किशोर ने मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर जूता फेंक दिया। हाँ, आपने सही सुना। कोर्ट के अंदर देश के सबसे बड़े जज पर जूता फेंकने की कोशिश हुई। शुक्र है कि उन्हें कोई चोट नहीं आई, लेकिन यह घटना भारतीय न्यायपालिका के इतिहास पर काला धब्बा बन गई।

    घटना की पृष्ठभूमि

    71 वर्षीय वकील राकेश किशोर ने जूता फेंकते हुए चिल्लाया कि “भारत सनातन धर्म का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा।” मामला उस सुनवाई से जुड़ा था जिसमें मध्य प्रदेश के खजुराहो परिसर की क्षतिग्रस्त विष्णु प्रतिमा पर टिप्पणी को लेकर विवाद हुआ था। कुछ हफ्ते पहले CJI गवई की उस टिप्पणी ने कई कानूनी विशेषज्ञों और नागरिकों के बीच बहस छेड़ दी थी।

    सुरक्षा और वकील की गिरफ्तारी

    सुरक्षा ने तुरंत राकेश किशोर को पकड़ लिया। उनके पास सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन, शाहदरा बार एसोसिएशन और दिल्ली बार काउंसिल के सदस्यता कार्ड बरामद हुए। उन्हें हिरासत में लिया गया, लेकिन बाद में छोड़ दिया गया। हालांकि, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस घटना की गंभीरता को देखते हुए इंटरिम सस्पेंशन का आदेश जारी किया। अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने इसे अदालत की गरिमा और कानून का उल्लंघन बताया।

    देश और न्यायपालिका पर असर

    इस घटना ने देशभर में बहस को तेज़ कर दिया। सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसी घटनाएँ लोकतंत्र की मर्यादा को चोट पहुँचा रही हैं? क्या गुस्सा और आस्था कानून के दायरे से ऊपर हो सकती हैं? न्यायपालिका की सुरक्षा और सम्मान पर यह घटना गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

    मुख्य न्यायाधीश का बयान

    मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने बड़े सधे अंदाज़ में कहा कि मैं ऐसी घटनाओं से प्रभावित होने वाला आखिरी व्यक्ति हूँ।” उनका यह बयान अदालत की गरिमा और आत्म-नियंत्रण की भावना को दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट की गरिमा पर हमला, चाहे असफल ही क्यों न हो, लोकतंत्र की नींव और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि कानून का पालन और न्यायपालिका का सम्मान हर नागरिक का कर्तव्य है। देशभर में न्यायपालिका की सुरक्षा और सम्मान पर चर्चा अब और भी तेज़ हो गई है।

  • सुप्रीम कोर्ट में चौंकाने वाला हमला 71 वर्षीय वकील ने चीफ जस्टिस बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश

    सुप्रीम कोर्ट में चौंकाने वाला हमला 71 वर्षीय वकील ने चीफ जस्टिस बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश

    देश की सर्वोच्च अदालत में आज एक चौंकाने वाली घटना हुई। 71 साल के वकील राकेश कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश की। हालांकि यह हमला असफल रहा और किसी को चोट नहीं लगी, लेकिन यह खबर तुरंत पूरे देश की सुर्खियों में आ गई। इस घटना ने न केवल न्यायपालिका बल्कि आम जनता के बीच भी गहरी चिंता और हैरानी पैदा कर दी है।

    आरोपी वकील की गिरफ्तारी और रिहाई

    घटना के तुरंत बाद राकेश कुमार को हिरासत में लिया गया। पुलिस ने उनका विवरण दर्ज किया और सुरक्षा जांच की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने किसी भी कानूनी कार्रवाई से इनकार कर दिया और आरोपी को रिहा कर दिया। इस फैसले ने कई लोगों में सवाल खड़े कर दिए कि आखिर ऐसा क्यों किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट के अंदर नियम और प्रक्रियाएं कितनी संवेदनशील और जटिल हैं।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया

    इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीजेआई बी.आर. गवई से फोन पर बात की और उन्हें इस हमले के विषय में आश्वस्त किया। इसके अलावा, पीएम मोदी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा, “आज सुबह सुप्रीम कोर्ट परिसर में हुए हमले से हर भारतीय में गुस्सा है। हमारे समाज में ऐसे निंदनीय कृत्यों के लिए कोई जगह नहीं है।” यह स्पष्ट संदेश है कि देश के शीर्ष नेतृत्व के लिए न्यायपालिका की सुरक्षा और सम्मान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    देशभर की प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया पर हलचल

    देशभर के लोग इस घटना पर गुस्सा जता रहे हैं। सोशल मीडिया पर #SupremeCourtAttack तेजी से ट्रेंड कर रहा है। हर कोई चीफ जस्टिस की सुरक्षा और न्यायपालिका के सम्मान की बात कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना हमें यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र में कानून और सम्मान का पालन करना हर नागरिक का कर्तव्य है। कई कानूनी विशेषज्ञ इस घटना की गंभीरता पर चर्चा कर रहे हैं और भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के उपायों पर सुझाव दे रहे हैं।

    सुप्रीम कोर्ट और लोकतंत्र की सुरक्षा

    सुप्रीम कोर्ट हमारे लोकतंत्र की रीढ़ है। वहां पर हमले की कोई जगह नहीं है। यह घटना हमें यह भी याद दिलाती है कि कानून और न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना न केवल अधिकारियों का बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। न्यायपालिका की सुरक्षा केवल नियमों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि समाज में इसे सम्मान और जागरूकता के साथ देखा जाना चाहिए।

  • ठग सुकेश चंद्रशेखर मामला सुप्रीम कोर्ट ने जैकलीन फर्नांडिस की याचिका खारिज की

    ठग सुकेश चंद्रशेखर मामला सुप्रीम कोर्ट ने जैकलीन फर्नांडिस की याचिका खारिज की

    ठग सुकेश चंद्रशेखर से जुड़े मामले में बॉलीवुड अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडिस की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। जैकलीन की याचिका में 200 करोड़ रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग मामले को रद्द करने की मांग की गई थी।

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा कि अभी आरोप ट्रायल से पहले खारिज नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी, तो जैकलीन भविष्य में फिर से याचिका दायर कर सकती हैं। जैकलीन की तरफ से सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि उन्हें सुकेश से तोहफे लेते समय सावधानी बरतनी चाहिए थी। जस्टिस दत्ता ने स्पष्ट किया कि अगर दोस्त किसी अपराध में शामिल निकला तो मामला मुश्किल हो जाता है

    दिल्ली हाई कोर्ट का रुख

    दिल्ली हाई कोर्ट ने 3 जुलाई को भी जैकलीन की इसी तरह की याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने कहा कि यह निर्णय सिर्फ ट्रायल के दौरान ही हो सकता है। इससे साफ है कि जैकलीन की याचिका पर न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है और कोर्ट ने किसी तरह का अपराध साबित नहीं माना।

    सोशल मीडिया और तोहफों का विवाद

    जैकलीन तब विवादों में आईं जब उनकी और सुकेश चंद्रशेखर की रोमांटिक तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं। जांच में सामने आया कि सुकेश ने खुद को बिजनेसमैन बताया और जैकलीन को कई महंगे तोहफे भेजे। जैकलीन ने पुलिस को बयान में कहा कि उन्हें पता नहीं था कि सुकेश एक ठग है। इसके बावजूद, सुकेश जेल से उनके लिए चिट्ठियां और तोहफे भेजता रहा।

    वर्तमान स्थिति और ट्रायल

    यह मामला अभी सिर्फ जांच और ट्रायल के दायरे में है। सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के फैसलों से स्पष्ट है कि जांच जारी है और आरोपों को ट्रायल से पहले खारिज नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में जुड़ाव या संपर्क ही कोर्ट की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है।

  • सुप्रीम कोर्ट का आवारा कुत्तों पर फैसला: जस्टिस विक्रम नाथ की मजाकिया टिप्पणी

    सुप्रीम कोर्ट का आवारा कुत्तों पर फैसला: जस्टिस विक्रम नाथ की मजाकिया टिप्पणी

    सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

    हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों से संबंधित एक पुराने फैसले को पलटकर एक नया और महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। इस मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने की। 22 अगस्त 2025 को दिए गए इस फैसले में कोर्ट ने 11 अगस्त के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि दिल्ली-एनसीआर से उठाए गए आवारा कुत्तों को आश्रयों से वापस नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इस पुराने फैसले के खिलाफ पशु कल्याण कार्यकर्ताओं और कुत्ते प्रेमियों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किया था।

    नए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आवारा कुत्तों को उसी स्थान पर वापस लौटाया जाना चाहिए, जहां से उन्हें उठाया गया था, लेकिन यह प्रक्रिया केवल टीकाकरण और नसबंदी के बाद ही पूरी की जानी चाहिए। यह निर्णय पशु कल्याण दिशानिर्देशों के अनुरूप है और मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाता है। इस फैसले ने न केवल पशु प्रेमियों के बीच राहत की लहर दौड़ाई, बल्कि जस्टिस विक्रम नाथ को भी सुर्खियों में ला दिया।

    जस्टिस विक्रम नाथ की मजाकिया टिप्पणी

    लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस विक्रम नाथ ने शनिवार को तिरुवनंतपुरम में एक कार्यक्रम में इस मामले पर हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “इतने वर्षों तक मुझे कानूनी क्षेत्र में मेरे छोटे-मोटे काम के लिए जाना जाता था, लेकिन मैं उन आवारा कुत्तों का शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने मुझे न केवल भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में नागरिक समाज के बीच पहचान दिलाई।” इस मजाकिया टिप्पणी ने सभागार में मौजूद लोगों को हंसा दिया और सोशल मीडिया पर भी यह बयान खूब वायरल हुआ।

    जस्टिस नाथ ने वर्तमान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई को इस मामले को सौंपने के लिए धन्यवाद भी दिया। उन्होंने हंसते हुए कहा, “मैं अपने सीजेआई को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने मुझे यह केस सौंपा। मुझे बहुत खुशी हुई। अब भारत के बाहर के लोग भी मुझे जानते हैं।” उनकी इस टिप्पणी ने उनके व्यक्तित्व की सादगी और हास्य की भावना को उजागर किया।

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    फरवरी 2027 में बनेंगे सीजेआई

    जस्टिस विक्रम नाथ फरवरी 2027 में भारत के चीफ जस्टिस बनने वाले हैं। उनकी इस उपलब्धि से पहले ही उनके नेतृत्व में लिए गए इस फैसले ने उन्हें वैश्विक स्तर पर चर्चा में ला दिया है। यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पशु कल्याण और मानव-पशु सह-अस्तित्व के प्रति संवेदनशीलता को भी दर्शाता है।

    पशु कल्याण के प्रति सुप्रीम कोर्ट की प्रतिबद्धता

    सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पशु कल्याण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। नए आदेश में यह सुनिश्चित किया गया है कि आवारा कुत्तों को नुकसान न पहुंचे और उन्हें टीकाकरण व नसबंदी के बाद सुरक्षित रूप से उनके मूल स्थान पर वापस लौटाया जाए। यह निर्णय पशु कल्याण संगठनों और कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी जीत है, जिन्होंने पुराने फैसले के खिलाफ आवाज उठाई थी।

  • कांग्रेस का चुनाव आयोग पर हमला: ‘मोदी की कठपुतली’ का आरोप

    कांग्रेस का चुनाव आयोग पर हमला: ‘मोदी की कठपुतली’ का आरोप

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शनिवार को चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोला, इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘कठपुतली’ करार दिया। इससे एक दिन पहले, पार्टी सांसद राहुल गांधी ने आयोग पर ‘वोट चोरी’ का गंभीर आरोप लगाते हुए सबूतों का ‘एटम बम’ फोड़ने की बात कही थी। खरगे ने दावा किया कि चुनाव आयोग व्यवस्थित रूप से गरीबों, दलितों, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों को मताधिकार से वंचित करने का काम कर रहा है। उन्होंने बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर आयोग के साथ मिलकर मतदाता सूची से इन वर्गों के नाम जानबूझकर हटाने का आरोप लगाया।

    ‘चुनाव आयोग की साजिश, दलितों-पिछड़ों को वोट से रोका’

    कांग्रेस द्वारा आयोजित एक लीगल कॉन्क्लेव में खरगे ने कहा, “बिहार में 65 लाख या एक करोड़ वोटरों को मताधिकार से वंचित करना दलितों और पिछड़ों को वोटिंग से रोकने की सोची-समझी साजिश है। चुनाव आयोग पूरी तरह से मोदी जी की कठपुतली बन चुका है।” उन्होंने दावा किया कि 7 करोड़ वोटरों में से करीब एक करोड़ लोगों के नाम बिना किसी ठोस कारण के मतदाता सूची से हटा दिए गए। इससे साफ है कि समाज के कमजोर वर्गों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। खरगे ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हुए कहा कि यह कदम सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों के खिलाफ है।

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    ‘अल्पसंख्यकों पर बढ़ा उत्पीड़न’

    खरगे ने बीजेपी शासित राज्यों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ कथित उत्पीड़न को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “बीजेपी शासित राज्यों में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बढ़ गया है। वे मुगलों, चिकन और मंगलसूत्र जैसे मुद्दों को उठाकर समाज को बांटने का काम करते हैं।” कांग्रेस नेता ने मतदाता सूची से नाम हटाने को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया न केवल अल्पसंख्यकों, बल्कि दलितों, पिछड़े वर्गों और गरीबों को भी निशाना बनाती है, जिससे उनके मतदान के अधिकार का हनन होता है।

    ‘संविधान की रक्षा करें, इसे कमजोर न करें’

    खरगे ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि प्रधानमंत्री का कर्तव्य संविधान की रक्षा करना है, न कि इसे कमजोर करना। उन्होंने कहा, “लोगों ने प्रधानमंत्री को देश के संविधान की रक्षा के लिए चुना है, इसे खत्म करने के लिए नहीं।” कांग्रेस अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत ने भी इस मामले की गंभीरता को स्वीकार किया है, लेकिन कई सुनवाइयों के बावजूद चुनाव आयोग ने अपने रवैये में बदलाव नहीं किया।

    बिहार में मतदाता सूची की छानबीन पर विवाद

    हाल ही में बिहार में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पूरी की। हालांकि, विपक्ष ने इस प्रक्रिया को संदेह की नजर से देखा है। खरगे और अन्य कांग्रेस नेताओं का मानना है कि यह प्रक्रिया समाज के कमजोर वर्गों को मतदान से वंचित करने का एक सुनियोजित प्रयास है। उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग को इस तरह के कदमों को तुरंत रोकना चाहिए और सभी पात्र वोटरों को उनके मताधिकार की गारंटी देनी चाहिए।

    कांग्रेस का यह हमला चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को बांके बिहारी मंदिर मामले में लगाई फटकार

    सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को बांके बिहारी मंदिर मामले में लगाई फटकार

    भारत के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के केंद्रों में से एक, वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर, हाल ही में एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद का केंद्र बन गया। मंदिर के प्रबंधन और उसके आसपास के क्षेत्र में प्रस्तावित कॉरिडोर परियोजना को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और मंदिर के पारंपरिक सेवायतों के बीच मतभेद उभरे हैं। इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।

    पृष्ठभूमि:

    मंदिर के चारों ओर प्रस्तावित कॉरिडोर परियोजना का उद्देश्य श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ को व्यवस्थित करना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि, इस परियोजना के लिए मंदिर के फंड का उपयोग किया गया है, जो पारंपरिक सेवायतों द्वारा संचालित होता है। सेवायतों का कहना है कि बिना उनकी सहमति के फंड का उपयोग और सरकारी हस्तक्षेप उनके अधिकारों का उल्लंघन है।

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    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

    सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि राज्य सरकार को निजी विवादों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के हस्तक्षेप से कानून के शासन को खतरा हो सकता है और यह न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक दखलअंदाजी है।

    राज्य सरकार की प्रतिक्रिया:

    उत्तर प्रदेश सरकार ने इस विवाद को सुलझाने के लिए श्री बांके बिहारी जी मंदिर न्यास का गठन किया है, जिसमें 18 सदस्य शामिल हैं। इस ट्रस्ट का उद्देश्य मंदिर के प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना और पारंपरिक सेवायतों के अधिकारों की रक्षा करना है। हालांकि, कुछ सेवायत इस ट्रस्ट के गठन और इसके संचालन पर आपत्ति जता रहे हैं।

  • इलाहाबाद हाई कोर्ट का संभल मस्जिद सर्वे मामले में बड़ा फैसला

    इलाहाबाद हाई कोर्ट का संभल मस्जिद सर्वे मामले में बड़ा फैसला

    इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल में जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर के बीच चल रहे विवाद में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मस्जिद मैनेजमेंट कमेटी की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की गई थी। इस फैसले से मस्जिद कमेटी को बड़ा झटका लगा है, जबकि हिंदू पक्ष ने इसे अपनी जीत के रूप में देखा है। यह मामला संभल की जिला अदालत में चल रहा है, जहां मस्जिद के सर्वे को लेकर विवाद चल रहा है।

    संभल में जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर के बीच का विवाद लंबे समय से चर्चा में रहा है। मस्जिद कमेटी ने ट्रायल कोर्ट में चल रहे एक मुकदमे की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की थी। इस मुकदमे में मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया गया था, जिसके खिलाफ मस्जिद कमेटी ने पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख करने का निर्देश दिया। इसके बाद हाई कोर्ट में सुनवाई हुई, जहां मस्जिद कमेटी की याचिका को खारिज कर दिया गया।

    हिंदू पक्ष के वकील, एडवोकेट गोपाल शर्मा ने इस मामले में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि 19 नवंबर 2024 को हिंदू पक्ष ने एक याचिका दायर की थी, जिसके आधार पर कोर्ट ने सर्वे का आदेश दिया था। सर्वे को दो चरणों में पूरा किया गया। मस्जिद कमेटी ने इस सर्वे के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले को हाई कोर्ट में भेज दिया। एडवोकेट शर्मा ने कहा कि हाई कोर्ट का फैसला दो प्रमुख बिंदुओं पर आधारित होगा। पहला, क्या सिविल जज सीनियर डिवीजन, संभल को सर्वे का आदेश देने का अधिकार था? दूसरा, इस मामले की सुनवाई संभल की सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में होगी या किसी अन्य अदालत में स्थानांतरित की जाएगी।

    इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल को कमेटी ऑफ मैनेजमेंट, शाही जामा मस्जिद, संभल को उत्तर प्रदेश सरकार की स्टेटस रिपोर्ट का जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया था। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि विवादित कुआं मस्जिद की जमीन पर नहीं, बल्कि इसके बाहर स्थित है। इस जानकारी ने मामले को और जटिल बना दिया, क्योंकि मस्जिद कमेटी का दावा था कि कुआं उनकी संपत्ति का हिस्सा है। हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने मस्जिद कमेटी के दावों को और कमजोर कर दिया है।

    इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। संभल में जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर का विवाद धार्मिक संवेदनाओं से जुड़ा हुआ है, और इस मामले में हर फैसला दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण है। हिंदू पक्ष का कहना है कि सर्वे का आदेश ऐतिहासिक और पुरातात्विक तथ्यों को सामने लाने के लिए जरूरी था, जबकि मस्जिद कमेटी इसे अपनी संपत्ति पर अनावश्यक हस्तक्षेप मानती है।

    अब सभी की निगाहें हाई कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि सर्वे का आदेश कानूनी रूप से सही था या नहीं। साथ ही, मामले की सुनवाई किस अदालत में होगी, यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है। इस फैसले का असर न केवल संभल, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में धार्मिक और कानूनी मसलों पर पड़ सकता है। दोनों पक्ष इस मामले में अपनी-अपनी जीत के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं, और हाई कोर्ट का यह फैसला इस विवाद में एक नया मोड़ ला सकता है।

  • मंत्री विजय शाह के खिलाफ FIR की मांग , कर्नल सोफिया कुरैशी पर आपत्तिजनक बयान से बवाल, जीतू पटवारी ने घेरा सरकार

    मंत्री विजय शाह के खिलाफ FIR की मांग , कर्नल सोफिया कुरैशी पर आपत्तिजनक बयान से बवाल, जीतू पटवारी ने घेरा सरकार

    मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर विवाद ने जोर पकड़ लिया है। राज्य सरकार के मंत्री विजय शाह के एक बयान ने सियासी भूचाल ला दिया है। भारतीय सेना की वीरांगना कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ दिए गए उनके कथित आपत्तिजनक बयान को लेकर कांग्रेस पार्टी हमलावर हो गई है।

    FIR दर्ज कराने थाने पहुंचे जीतू पटवारी

    कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने भोपाल के श्यामला हिल्स थाने में विजय शाह के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज करवाई। पटवारी ने कहा मंत्री का बयान केवल कर्नल सोफिया कुरैशी का अपमान है, बल्कि भारतीय सेना, देश की एकता और नारी सम्मान पर सीधा हमला है। उन्होंने यह भी कहा कि विजय शाह को तुरंत मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जाए और कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।

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    पीएम मोदी को भी लिखा पत्र

    जीतू पटवारी ने इस मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखा है, जिसमें मांग की गई है कि वे खुद हस्तक्षेप कर मंत्री से इस्तीफा लें। बीजेपी की यह मानसिकता फिर से सामने आई है । जो महिलाओं और सेना के गौरव के खिलाफ है।

    क्या है आगे की कार्रवाई?

    पुलिस ने शिकायत दर्ज कर ली है, लेकिन FIR दर्ज हुई या नहीं, इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं है। कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि अगर कार्रवाई नहीं होती, तो आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।

    कौन हैं कर्नल सोफिया कुरैशी?

    कर्नल सोफिया कुरैशी भारतीय सेना की पहली महिला अधिकारी हैं जिन्होंने किसी अंतरराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में भारत का नेतृत्व किया था। उनका सम्मान पूरी सेना और देश के लिए गौरव का विषय है।

  • वक्फ कानून पर हिंसा पर बांग्लादेश की टिप्पणी को भारत ने किया खारिज, कहा – “अपने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर ध्यान दें”

    वक्फ कानून पर हिंसा पर बांग्लादेश की टिप्पणी को भारत ने किया खारिज, कहा – “अपने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर ध्यान दें”

    भारत और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक संबंधों में एक नया मोड़ उस समय आया जब बांग्लादेश ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में वक्फ कानून को लेकर हुई हिंसा पर टिप्पणी की। भारत ने इस टिप्पणी को पूरी तरह से “गलत, बेबुनियाद और भटकाने वाली” करार देते हुए सख्ती से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा है कि बांग्लादेश को भारत की आंतरिक मामलों में दखल देने के बजाय अपने देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

    बांग्लादेश की आपत्ति और भारत की तीखी प्रतिक्रिया
    घटना की पृष्ठभूमि में, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में वक्फ कानून में संशोधन के विरोध में हिंसा भड़क गई थी, जिसमें 3 लोगों की जान गई और सैकड़ों घायल हुए। इस घटना को लेकर बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के प्रेस सचिव ने भारत से “मुस्लिम अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने” की अपील की।

    इसके जवाब में भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश की टिप्पणी न केवल भ्रामक है, बल्कि भारत की आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप भी है।” उन्होंने आगे कहा कि यह बयान एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिससे बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों से ध्यान हटाया जा सके।

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    भारत ने क्यों जताई आपत्ति?
    भारत का स्पष्ट कहना है कि

    • बंगाल में जो कुछ हुआ, वह राज्य सरकार और देश के कानून के तहत निपटने वाला मामला है।
    • भारत एक लोकतांत्रिक और बहुलतावादी देश है, जहां सभी नागरिकों को बराबर अधिकार प्राप्त हैं।
    • किसी भी बाहरी देश द्वारा भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करना अस्वीकार्य है।

    रणधीर जायसवाल ने बयान में कहा, “बिना वजह टिप्पणी करने और अच्छाई दिखाने की कोशिश करने के बजाय बांग्लादेश को अपने देश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा पर ध्यान देना चाहिए।”

    बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर भारत की चिंता
    भारत का यह बयान केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक गहरी चिंता का भी प्रतिबिंब है। पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों की कई घटनाएं सामने आई हैं।

    • लगभग 200 मंदिरों में तोड़फोड़ की गई है।
    • कई पुजारियों और धार्मिक नेताओं को धमकी और हमले झेलने पड़े हैं।
    • धार्मिक त्योहारों के दौरान भीड़ द्वारा हमले, तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं दर्ज की गई हैं।
    • प्रवासी बांग्लादेशी हिंदू समुदायों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन घटनाओं को लेकर चिंता जताई है।

    भारत ने इन मामलों में समय-समय पर बांग्लादेश से अपने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है, लेकिन बांग्लादेश सरकार ने अक्सर इन आरोपों को नकार दिया है।

    क्या है वक्फ कानून में विवाद?
    पश्चिम बंगाल में हाल ही में वक्फ कानून में संशोधन को लेकर विवाद गहराया। संशोधन के बाद समुदाय के कुछ समूहों में नाराजगी देखी गई और इसका विरोध सड़कों पर उतरकर किया गया।
    इस विरोध ने हिंसक रूप ले लिया, जिसमें पुलिस और प्रशासन को हालात नियंत्रित करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी। कई इलाकों में इंटरनेट सेवा बंद करनी पड़ी और धारा 144 लागू की गई।

    हालांकि राज्य सरकार और केंद्रीय एजेंसियों ने स्थिति को काबू में किया, लेकिन इस मामले में बांग्लादेश की ओर से सार्वजनिक टिप्पणी को भारत ने अनुचित और दुर्भावनापूर्ण बताया।

    बांग्लादेश की राजनीति और कट्टरपंथ का असर
    बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ते कट्टरपंथी प्रभाव के चलते अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
    शेख हसीना के सत्ता से बाहर जाने के बाद वहां कट्टरपंथी ताकतों को अधिक बल मिला है, जो अक्सर धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हैं।

    भारत का यह भी कहना है कि बांग्लादेश को पहले अपने घर को व्यवस्थित करना चाहिए, फिर किसी अन्य देश को नैतिकता का पाठ पढ़ाना चाहिए।भारत और बांग्लादेश के रिश्ते हमेशा से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़े रहे हैं, लेकिन हालिया घटनाएं दोनों देशों के बीच विश्वास की डोर को चुनौती दे रही हैं। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी आंतरिक नीति और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर जवाबदेह है और किसी बाहरी टिप्पणी को बर्दाश्त नहीं करेगा।
    बांग्लादेश को भी यह समझना होगा कि नैतिकता की बुनियाद अपने घर से शुरू होती है – दूसरों पर उंगली उठाने से पहले अपने यहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है।

  • SC में Waqf Act की सुनवाई पर असदुद्दीन ओवैसी का बयान,हम इस एक्ट को असंवैधानिक मानते हैं

    SC में Waqf Act की सुनवाई पर असदुद्दीन ओवैसी का बयान,हम इस एक्ट को असंवैधानिक मानते हैं

    हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में वक्फ एक्ट (Waqf Act) को लेकर सुनवाई हुई, जिसमें AIMIM (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। ओवैसी ने वक्फ अधिनियम में किए गए संशोधनों को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि इस एक्ट से मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। उनका कहना था कि यह एक्ट न केवल मुस्लिमों के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, बल्कि इससे सरकार को वक्फ संपत्तियों पर अनुचित नियंत्रण प्राप्त हो जाता है, जो संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के खिलाफ है।

    वक्फ अधिनियम और इसके संशोधन

    वक्फ अधिनियम 1995 में लागू किया गया था, जो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करता है। इसके तहत वक्फ बोर्ड को यह अधिकार दिया गया था कि वह वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन करे और सुनिश्चित करे कि उनका उपयोग सही तरीके से हो रहा है। हालांकि, हाल के समय में इस कानून में कुछ संशोधन किए गए हैं, जिनका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को और अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाना था। इन संशोधनों को लेकर विभिन्न राजनीतिक और धार्मिक समूहों में मतभेद रहे हैं। ओवैसी सहित कई मुस्लिम संगठनों का मानना है कि इन संशोधनों के माध्यम से सरकार को वक्फ संपत्तियों पर अधिक नियंत्रण मिल जाएगा, जिससे मुस्लिम समुदाय की स्वायत्तता पर खतरा हो सकता है।

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    ओवैसी का आरोप

    असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान कहा, “हम इस एक्ट को असंवैधानिक मानते हैं। यह एक्ट संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। वक्फ संपत्तियों पर राज्य का अनुचित हस्तक्षेप संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। ओवैसी ने यह भी कहा कि इस कानून के तहत सरकार को वक्फ संपत्तियों की निगरानी का अधिकार देना, मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वायत्तता में हस्तक्षेप करने जैसा है। उनका कहना था कि वक्फ संपत्तियां मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं, और सरकार का इसमें हस्तक्षेप करना उस समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन है।

    समाजवादी और अल्पसंख्यक संगठनों का समर्थन

    असदुद्दीन ओवैसी की इस बयानबाजी का समर्थन कई अन्य मुस्लिम संगठनों और राजनीतिक दलों ने भी किया है। कुछ समाजवादी नेताओं ने भी कहा है कि वक्फ एक्ट में किए गए संशोधन मुस्लिमों की धार्मिक स्वतंत्रता पर कड़ा प्रहार कर सकते हैं। उनका मानना है कि यह केवल मुस्लिमों के अधिकारों को सीमित करने की कोशिश है और इसके पीछे सरकार की मंशा कुछ और ही है।

    इसके अतिरिक्त, कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि वक्फ अधिनियम में सुधार की आवश्यकता थी, लेकिन यह सुधार किसी विशेष समुदाय के अधिकारों को सीमित करने के बजाय उनके भले के लिए होना चाहिए था।

    सरकार की तरफ से प्रतिक्रिया

    सरकार ने वक्फ अधिनियम के संशोधनों के पक्ष में कई दलीलें दी हैं। उनका कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के सही और पारदर्शी प्रबंधन को सुनिश्चित करना है, जिससे किसी भी प्रकार की अनियमितता और धोखाधड़ी से बचा जा सके। सरकार का यह भी कहना है कि वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में सुधार लाने से समुदाय का कल्याण होगा और इसका सकारात्मक असर समाज के हर वर्ग पर पड़ेगा।

    सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

    सुप्रीम कोर्ट में यह मामला इस बात पर केंद्रित है कि क्या वक्फ अधिनियम और उसके संशोधन संविधान की मूल भावना से मेल खाते हैं या नहीं। कोर्ट की नजर में यह एक संवेदनशील मामला है, क्योंकि इसमें संविधान की धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अनुच्छेदों की व्याख्या भी की जानी है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भारतीय संविधान और धर्मनिरपेक्षता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

    वक्फ अधिनियम पर जारी विवाद न केवल मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दे को उठाता है, बल्कि यह भारत में धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक स्वतंत्रता और सरकारी हस्तक्षेप के बीच संतुलन स्थापित करने के प्रयासों को भी सामने लाता है। असदुद्दीन ओवैसी और अन्य मुस्लिम नेताओं द्वारा उठाए गए सवाल इस बात की ओर इशारा करते हैं कि किसी भी धार्मिक कानून या अधिनियम में बदलाव से पहले उसे व्यापक रूप से परखा और समझा जाना चाहिए, ताकि वह संविधान की रक्षा करे और समुदाय की धार्मिक स्वायत्तता पर किसी भी प्रकार का आक्रमण न हो।अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में यह देखा जाएगा कि क्या इस कानून में किए गए बदलावों को संविधान के अनुरूप माना जाता है, और क्या इसे मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों पर कोई खतरा पैदा करने वाला कदम माना जाता है।