कश्मीर पर जनरल असीम मुनीर की बयानबाज़ी: पाकिस्तान की पुरानी रट या नई रणनीति?

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में ओवरसीज पाकिस्तानियों के एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कश्मीर को “इस्लामाबाद की गले की नस” बताया और कहा कि पाकिस्तान इस मुद्दे को कभी नहीं भूलेगा। ऐसे बयानों से भारत-पाकिस्तान के पहले से तनावपूर्ण संबंधों में और तल्खी आने की आशंका है।

कश्मीर: पाकिस्तान की ‘गले की नस’?
जनरल मुनीर ने अपने भाषण में कहा कि कश्मीर हमेशा से पाकिस्तान के लिए अहम मुद्दा रहा है और रहेगा। उन्होंने दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन करते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान दो अलग पहचान रखने वाले राष्ट्र हैं — न सिर्फ धर्म में, बल्कि सोच, संस्कृति और महत्वाकांक्षाओं में भी। उनका यह बयान इस विचारधारा को फिर से उभारने की कोशिश है, जिसके आधार पर 1947 में भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था।

भारत का स्पष्ट रुख: “कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा”
भारत ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि जम्मू-कश्मीर उसका आंतरिक मामला है और इसमें बाहरी हस्तक्षेप कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 2019 में आर्टिकल 370 और 35A के हटाए जाने के बाद पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाने की कई नाकाम कोशिशें की हैं। चाहे वह संयुक्त राष्ट्र हो या इस्लामिक देशों का संगठन, पाकिस्तान को कहीं भी भारत के खिलाफ ठोस समर्थन नहीं मिल पाया है।

बलूचिस्तान और अलगाववाद पर जनरल मुनीर का बयान
जनरल असीम मुनीर ने अपने भाषण में न सिर्फ कश्मीर बल्कि बलूचिस्तान में अलगाववादियों के खिलाफ सख्त रुख की बात भी की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की क्षेत्रीय अखंडता को कोई ताकत नुकसान नहीं पहुंचा सकती — न आतंकवाद और न ही किसी बड़े देश की सेना। उन्होंने भारत की 13 लाख की सेना का हवाला देते हुए कहा कि अगर वह पाकिस्तान को डरा नहीं सकी, तो कुछ आतंकवादी भी पाकिस्तान की नियति नहीं बदल सकते।

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वास्तविकता: पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियाँ
जनरल मुनीर का यह बयान ऐसे वक्त आया है जब पाकिस्तान खुद भारी आंतरिक संकट से गुजर रहा है। देश की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है, महंगाई चरम पर है, IMF की शर्तों के आगे सरकार झुकी हुई दिखती है, और राजनीतिक अस्थिरता लगातार बनी हुई है। इन हालातों में सेना प्रमुख का कश्मीर को लेकर बयान देना शायद आंतरिक असंतोष से ध्यान भटकाने की रणनीति भी हो सकती है।

भारत की प्रतिक्रिया और रणनीति
भारत सरकार आम तौर पर पाकिस्तान के ऐसे बयानों को “अनावश्यक और भड़काऊ” कहकर खारिज करती है। भारत की नीति स्पष्ट है: “बातचीत और आतंक साथ-साथ नहीं चल सकते।” पाकिस्तान की ओर से जब भी कोई सकारात्मक कदम उठाने की बात होती है, उसे कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बयानबाज़ी कमजोर कर देती है। इससे शांति वार्ता की संभावनाएं लगातार दूर होती जा रही हैं।

जनरल असीम मुनीर का यह बयान पाकिस्तान की उस पुरानी नीति को दोहराता है जिसमें कश्मीर को एक सियासी औजार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में अब यह रणनीति ज्यादा काम नहीं आ रही। भारत ने कश्मीर में अपने कदमों को पूरी मजबूती से आगे बढ़ाया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसका पक्ष मजबूत होता जा रहा है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर पुरानी रट लगाना अब खुद उसके लिए उलटा पड़ता दिख रहा है। अगर पाकिस्तान को अपने नागरिकों की भलाई चाहिए, तो उसे आंतरिक स्थायित्व और विकास पर ध्यान देना होगा — न कि कश्मीर जैसे मुद्दों पर भावनात्मक राजनीति करके।

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