Indo-Pacific से Pacific Command बना, शशि थरूर ने उठाए सवाल
अमेरिका ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांड में बड़ा बदलाव करते हुए US Pacific Command नाम को फिर से बहाल कर दिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि अब US Indo-Pacific Command (USINDOPACOM) को दोबारा US Pacific Command (USPACOM) कहा जाएगा। हालांकि पेंटागन का कहना है कि केवल नाम बदला गया है और रणनीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों के बीच नई बहस छेड़ दी है। खासकर भारत और हिंद महासागर क्षेत्र की भूमिका को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
आखिर US Pacific Command नाम दोबारा क्यों लाया गया?
US Pacific Command नाम को लेकर अमेरिकी रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यह अमेरिका की सैन्य विरासत से जुड़ा हुआ एक ऐतिहासिक नाम है। पेंटागन के अनुसार यह नाम कई बड़े युद्धों और महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों का हिस्सा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि पुराने नाम को वापस लाने से सैनिकों को अपनी सैन्य परंपराओं और इतिहास पर गर्व महसूस होगा। इसी वजह से इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर फिर से पैसिफिक कमांड कर दिया गया। पेंटागन ने साफ किया है कि इस बदलाव का उद्देश्य केवल ऐतिहासिक पहचान को पुनर्जीवित करना है और इससे कमांड की जिम्मेदारियों या सैन्य संचालन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
2018 में Indo-Pacific नाम क्यों रखा गया था?
आज जिस US Pacific Command नाम की वापसी हुई है, उसे वर्ष 2018 में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने बदलकर Indo-Pacific Command किया था। उस समय अमेरिका का मानना था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर की रणनीतिक चुनौतियां एक-दूसरे से जुड़ चुकी हैं। चीन के बढ़ते प्रभाव और समुद्री सुरक्षा के बदलते समीकरणों को देखते हुए भारत और हिंद महासागर क्षेत्र का महत्व तेजी से बढ़ रहा था। इसी सोच के तहत कमांड के नाम में “इंडो” शब्द जोड़ा गया था ताकि यह संदेश दिया जा सके कि अमेरिका हिंद महासागर क्षेत्र को अपनी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।
आखिर क्या है US Pacific Command और इसकी भूमिका कितनी बड़ी है?
US Pacific Command अमेरिका की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांडों में गिनी जाती है। अमेरिकी सेना दुनिया भर में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए विभिन्न कमांड संचालित करती है। इनमें पैसिफिक कमांड सबसे बड़े रणनीतिक कमांड ढांचे का हिस्सा है। इसका संचालन क्षेत्र एशिया, प्रशांत महासागर और उससे जुड़े कई संवेदनशील इलाकों तक फैला हुआ है। यह कमांड चीन, उत्तर कोरिया, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य एशियाई देशों से जुड़े सुरक्षा मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए इसके नाम में होने वाला कोई भी बदलाव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन जाता है।
क्या भारत और हिंद महासागर को लेकर अमेरिका का संदेश बदल रहा है?
US Pacific Command नाम की वापसी के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इसी सवाल को लेकर हो रही है। कई रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि “इंडो” शब्द हटने से यह संकेत जा सकता है कि अमेरिका अब हिंद महासागर क्षेत्र को पहले जितना प्रमुख स्थान नहीं देना चाहता। हालांकि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने ऐसी किसी भी संभावना से इनकार किया है। उसका कहना है कि केवल नाम बदला गया है, जबकि नीतियां और प्राथमिकताएं पहले जैसी ही रहेंगी। फिर भी कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव अमेरिका की बदलती रणनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक सुरक्षा चुनौतियां लगातार बदल रही हैं।
ट्रम्प की रणनीति और चीन फैक्टर कितना अहम है?
जब Indo-Pacific शब्द को अपनाया गया था, तब अमेरिका की चीन नीति काफी आक्रामक मानी जाती थी। उस दौर में भारत को चीन के प्रभाव को संतुलित करने वाले महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखा जा रहा था। विशेषज्ञों का मानना है कि US Pacific Command नाम की वापसी को डोनाल्ड ट्रम्प की बदलती रणनीतिक प्राथमिकताओं से जोड़कर भी देखा जा रहा है। पहले अमेरिका हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को एक संयुक्त रणनीतिक क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। लेकिन अब कुछ जानकारों का मानना है कि वाशिंगटन का फोकस फिर से पारंपरिक प्रशांत क्षेत्र पर अधिक केंद्रित हो सकता है। हालांकि इस बारे में अभी तक कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है।
शशि थरूर ने क्यों उठाया क्वाड को लेकर सवाल?
US Pacific Command नाम की वापसी पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अमेरिकी आदेश की तस्वीर साझा करते हुए सवाल उठाया कि क्या यह क्वाड (QUAD) के लिए एक और झटका साबित हो सकता है। क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलन और सहयोग बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जाता है। थरूर की टिप्पणी के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक और रणनीतिक बहस और तेज हो गई है। हालांकि अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि नाम परिवर्तन का क्वाड या क्षेत्रीय साझेदारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर बनी हुई है कि आने वाले समय में अमेरिका अपने एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र से जुड़े रणनीतिक कदमों को किस दिशा में आगे बढ़ाता है।