जब पत्रकारिता का असली मकसद जनता तक सच पहुंचाना होता है, तब इसे दबाना आसान नहीं होता। राजीव प्रताप, 36 साल के, IIMC से पढ़े-लिखे पत्रकार, ने उत्तरकाशी के जिला अस्पताल में बड़े भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग करके देश के सामने सच लाया। लेकिन उनकी हिम्मत और ईमानदारी ने उन्हें महंगी पड़ गई। सच बोलने के लिए उनकी जिंदगी ही खतरे में पड़ गई, और आखिरकार उनका हत्या कर दी गई।राजीव की कहानी यह सवाल उठाती है कि क्या सच बोलना अब जानलेवा हो गया है? क्या पत्रकारों को अपनी नौकरी, परिवार और यहां तक कि अपनी जान की चिंता के बिना रिपोर्टिंग करनी चाहिए?
राजीव की हिम्मत और उनके संघर्ष का महत्व
राजीव जैसे पत्रकार ही समाज के सच्चे प्रहरी होते हैं। वे उन खबरों को उजागर करते हैं जिन्हें लोग छुपाना चाहते हैं। जिला अस्पताल उत्तरकाशी में भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग ने न केवल प्रशासन की अनियमितताओं को सामने लाया, बल्कि समाज को यह भी दिखाया कि सच की आवाज़ दबाने की कोशिशें कितनी खतरनाक हो सकती हैं।सच बोलना केवल खबर प्रकाशित करना नहीं है, बल्कि यह न्याय और पारदर्शिता के लिए लड़ाई है। राजीव ने इस लड़ाई में अपनी जान की परवाह किए बिना काम किया। उनके साहस से यह स्पष्ट होता है कि सच्चाई की रक्षा करने वाले पत्रकार समाज के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।
देश में पत्रकारों की वर्तमान स्थिति
भारत में हजारों पत्रकार ऐसे हैं जो सिस्टम की खामियों और भ्रष्टाचार को उजागर करने की हिम्मत रखते हैं। लेकिन उनके लिए यह खतरा है कि सत्ता और अपराधी ताकतें उन्हें दबा दें। राजीव जैसी घटनाएं यह दिखाती हैं कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि एक जोखिम भरी जिम्मेदारी है।आज भी कई पत्रकार डर के बिना सच के लिए लड़ रहे हैं। उनके प्रयासों से ही समाज में सच और न्याय की उम्मीद जिंदा रहती है। हमें इस हिम्मत को पहचानना और उनका समर्थन करना चाहिए।
सच की आवाज़ फैलाना हमारी जिम्मेदारी
राजीव प्रताप की शहादत हमें यह संदेश देती है कि सच को दबाया नहीं जा सकता। हर नागरिक का दायित्व है कि वह सच्ची खबरों को देखे, समझे और फैलाए। पत्रकारों की सुरक्षा और उनके काम का सम्मान करना समाज की जिम्मेदारी है।राजीव जैसी शहादतें हमें याद दिलाती हैं कि सच बोलना केवल साहस नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है। अगर हम सच की आवाज़ को दबा देंगे, तो समाज में न्याय और पारदर्शिता की नींव कमजोर होगी।

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