मायावती: शिक्षिका, जिनका प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना अधूरा रह गया, ऐसे बनीं कांशीराम की शिष्या
मायावती
मायावती की राजनीतिक पहचान बनने से पहले उनकी जिंदगी का सपना प्रशासनिक अधिकारी बनने का था। 1956 में दिल्ली के एक दलित परिवार में जन्मीं मायावती के पिता प्रभुदास पोस्टल विभाग में क्लर्क थे और मां गृहिणी थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति गांवों की तुलना में बेहतर थी, लेकिन सामाजिक भेदभाव का सामना उन्हें बचपन से करना पड़ा। मायावती ने अपनी आत्मकथा में जातिगत भेदभाव के कई अनुभवों का जिक्र किया है। पढ़ाई जारी रखते हुए उन्होंने बीए, बीएड और एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और शिक्षक की नौकरी के साथ आईएएस की तैयारी करने का फैसला किया।
एक भाषण ने बदली मायावती की जिंदगी
मायावती शिक्षिका, जिनका प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना अधूरा रह गया, की जिंदगी में बड़ा मोड़ 1977 में आया। दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में जातिवादी व्यवस्था पर आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने अपने बेबाक भाषण से लोगों का ध्यान खींचा। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राज नारायण के भाषण में ‘हरिजन’ शब्द के इस्तेमाल पर मायावती ने आपत्ति जताई और जातिगत व्यवस्था पर सवाल उठाए। उनके इस भाषण की जानकारी जब कांशीराम तक पहुंची तो उन्होंने मायावती से मिलने का फैसला किया।
ऐसा नेता बनो जिसके पीछे अफसरों की लाइन हो
कांशीराम ने मायावती से कहा कि जातीय उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने के लिए प्रशासनिक सेवा से ज्यादा ताकत राजनीतिक सत्ता में है। उन्होंने मायावती से कहा कि आज वह आईएएस बनना चाहती हैं, लेकिन वह उन्हें ऐसा नेता बना सकते हैं जिसके पीछे आईएएस अधिकारियों की लाइन होगी। कांशीराम ने मायावती के पिता से भी उन्हें राजनीति में आने की अनुमति देने की अपील की, लेकिन पिता सहमत नहीं हुए। इसके बाद मायावती ने घर छोड़ दिया और कांशीराम के संगठन बामसेफ से जुड़ गईं। बाद में डीएस-4 में भी उन्होंने कांशीराम के साथ काम किया और संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली।
1984 में बसपा का पहला चुनाव
1984 में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा का गठन किया। पार्टी ने इसी साल अपना पहला चुनाव लड़ा। कांशीराम का कहना था कि पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा नजर में आने के लिए और तीसरा जीतने के लिए लड़ा जाएगा। इसी चुनाव में मायावती को कैराना लोकसभा सीट से मैदान में उतारा गया। उन्हें 44,445 वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर रहीं। इसके बाद 1985 में बिजनौर और 1987 में हरिद्वार उपचुनाव में भी उन्होंने चुनाव लड़ा। जीत भले नहीं मिली, लेकिन उनका वोट लगातार बढ़ता गया और हरिद्वार में उन्हें 1.25 लाख से ज्यादा वोट मिले।
गुरु कांशीराम से पहले संसद पहुंचीं मायावती
1989 का लोकसभा चुनाव बसपा और मायावती के राजनीतिक सफर में बड़ा पड़ाव बना। बसपा ने 245 उम्मीदवार मैदान में उतारे और उसके तीन उम्मीदवार जीतकर संसद पहुंचे। इनमें मायावती भी शामिल थीं। उन्होंने बिजनौर सीट से कांग्रेस की आशा चौधरी को 81,471 वोटों से हराया और पहली बार लोकसभा पहुंचीं। खास बात यह रही कि इसी चुनाव में कांशीराम भी दो सीटों से मैदान में उतरे, लेकिन दोनों जगह हार गए। इस तरह गुरु कांशीराम से पहले उनकी शिष्या मायावती को चुनावी जीत मिली। इसके बाद उत्तर प्रदेश और पंजाब में बसपा का जनाधार तेजी से बढ़ा और पार्टी ने दूसरे राज्यों में भी अपना चुनावी विस्तार किया।
